सुदर्शन

सआदत हसन मंटो की कहानियां

मैं क्यों लिखता हूँ?

यह एक ऐसा सवाल है कि मैं क्यों खाता हूँ… मैं क्यों पीता हूँ… लेकिन इस दृष्टि से मुख़तलिफ है कि खाने और पीने पर मुझे रुपए खर्च करने पड़ते हैं और जब लिखता हूँ तो मुझे नकदी की सूरत में कुछ खर्च करना नहीं पड़ता।
पर जब गहराई में जाता हूँ तो पता चलता है कि यह बात ग़लत है इसलिए कि मैं रुपए के बलबूते पर ही लिखता हूँ।

अगर मुझे खाना-पीना न मिले तो ज़ाहिर है कि मेरे अंग इस हालत में नहीं होंगे कि मैं कलम हाथ में पकड़ सकूँ. हो सकता है, फ़ाकाकशी की हालत में दिमाग चलता रहे, मगर हाथ का चलना तो ज़रूरी है. हाथ न चले तो ज़बान ही चलनी चाहिए. यह कितनी बड़ी ट्रेजडी है कि इंसान खाए-पिए बग़ैर कुछ भी नहीं कर सकता।

लोग कला को इतना ऊँचा रूतबा देते हैं कि इसके झंडे सातवें असमान से मिला देते हैं। मगर क्या यह हक़ीक़त नहीं कि हर श्रेष्ठ और महान चीज़ एक सूखी रोटी की मोहताज है?

मैं लिखता हूँ इसलिए कि मुझे कुछ कहना होता है. मैं लिखता हूँ इसलिए कि मैं कुछ कमा सकूँ ताकि मैं कुछ कहने के काबिल हो सकूँ।

रोटी और कला का संबंध प्रगट रूप से अजीब-सा मालूम होता है, लेकिन क्या किया जाए कि ख़ुदाबंद ताला को यही मंज़ूर है। वह ख़ुद को हर चीज़ से निरपेक्ष कहता है-यह गलत है। वह निरपेक्ष हरगिज नहीं है। इसको इबादत चाहिए। और इबादत बड़ी ही नर्म और नाज़ुक रोटी है बल्कि यूँ कहिए, चुपड़ी हुई रोटी है जिससे वह अपना पेट भरता है।

मेरे पड़ोस में अगर कोई औरत हर रोज़ खाविंद से मार खाती है और फिर उसके जूते साफ़ करती है तो मेरे दिल में उसके लिए ज़र्रा बराबर हमदर्दी पैदा नहीं होती। लेकिन जब मेरे पड़ोस में कोई औरत अपने खाविंद से लड़कर और खुदकशी की धमकी देकर सिनेमा देखने चली जाती है और मैं खाविंद को दो घंटे सख़्त परेशानी की हालत में देखता हूँ तो मुझे दोनों से एक अजीब व ग़रीब क़िस्म की हमदर्दी पैदा हो जाती है।

किसी लड़के को लड़की से इश्क हो जाए तो मैं उसे ज़ुकाम के बराबर अहमियत नहीं देता, मगर वह लड़का मेरी तवज्जो को अपनी तरफ ज़रूर खींचेगा जो जाहिर करे कि उस पर सैकड़ो लड़कियाँ जान देती हैं लेकिन असल में वह मुहब्बत का इतना ही भूखा है कि जितना बंगाल का भूख से पीड़ित वाशिंदा. इस बज़ाहिर कामयाब आशिक की रंगीन बातों में जो ट्रेजडी सिसकियाँ भरती होगी, उसको मैं अपने दिल के कानों से सुनूंगा और दूसरों को सुनाऊंगा।

चक्की पीसने वाली औरत जो दिन भर काम करती है और रात को इत्मिनान से सो जाती है, मेरे अफ़सानों की हीरोइन नहीं हो सकती। मेरी हीरोइन चकले की एक टखयाई रंडी हो सकती है। जो रात को जागती है और दिन को सोते में कभी-कभी यह डरावना ख्वाब देखकर उठ बैठती है कि बुढ़ापा उसके दरवाज़े पर दस्तक देने आ रहा है। उसके भारी-भारी पपोटे, जिनमें वर्षों की उचटी हुई नींद जम गई है, मेरे अफ़सानों का मौजूँ (विषय) बन सकते हैं। उसकी गलाजत, उसकी बीमारियाँ, उसका चिड़चिड़ापन, उसकी गालियाँ-ये सब मुझे भाती हैं-मैं उसके मुताल्लिक लिखता हूँ और घरेलू औरतों की शस्ताकलामियों, उनकी सेहत और उनकी नफ़ासत पसंदी को नज़रअंदाज कर जाता हूँ।

सआदत हसन मंटो लिखता है इसलिए कि यह खुदा जितना बड़ा अफसाना साज और शायर नहीं, यह उसकी आजिजी जो उससे लिखवाती है।

मैं जानता हूँ कि मेरी शख्सियत बहुत बड़ी है और उर्दू साहित्य में मेरा बड़ा नाम है। अगर यह ख़ुशफ़हमी न हो तो ज़िदगी और भी मुश्किल बन जाए। पर मेरे लिए यह एक तल्ख़ हक़ीकत है कि अपने मुल्क में, जिसे पाकिस्तान कहते हैं, मैं अपना सही स्थान ढूंढ नहीं पाया हूँ। यही वजह है कि मेरी रूह बेचैन रहती है। मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ।

मुझसे पूछा जाता है कि मैं शराब से अपना पीछा क्यों नहीं छुड़ा लेता? मैं अपनी जिंदगी का तीन-चौथाई हिस्सा बदपरहेजियों की भेट चढ़ा चुका हूँ। अब तो यह हालत है- मैं कभी पागलखाने में और कभी अस्पताल में रहता हूँ।

मैं समझता हूँ कि जिंदगी अगर परहेज़ से गुजारी जाए तो एक क़ैद है। अगर वह बदपरहेजियों से गुज़ारी जाए तो भी एक क़ैद है। किसी न किसी तरह हमें इस जुराब के धागे का एक सिरा पकड़कर उधेड़ते जाना है और बस।

मैं अफ़साना क्यों कर लिखता हूँ? /

मुझसे कहा गया है कि मैं यह बताऊँ कि मैं अफ़साना क्यों कर लिखता हूँ? यह ‘क्यों कर’ मेरी समझ में नहीं आया। ‘क्यों कर’ का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है – कैसे और किस तरह?
अब आपको क्या बताऊँ कि मैं अफ़साना क्योंकर लिखता हूँ। यह बड़ी उलझन की बात है। अगर में ‘किस तरह’ को पेशनज़र रखूँ को यह जवाब दे सकता हूँ कि अपने कमरे में सोफे पर बैठ जाता हूँ। कागज़-क़लम पकड़ता हूँ और बिस्मिल्लाह करके अफ़साना लिखना शुरू कर देता हूँ। मेरी तीन बच्चियाँ शोर मचा रही होती हैं। मैं उनसे बातें भी करता हूँ। उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, अपने लिए सलाद भी तैयार करता हूँ। अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर अफ़साना लिखे जाता हूँ।

अब ‘कैसे’ सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं वैसे ही अफ़साने लिखता हूँ जिस तरह खाना खाता हूँ, गुसल करता हूँ, सिगरेट पीता हूँ और झक मारता हूँ।

अगर यह पूछा जाए कि मैं अफ़साना ‘क्यों’ लिखता हूँ तो इसका जवाब हाज़िर है।
मैं अफ़साना अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे अफ़साना लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है।
मैं अफ़साना न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी।
मैं अफ़साना नहीं लिखता, हकीकत यह है कि अफ़साना मुझे लिखता है। मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ। यूँ तो मैने 20 से ऊपर किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे अफ़साने लिखे हैं, जिन पर आए दिन मुकद्दमे चलते रहते हैं।
जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ़ सआदत हसन होता हूँ जिसे उर्दू आती है न फ़ारसी, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी।
अफ़साना मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती। मैं अपने दिमाग पर ज़ोर देता हूँ कि कोई अफ़साना निकल आए। कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूँकता रहता हूँ मगर अफ़साना दिमाग से बाहर नहीं निकलता है। आख़िर थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ।
अनलिखे अफ़साने के दाम पेशगी वसूल कर चुका हूँ। इसलिए बड़ी कोफ़्त होती है। करवटें बदलता हूँ। उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ। बच्चों का झूला झुलाता हूँ। घर का कूड़ा-करकट साफ़ करता हूँ। जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-जहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ। मगर कम्बख़्त अफ़साना जो मेरी जेब में पड़ा होता है मेरे ज़हन में नहीं उतरता-और मैं तिलमिलाता रहता हूँ।
जब बहुत ज़्यादा कोफ़्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता।
सुना हुआ है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है। मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता। लेकिन हैरत है कि फिर भी मैं हिंदुस्तान और पाकिस्तान का बहुत बड़ा कहानीकार हूँ।
मैं यही कह सकता हूँ कि या तो यह मेरे आलोचकों की खुशफ़हमी है या मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ। उन पर कोई जादू कर रहा हूँ।
माफ़ कीजिएगा, मैं गुसलखाने में चला गया। किस्सा यह है कि मैं खुदा को हाज़िर-नाज़िर रखकर कहता हूँ कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं अफसाना क्यों कर लिखता हूँ और कैसे लिखता हूँ।
अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी बीवी, जो संभव है यहाँ मौजूद है, आई और उसने मुझसे कहा– आप सोचिए नहीं, कलम उठाइए और लिखना शुरू कर दीजिए।
मैं इसके कहने पर कलम या पैंसिल उठाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल ख़ाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई अफसाना उछलकर बाहर आ जाता है।
मैं खुद को इस दृष्टि से कहानीकार, नहीं, जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ-मुझ जैसा भी बेवकूफ़ दुनिया में कोई और होगा?

सआदत हसन मंटो की कहानी –

ख़बरदार

बलवाई मालिक मकान को बड़ी मुश्किलों से घसीटकर बाहर लाए.

कपड़े झाड़कर वह उठ खड़ा हुआ और बलवाइयों से कहने लगा :

“तुम मुझे मार डालो, लेकिन ख़बरदार, जो मेरे रुपए-पैसे को हाथ लगाया………!”

कम्युनिज्म

वह अपने घर का तमाम जरूरी सामान एक ट्रक में लदवाकर दूसरे शहर जा रहा था कि रास्ते में लोगों ने उसे रोक लिया । एक ने ट्रक के सामान पर नजर डालते हुए कहा, ‘‘देखो यार, किस मजे से इतना माल अकेला उड़ाये चला जा रहा है।’’
समान के मालिक ने कहा, ‘‘जनाब माल मेरा है।’’
दो तीन आदमी हंसे, ‘‘हम सब जानते हैं।’’

एक आदमी चिल्लाया, ‘‘लूट लो! यह अमीर आदमी है, ट्रक लेकर चोरियां करता है।’’

पेशकश

पहली धटना नाके के होटल के पास हुयी फौरन ही वहां एक सिपाही का पहरा लगा दिया गया। दूसरी घटना दूसरे ही रोज शाम को स्टोर के सामने हुयी, सिपाही को पहली जगह से हटाकर दूसरी घटना की जगह भेज दिया गया। तीसरा केस रात बारह बजे लांडरी के पास हुआ, जब इंस्पेकटर ने सिपाही को इस नयी जगह पर पहरा देने का हुक्म दिया तो उसने कुछ देर सोचने के बाद कहा, ‘‘मुझे वहां खड़ा कीजिये जहां नयी घटना होने वाली है!’’

करामात

लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किये. लोग लूटा हुआ माल डर के मारे अँधेरे में बाहर फेंकने लगे. कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने मौका पाकर अपना माल भी अपने से अलग कर दिया ताकि कानूनी गिरफ्त से बचे रहें. एक आदमी को बहुत दिक्कतें पेश आई.उसके पास शक्कर की दो बोरियां थी जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थी. एक तो वह रात के अँधेरे में पास वाले कुवें में फेंक आया.दूसरी उठाकर डालने लगा तो खुद भी साथ हो चला.शोर सुनकर लोग इक्कठा हो गए.कुवें में रस्सियाँ डाली गई, जो जवान उतारे और उस आदमी को बाहर निकाल लायें. लेकिन चंद मिनटों में वह मर गया. दुसरे दिन लोगों ने इस्तेमाल के लिए कुवें का पानी निकला, तो वह मीठा था. उसी रात में उस आदमी की कब्र पर दिए जल रहें हैं.

मुझे लघुकथाएँ बहुत पसंद है, क्योंकि इनमे हालात के लिए सटीक टिप्पणी बिना लाग -लपेट के होती है ..आगे भी मैं चुन – चुन कर इन्हें पोस्ट करती रहूंगी . “मेरी पसंद” के लेबल तले.

खुदा की कसम

उधर से मुसलमान और इधर से हिंदू अभी तक आ जा रहे थे। कैंपों के कैंप भरे पड़े थे जिनमें मिसाल के तौर पर तिल धरने के लिए वाकई कोई जगह नहीं थी। लेकिन इसके बावजूद उनमें लोग ठुसे जा रहे थे। गल्ला नाकाफी है , सेहत की सुरक्षा का कोई इंतजाम नहीं , बीमारियां फैल रही हैं , इसका होश किसको था ! एक अफरा – तफरी का वातावरण था।
सन 48 का आरंभ था। संभवत मार्च का महीना था। इधर और उधर दोनों तरफ रजाकारों के जरिए से अपहृत औरतों और बच्चों की बरामदगी का प्रशंसनीय काम शुरू हो चुका था। सैकड़ों मर्द , औरतें , लडके और लड़कियां इस नेक काम में हिस्सा ले रहे थे। मैं जब उनको काम में लगे देखता तो मुझे बड़ी आश्चर्यजनक खुशी हासिल होती। यानी खुद इंसान इंसान की बुराइयों के आसार मिटाने की कोशिश में लगा हुआ था। जो अस्मतें लुट चुकी थीं , उनको और अधिक लूट – खसोट से बचाना चाहता था – किसलिए ?
इसलिए उसका दामन और अधिक धब्बों और दागों से भरपूर न हो ? इसलिए कि वह जल्दी – जल्दी अपनी खून से लिथड़ी उंगलियां चाट ले और अपने जैसे पुरुषों के साथ दस्तरखान पर बैठकर रोटी खाए ? इसलिए कि वह इंसानियत का सुई – धागा लेकर , जब एक – दूसरे आंखें बंद किए हैं , अस्मतों के चाक रफू कर दे। कुछ समझ में नहीं आता था लेकिन उन रज़ाकारों की जद्दोजहद फिर काबिले कद्र मालूम होती थी। उनको सैकड़ों मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। हजारों बखेड़े उन्हें उठाने पड़ते थे , क्योंकि जिन्होंने औरतें और लड़कियां उठाई थीं , अस्थिर थे। आज इधर कल उधर। अभी इस मोहल्ले में , कल उस मोहल्ले में। और फिर आसपास के आदमी उनकी मदद नहीं करते थे। अजीब अजीब दास्तानें सुनने में आती थीं।
एक संपर्क अधिकारी ने मुझे बताया कि सहारनपुर
में दो लड़कियों ने पाकिस्तान में अपने मां – बाप के पास जाने से इनकार कर दिया। दूसरे ने बताया कि जब जालंधर में जबर्दस्ती हमने एक लड़की को निकाला तो काबिज के सारे खानदान ने उसे यूं अलविदा कही जैसे वह उनकी बहू है और किसी दूर – दराज सफर पर जा रही है। कई लड़कियों ने मां – बाप के खौफ से रास्ते में आत्महत्या कर ली। कुछ सदमे से पागल हो चुकी थीं , कुछ ऐसी भी थी जिन्हें शराब की लत पड़ चुकी थी। उनको प्यास लगती तो पानी की बजाय शराब मांगती और नंगी – नंगी गालियां बकतीं। मैं उन बरामद की हुई लड़कियों और औरतों के बारे में सोचता तो मेरे मन में सिर्फ फूले हुए पेट उभरते। इन पेटों का क्या होगा ? उनमें जो कुछ भरा है , उसका मालिक कौन बने , पाकिस्तान या हिंदुस्तान ? और वह नौ महीने की बारवरदारी , उसकी उज्रत पाकिस्तान अदा करेगा या हिंदुस्तान ? क्या यह सब जालिम फितरत या कुदरत के बहीखाते में दर्ज होगा ? मगर क्या इसमें कोई पन्ना खाली रह गया है ?
बरामद औरतें आ रही थीं , बरामद औरतें जा रही थीं। मैं सोचता था ये औरतें भगाई हुईं क्यों कहलाई जाती थीं ? इन्हें अपहृत कब किया गया है ? अपहरण तो बड़ा रोमैंटिक काम है जिसमें मर्द और औरतें दोनों शामिल होते हैं। वह एक ऐसी खाई है जिसको फांदने से पहले दोनों रूहों के सारे तार झनझना उठते हैं। लेकिन यह अगवा कैसा है कि एक निहत्थी को पक़ड़ कर कोठरी में कैद कर लिया ?
लेकिन वह जमाना ऐसा था कि तर्क – वितर्क और फलसफा बेकार चीजें थीं। उन दिनों जिस तरह लोग गर्मियों में भी दरवाजे और खिड़कियां बंद कर सोते थे , इसी तरह मैंने भी अपने दिल – दिमाग में सब खिड़कियां दरवाजे बंद कर लिये थे। हालांकि उन्हें खुला रखने की ज्यादा जरूरत उस वक्त थी , लेकिन मैं क्या करता। मुझे कुछ सूझता नहीं था। बरामद औरतें आ रही थीं। बरामद औरतें जा रही थीं। यह आवागमन जारी था , तमाम तिजारती विशेषताओं के साथ। और पत्रकार , कहानीकार और शायर अपनी कलम उठाए शिकार में व्यस्त थे। लेकिन कहानियों और नजमों का एक बहाव था जो उमड़ा चला आ रहा था। कलमों के कदम उखड़ – उखड़ जाते थे। इतने सैद थे कि सब बौखला गए थे। एक संपर्क अधिकारी मुझसे मिला। कहने लगा , तुम क्यों गुमसुम रहते हो ? मैंने कोई जवाब न दिया। उसने मुझे एक दास्तान सुनाई।
अपहृत औरतों की तलाश में हम मारे – मारे
फिरते हैं। एक शहर से दूसरे शहर , एक गांव से दूसरे गांव , फिर तीसरे गांव फिर चौथे। गली – गली , मोहल्ले – मोहल्ले , कूचे – कूचे। बड़ी मुश्किलों से लक्ष्य मोती हाथ आता है।
मैंने दिल में कहा , कैसे मोती … मोती , नकली या असली ?
तुम्हें मालूम नहीं हमें कितनी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है , लेकिन मैं तुम्हें एक बात बताने वाला था। हम बॉर्डर के इस पार सैकड़ों फेरे कर चुके हैं। अजीब बात है कि मैंने हर फेरे में एक बुढ़िया को देखा। एक मुसलमान बुढ़िया को – अधेड़ उम्र की थी। पहली बार मैंने उसे जालंधर में देखा था – परेशान , खाली दिमाग , वीरान आंखें , गर्द व गुबार से अटे हुए बाल , फटे हुए कपड़े। उसे तन का होश था न मन का। लेकिन उसकी निगाहों से यह जाहिर था कि किसी को ढूंढ रही है। मुझे बहन ने बताया कि यह औरत सदमे के कारण पागल हो गई है। पटियाला की रहने वाली है। इसकी इकलौती लड़की थी जो इसे नहीं मिलती। हमने बहुत जतन किए हैं उसे ढूंढने के लिए मगर नाकाम रहे हैं। शायद दंगों में मारी गई है , मगर यह बुढ़िया नहीं मानती। दूसरी बार मैंने उस पगली को सहारनपुर के बस अड्डे पर देखा। उसकी हालत पहले से कहीं ज्यादा खराब और जर्जर थी। उसके होठों पर मोटी मोटी पपड़ियां जमी थीं। बाल साधुओं के से बने थे। मैंने उससे बातचीत की और चाहा कि वह अपनी व्यर्थ तलाश छोड़ दे। चुनांचे मैंने इस मतलब से बहुत पत्थरदिल बनकर कहा , माई तेरी लड़की कत्ल कर दी गई थी।
पगली ने मेरी तरफ देखा , ‘ कत्ल ?… नहीं। ’ उसके लहजे में फौलादी यकीन पैदा हो गया। ‘ उसे कोई कत्ल नहीं कर सकता। मेरी बेटी को कोई कत्ल नहीं कर सकता। ’ और वह चली गई अपनी व्यर्थ तलाश में। मैंने सोचा , एक तलाश और फिर … । लेकिन पगली को इतना यकीन था कि उसकी बेटी पर कोई कृपाण नहीं उठ सकती। कोई तेजधार या कुंद छुरा उसकी गर्दन पर नहीं बढ़ सकता। क्या वह अमर थी ? या क्या उसकी ममता अमर थी ? ममता तो खैर अमर होती है। फिर क्या वह अपनी ममता ढूंढ रही थी। क्या इसने उसे कहीं खो दिया ? तीसरे फेरे पर मैंने उसे फिर देखा। अब वह बिल्कुल चीथड़ों में थी। करीब – करीब नंगी। मैंने उसे कपड़े दिए मगर उसने कुबूल न किए। मैंने उससे कहा , माई मैं सच कहता हूं , तेरी लड़की पटियाले में ही कत्ल कर दी गई थी।
उसने फिर फौलादी यकीन के साथ कहा , ‘ तू झूठ कहता है। ’
मैंने उससे अपनी बात मनवाने की खातिर कहा , ‘ नहीं मैं सच कहता हूं। काफी रो – पीट लिया है तुमने। चलो मेरे साथ मैं तुम्हें पाकिस्तान ले चलूंगा। ’ उसने मेरी बात न सुनी और बड़बड़ाने लगी। बड़बड़ाते हुए वह एकदम चौंकी। अब उसके लहजे में यकीन फौलाद से भी ठोस था , ‘ नहीं मेरी बेटी को कोई कत्ल नहीं कर सकता। ’
मैंने पूछा , क्यों ?
बुढ़िया ने हौले – हौले कहा , ‘ वह खूबसूरत है। इतनी खूबसूरत कि कोई कत्ल नहीं कर सकता। उसे तमाचा तक नहीं मार सकता। ’

मैं सोचने लगा , क्या वाकई वह इतनी खूबसूरत
थी। हर मां की आंखों में उसकी औलाद चांद का टुकड़ा होती है। लेकिन हो सकता है वह लड़की वास्तव में खूबसूरत हो। मगर इस तूफान में कौन सी खूबसूरती है जो इंसान के खुरदरे हाथों से बची है। हो सकता है पगली इस थोथे ख्याल को धोखा दे रही हो। फरार के लाखों रास्ते हैं। दुख एक ऐसा चौक है जो अपने इर्दगिर्द लाखों बल्कि करोड़ों सड़कों का जाल बना देता है।
बॉर्डर के इस पार कई फेरे हुए। हर बार मैंने उस पगली को देखा। अब वह हड्डियों का ढांचा रह गई थई। नजर कमजोर हो गई थीं। टटोल – टटोलकर चलती थी , लेकिन उसकी तलाश जारी थी। बड़ी तल्लीनता से। उसका यकीन उसी तरह स्थिर था कि उसकी बेटी जिंदा है। इसलिए कि उसे कोई मार नहीं सकता।
बहन ने मुझसे कहा , ‘ इस औरत से मगजमारी फिजूल है। इसका दिमाग चल चुका है। बेहतर यही है कि तुम इसे पाकिस्तान ले जाओ और पागलखाने में दाखिल करा दो। ’
मैंने उचित न समझा। उसकी यह भ्रामक तलाश तो उसकी जिंदगी का एकमात्र सहारा थी। जिसे मैं उससे छीनना नहीं चाहता ता। मैं उसे एक लंबे – चौड़े पागलखाने से , जिससे वह मीलों की यात्रा तय करके अपने पांवों के आंबलों की प्यार बुझा ही थी , उठाकर एक छोटी सी चारदीवारी में कैद करना नहीं चाहता था।
आखरी बार मैंने उसे अमृतसर में देखा। उसकी दयनीय स्थिति ऐसी थी कि मेरी आंखों में आंसू आ गए। मैंने फैसला कर लिया कि उसे पाकिस्तान ले जाऊंगा और पागलखाने में दाखिल करा दूंगा। एक फरीद के चौक में खड़ी अपनी आधी अंधी आंखों से इधर – उधर देख रही थी। चौक में काफी चहलपहल थी। मैं बहन के साथ एक दुकान पर बैठा एक अपहृत ल़ड़की के बारे में बात कर रहा था , जिसके बारे में हमें यह सूचना मिली थी कि वह बाजार सबूनिया में एक हिंदू बनिये के घर मौजूद है। यह गुफ्तगू खत्म हुई कि मैं उठा कि उस पगली को झूठसच कहकर पाकिस्तान ले जाने के लिए तैयार करूं। तभी एक जोड़ा उधर से गुजरा। औरत ने घूंघट निकाला हुआ था। छोटा सा घूंघट। उसके साथ एक सिख नौजवान था। बड़ा छैलछबीला , तंदुरुस्त। तीखे – तीखे नक्शों वाला। जब ये दोनों उस पगली के पास से गुजरे तो नौजवान एकदम ठिठक गया। उसने दो कदम पीछे हटकर औरत का हाथ पकड़ लिया। कुछ इस अचानक तौर पर कि लड़की ने अपने छोटा सा घूंघट उठाया। लट्ठे की धुली हुई सफेद चादर के चौखटे में मुझे एक ऐसा गुलाबी चेहरा नजर आया जिसका हुस्न बयान करने में मेरी जबान लाचार है। मैं उनके बिल्कुल पास था। सिख नौजवान ने सौंदर्य की देवी से उस पगली की तरफ इशारा करते हुए धीमे से कहा , तुम्हारी मां।
लड़की ने एक पल के लिए पगली की तरफ देखा और घूंघट छोड़ दिया और सिख नौजवान का बाजू पकड़कर भींचे हुए लहजे में कहा , चलो।
और वे दोनों सड़क से जरा इधर हटकर तेजी से आगे निकल गए। पगली चिल्लाई , ‘ भागभरी … भागभरी। ’
वह सख्त परेशान थी। मैंने पास जाकर उससे पूछा , ‘ क्या बात है माई ?’
वह कांप रही थी , ‘ मैंने उसको देखा है .. मैंने उसको देखा है। ’
मैंने पूछा , ‘ किसे ?’
उसके माथे के नीचे दो गड्ढों में उसकी आंखों के बेनूर ढेले हरकत कर रहे थे , ‘ अपनी बेटी को … भागभरी को। ’
मैंने फिर उससे कहा , ‘ वह मर – खप चुकी है माई। ’
उसने चीखकर कहा , ‘ तुम झूठ कहते हो। ’
मैंने इस बार उसे पूरा यकीन दिलाने की खातिर कहा , ‘ मैं खुदा की कसम खाकर कहता हूं , वह मर चुकी है। ’
यह सुनते ही वह पगली चौक में ढेर हो गई।

घाटे का सौदा

बू

बरसात के यही दिन थे. खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह नहा रहे थे सागवन के स्प्रिन्गदार पलंग पर, जो अब खिड़की के पास थोड़ा इधर सरका दिया गया, एक घाटन लड़की रणधीर के साथ लिपटी हुई थी.

खिड़की के पास बाहर पीपल के पत्ते रात के दुधिया अंधेरे में झुमरों की तरह थरथरा रहे थे, और शाम के समय, जब दिन भर एक अंग्रेजी अखबार की सारी खबरें और इश्तहार पढ़ने के बाद कुछ सुस्ताने के लिये वह बालकनी में आ खड़ा हुआ था तो उसने उस घाटन लड़की को, जो साथवाले रस्सियों के कारखाने में काम करती थी और बारिश से बचने के लिये इमली के पेड़ के नीचे खड़ी थी, खांस-खांसकर अपनी तरफ आकर्षित कर लिया था और उसके बाद हाथ के इशारे से ऊपर बुला लिया था.

वह कई दिनों की बेहद तनहाई से उकता गया था. विश्वयुद्ध के चलते मुम्बई की लगभग तमाम ईसाई छोकरियां, जो अमूमन सस्ते दामों में मिल जाया करती थीं, वैसी जवान औरत और कमसीन लड़की अंग्रेजी फौज में भरती हो गई थीं. उनमें से कईयों ने फोर्ट के इलाके में डांस स्कूल खोल लिये थे, वहां सिर्फ फौजी गोरों को जाने की इजाजत थी.

इन हालत के चलते रणधीर बहुत उदास हो गया था. जहां उसकी उदासी का कारण यह था कि क्रिश्चियन छोकरियां दुर्लभ हो गई थीं वहीं दुसरा यह कि फौजी गोरों के मुकाबले में कहीं ज्यदा सभ्य, पढ़ा-लिखा और खूबसूरत नौजवान होने के बावजूद रणधीर के लिये फोर्ट के लगभग तमाम दरवाजे बंद हो चुके थे, क्योंकि उसकी चमड़ी सफेद नहीं थी.

जंग के पहले रणधीर नागपाड़ा और ताजमहल होटल की कई मशहूर क्रिश्चियन छोकरियों से जिस्मानी रिश्ते कायम कर चुका था, उसे अच्छी तरह पता था कि इस किस्म के संबंधों के आधार पर वह उन क्रिश्चियन लड़कों के मुकाबले क्रिश्चियन लड़कीयों के बारे में कहीं ज्यदा जानकारी रखता था जिनसे ये छोकरियां फैशन के तौर पर रोमांस लड़ाती हैं और बाद में उन्हीं में से किसी बेवकूफ से शादी कर लेती हैं.

रणधीर ने महज हैजल से बदला लेने की खातिर उस घाटन लड़की जो अलह्ड़ मस्त जवानी से भरी हुई जवान लड़की थी को ऊपर बुलाया था. हैजल उसके फ्लैट के नीचे रहती थी. वह रोज सुबह वर्दी पहनकर कटे हुए बालों पर खाकी रंग की टोपी तिरछे कोण से जमा कर बाहर निकलती थी और ऎसे बांकापन से चलती थी, जैसे फुटपाथ पर चलने वाले सभी लोग टाट की तरह उसके कदमों में बिछते चले जाएंगे. रणधीर सोचता था कि आखिर क्यों वह उन क्रिश्चियन छोकरियों की तरफ इतना ज्यदा रीझा हुआ है. इस में कोई शक नहीं कि वे मनचली लड़कियां अपने जिस्म की तमाम दिखाई जा सकने वाली चीजों की नुमाइश करती हैं. किसी किस्म की झिझक महसूस किये बगैर मनचली लड़की अपने कारनामों का जिक्र कर देती हैं. अपने बीते हुए पुराने रोमांसों का हाल सुना देती हैं. यह सब ठीक है, लेकिन किसी दूसरी जवान औरत में भी ये खूबियां हो सकती हैं.

रणधीर ने जब घाटन लड़की को इसारे से ऊपर बुलाया था तो उसे इस बात का कतई अंदाज नहीं था कि वह उसे अपने साथ सुला भी लेगा. वह तो इसके वहां आने के थोड़ी देर के बाद उसके भीगे हुए कपड़े देखकर यह शंका मन में उठी थी कि कहीं ऎसा न हो कि बेचारी को निमोनिया हो जाए. सो रणधीर ने उससे कहा था, “ ये कपड़े उतार दो, सर्दी लग जाएगी ”.

वह रणधीर की इस बात का मतलब समझ गई थी. उसकी आखों में शर्म के लाल डोरे तैर गए थे. फिर भी जब रणधीर ने अपनी धोती निकालकर दी तो कुछ देर सोचकर अपना लहंगा उतार दिया, जिस पर मैल भीगने के कारण और भी उभर आया था.

लहंगा उतारकर उसने एक तरफ रख दिया और अपनी रानों पर जल्दी से धोती डाल ली. फिर उसने अपनी भींची-भींची टांगों से ही चोली उतारने की कोशिश की जिसके दोनों किनारों को मिलाकर उसने एक गांठ दे रखी थी. वह गांठ उसके तंदुरुस्त सीने के नन्हे लेकिन सिमटे गड्ढे में छिप गई थी.

कुछ देर तक वह अपने घिसे हुए नाखूनों की मदद से चोली की गांठ खोलने की कोशिश करती रही जो भीगने के कारण बहुत ज्यदा मजबूत हो गई थी. जब थक हार के बैठ गई तो उसने मरठी में रनधीर से कुछ कहा, जिसका मतलब यह था, “ मैं क्या करुं, नहीं निकलती ”.

रणधीर उसके पास बैठ गया और गांठ खोलने लगा. जब नहीं खुली तो उसने चोली के दोनों सिरे दोनों हाथों से पकड़कर इतनी जोर का झटका दिया कि गंठ सरसराती सी फैल गई और इसी के साथ दो धड़कती हुई छातियां एकाएक उजागर हो गईं. क्षणभर के लिये रण्धीर ने सोचा कि उसके अपने हाथों से उस घाटन की लड़की के सीने पर नर्म-नर्म गुंथी हुई मिट्टी को कमा कर कुम्हार की तरह दो प्यालियों की शक्ल बना दी है.

उसकी भरी-भरी सेहतमंद उरोजों में वही धड़कन, वही गोलाई, वही गरम-गरम ठंडक थी, जो कुम्हार के हाथ से निकले हुए ताजे बरतनों में होती है.

मटमैले रंग की उन कुंवारी और जवान औरत की उरोजों ने एक अजीब किस्म की चमक पैदा कर दी थी जो चमक होते हुए भी चमक नहीं थी. उसके सीने पर ये उभार दो दीये मालूम होते थे जो तालब के गंदेले पानी पर जल रहे होने का आभास दे रहे थे.

बरसात के यही दिन थे. खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते इसी तरह कंपकंपा रहे थे. उस घाटन लड़की के दोनों कपड़े, जो पानी से सराबोर हो चुके थे, एक गंदेले ढेर की सूरत में फर्श पर पड़े थे और वह घाटन की नंगी लड़की रणधीर के साथ चिपटी हुई थी. उसके नंगे बदन की गर्मी रणधीर के बदन में हलचल पैदा कर रही थी, जो सख्त जाड़े के दिनों मेम नाइयों के गलीज लेकिन गरम हमामों में नहाते समय महसूस हुआ करती है.

दिन भर वह रणधीर के साथ चिपटी रही. दोनों एक दूसरे के साथ गड्डमड्ड हो गए थे. उन्होंने मुश्किल से एक दो बातें की होंगी, क्योंकि जो कुछ भी कहना सुनना था, सांसों, होंठों और हाथों से तय हो रहा था. रणधीर के हाथ सारी रात उसकी नर्म-नर्म उरोजों पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे. उन हवाई झोंकों से उस घाटन लड़की के बदन में एक ऎसी सरसराहट पैदा होती थी कि खुद रणधीर भी कांप उठता था.

इस कंपकंपाहट से रणधीर का पहले भी सैकड़ों बार वास्ता पड़ चुका था. वह काम वासना से भरी हुई लड़की के मजे भी बखूबी जानता था. कई लड़कियों के नर्म और नाजुक लेकिन सख्त स्तनों से अपना सीना मिलाकर वह कई रातें गुजार चुका था. वह ऎसी बिलकुल अल्हड़ लड़कियों के साथ भी रह चुका था जो उसके साथ लिपट कर घर की वे सारी बातें सुना दिया करती थीं जो किसी गैर कानों के लिये नहीं होतीं. वो ऎसी कमीनी लड़की से भी जिस्मानी रिश्ता कायम कर चुका था जो सारी मेहनत खुद करती थीं और उसे कोई तकलीफ नहीं देती थीं. उसे कई समाजिक रुप से बदचलन लड़की और बदचलन औरत का भी अनुभव था जिसे वह बहुत ही रुहानी मानता था.

लेकिन यह घाटन की लड़की, जो इमली के पेड़ के नीचे भीगी हुई खड़ी थी और जिसे उसने इशारे से ऊपर बुला लिया था, बिलकुल भिन्न किस्म की लड़की थी.

सारी रात रणधीर को उसके जिस्म से एक अजीब किस्म की बू आती रही. इस बू को, जो एक हीं समय में खुशबू थी और बदबू भी, वह सारी रात पीता रहा. उसकी बगलों से, उसकी छातियों से, उसके बालों से, उसकी चमड़ी से, उसके जवान जिस्म के हर हिस्से से यह जो बदबू भी थी और खूशबू भी, रणधीर के पूरे शरीर में बस गई थी. सारी रात वह सोचता रहा था कि यह घाटन लड़की बिलकुल करीब हो कर भी हरगिज इतनी करीब नहीं होती, अगर उसके जिस्म से यह बू न उड़ती. यह बू उसके मन-मस्तिष्क की हर सल्वट में रेंग रही थी. उसके तमाम नए-पुराने अनुभवों में रच-बस गई थी.

उस बू ने उस लड़की और रणधीर को जैसे एक-दूसरे से एकाकार कर दिया था. दोनों एक-दूसरे में समा गए थे. उन अनंत गहराईयों में उतर गए थे जहां पहुंच कर इंसान एक खालिस इंसान की संतुष्टि से सरबोर होता है. ऎसी संतुष्टि, जो क्षणिक होने पर भी अनंत थी. लगातार बदलती हुई होने पर भी द्र्ढ और स्थायी थी, दोनों एक ऎसा जवाब बन गए थे, जो आसमान के नीले शून्य में उड़ते रहने पर भी दिखाई देता रहे.

उस बू को, जो उस घाटन लड़की के अंग-अंग से फूट रही थी, रणधीर बखूबी समझता था, लेकिन समझे हुए भी वह इनका विश्लेषण नहीं कर सकता था. जिस तरह कभी मिट्टी पर पानी छिड़कने से सोंधी-सोंधी बू निकलती है, लेकिन नहीं, वह बू कुछ और हीं तरह की थी. उसमें लेवेंडर और इत्र की मिलावट नहीं थी, वह बिलकुल असली थी, औरत और मर्द के शारीरिक संबंध की तरह असली और पवित्र.

रणधीर को पसीने की बू से सख्त नफरत थी. नहाने के बाद वह हमेशा बगलों वैगेरह में पाउडर छिड़कता था या कोई ऎसी दवा इस्तेमाल करता था, जिससे वह बदबू जती रहे, लेकिन ताज्जुब है कि उसने कई बार, हां कई बार, उस घाटन लड़की की बालों भरी बगलों का चुम्मा लिया. उसने चूमा और उसे बिलकुल घिन नहीं आई, बल्कि एक अजीब किस्म की तुष्टि का एहसास हुआ. रणधीर को ऎसा लगता था कि वह इस बू को जानता है, पहचानता है, उसका अर्थ भी पहचानता है, लेकिन किसी को समझा नहीं सकता.

बरसात के यही दिन थे. यूं ही खिड़की के बाहर जब उसने देखा तो पीपल के पत्ते उसी तरह नहा रहे थे. हवा में फड़फड़ाहटें घुली हुई थी. अंधेरा थ, लेकिन उसमें दबी-दबी धुंधली – सी रोशनी समाई हुई थी. जैसे बरिश की बुंदों के सौ सितरों का हल्का-हल्का गुब्बारा नीचे उतर आया हो. बरसात के यही दिन थे, जब रणधीर के उस कमरे में सागवान का सिर्फ़ एक ही पलंग था. लेकिन अब उस से सटा हुआ एक और पलंग भी था और कोने में एक नई ड्रेसिंग टेबल भी मौजूद थी. दिन यही बरसात के थे. मौसम भी बिलकुल वैसा ही था. बारिश की बूंदों के साथ सितारों की रोशनी का हल्का-हल्का गुब्बार उसी तरह उतर रहा था, लेकिन वातावरण में हिना की तेज खूशबू बसी हुई थी. दूसरा पलंग खाली था. इस पलंग पर रणधीर औंधे मुंह लेटा खिड़की के बाहर पीपल के झुमते हुए पत्तों का नाच देख रहा था.

एक गोरी – चिट्टी लड़की अपने नंगे जिस्म को चादर से छुपाने की नाकाम कोशिश करते करते रणधीर के और भी करीब आ गई थी. उसकी सुर्ख रेशमी सलवार दूसरे पलंग पर पड़ी थी जिसके गहरे सुर्ख रंग के हजार्बंद का एक फुंदना नीचे लटक रहा था. पलंग पर उसके दूसरे कपड़े भी पड़े थे. सुनहरी फूलदार जम्फर, अंगिया, जांधिया और मचलती जवानी की वह पुकार, जो रणधीर ने घाटन लड़की के बदन की बू में सूंघी थी. वह पुकार, जो दूध के प्यासे बच्चे के रोने से ज्यादा आनंदमयी होती है. वह पुकार जो स्वप्न के दायरे से निकल कर खामोश हो गई थी.

रणधीर खिड़की के बाहर देख रहा था. उसके बिलकुल करीब पीपल के नहाये हुए पत्ते झूम रहे थे. वह उनकी मस्तीभरी कम्पन के उस पार कहीं बहुत दूर देखने की कोशिश कर रहा था, जहां गठीले बादलों में अजीब किस्म की रोशनी घुली हुई दिखाई दे रही थी. ठीक वैसे ही जैसे उस घाटन लड़की के सीने में उसे नजर आई थी ऎसी रोशनी जो पुरैसरार गुफ्तगु की तरह दबी लेकिन स्पष्ट थी.

रणधीर के पहलू में एक गोरी – चिट्टी लड़की, जिसका जिस्म दूध और घी में गुंथे आटे की तरह मुलायम था, उस जवान औरत की उरोजों में मक्खान सी नजाकत थी. लेटी थी. उसके नींद में मस्त जवान लड़की के मस्त नंगे बदन से हिना के इत्र की खुशबू आ रही थी जो अब थकी-थकी सी मालूम होती थी. रणधीर को यह दम तोड़ती और जुनून की हद तक पहुंची हुई खुशबू बहुत बुरी मालूम हुई. उसमें कुछ खटास थी, एक अजीब किस्म की खटास, जैसे बदहजमी में होती है, उदास, बेरंग, बेचैन.

रणधीर ने अपने पहलू में लेटी हुई लड़की को देखा. जिस तरह फटे हुए दूध के बेरंग पानी में सफेद मुर्दा फुटकियां तैरने लगती हैं, उसी तरह इस लड़की के दूधिया जिस्म पर खराशें और धब्बे तैर रहे थे और … हिना की ऊटपटांग खुशबू. दरअसल रणधीर के मन – मस्तिष्क में वह बू बसी हुई थी, जो घाटन लड़की के जिस्म से बिना किसी बहरी कोशिश के स्वयं निकल रही थी. वह बू जो हिना के इत्र से कहीं ज्यदा हल्की – फुल्की और रस में डूबी हुई थी, जिसमें सूंघे जाने की कोशिश शामिल नहीम थी. वह खुद – ब – खुद नाक के रास्ते अंदर घुस अपनी सही मंजिल पर पहुंच जाती थी.

लड़की के स्याह बालों में चांदी के बुरादे के कण की तह जमे हुए थे. चेहरे पर पाउडर, सुर्खी और चांदी के बुरादे के इन कणों ने मिल – जुल कर एक अजीब रंग पैदा कर दिया था. बेनाम सा उड़ा – उड़ा रंग और उसके गोरे सीने पर कच्चे रंग की अंगिया ने जगह – जगह सुर्ख ध्ब्बे बना दिये थे.

लड़की की छातियां दूध की तरह सफेद थी. उनमें हल्का – हल्का नीलापन भी थी. बगलों में बाल मुंड़े हुए थे, जिसकी वजह से वहां सुरमई गुब्बार सा पैदा हो गया था. रणधीर लड़की की तरफ देख-देख्कर कई बार सोच चुका था, क्यों ऎसा नहीं लगता, जैसे मैने अभी-अभी कीलें उखाड़कर उसे लकड़ी के बंद बक्से से निकाला हो? अमूमन किताबों और चीनी के बर्तनों पर जैसी हल्की हल्की खराशें पड़ जाती हैं, ठीक उसी प्रकार उस लड़की के नंगी जवान जिस्म पर भी कई निशान थी.

जब रणधीर ने उसके तंग और चुस्त अंगिया की डोरियां खोली थी तो उसकी पीठ और सामने सीने पर नर्म – नर्म गोश्त की झुर्रियां सी दिखाई दी थी और कमर के चारों तरफ कस्कर बांधे हुए इजार्बद का निशान भी. वजनी और नुकीले नेक्लेस से उसके सीने पर कई जगह खराशें पड़ गई थीं, जैसे नाखूनों से बड़े जोर से खुजलाया गया हो.

बरसात के यही दिन थे, पीपल के नर्म नर्म पत्तों पर बारिश की बूंदें गिरने से वैसी ही आवाज पैदा हो रही थी, जैसी रण्धीर उस दिन सारी रात सुनता रहा था. मौसम बेहद सुहाना था. ठंडी ठंडी हवा चल रही थी . उसमें हिना के इत्र की तेज खुशबू घुली हुई थी.

रणधीर के हाथ देर तक उस गोरी लड़की के क्च्चे दूध की तरह सफेद स्तनों पर हवा के झोंकों की तरह फिरते रहे थे. उसकी अंगुलियों ने उस गोरे गोरे बदन में कई चिनगारियां दौड़ती हुई महसूस की थीम. उस नाजुक बदन में कई जगहों पर सिमटे हुए क्म्पन का भी उसे पता चला था. जब उसने अपना सीना उसके सीना के साथ मिलाया तो रणधीर के जिस्म के हर रोंगटे ने उस लड़की के बदन के छिड़े तारों की भी आवाज सुनी थी, मगर वह आवाज कहां थी?

रणधीर ने आखिरी कोशिश के तौर पर उस लड़की के दूधिया जिस्म पर हाथ फेरा, लेकिन उसे कोई कपंकंपी महसूस नहीं हुई. उसकी नई नवेली दुल्हन, जो कमशीन कली थी, जो फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट की बेटी थी और जो अपने कालेज के सैकड़ों दिलों की धड़कन थी, रणधीर की किसी भी चेतना को छू न सकी. वह हिना की खुशबू में उस बू को तलाश रहा था, जो इन्हीं दिनों जब खिड़की के बाहर पीपल के पत्ते बारिश में नहा रहे थे, उस घाटन लड़की के मैले बदन से आई थी.

खोल दो

फुंदने

कोठी से मुलहका (मिला हुआ) वसीअ-ओ-अरीज (लंबा-चौडा) बाग में झाडियों के पीछे एक बिल्ली ने बच्चे दिए थे जो बिल्ला खा गया था। फिर एक कुतियां ने बच्चे दिए थे जो बडे हो गए और दिन-रात कोठी के अंदर भौंकते और गंदगी बिखेरते रहते थे। उनको जहर दे दिया गया था… एक-एक करके सब मर गए थे, उनकी मां भी… उनका बाप मालूम नहीं कहां था, वो होता तो उसकी मौत भी यकीनी थी।

जाने कितने बरस गुजर चुके थे… कोठी से मुलहका बाग की झाडियां सैकडों, हजारों मर्तबा कतरब्यौंती, काटी-छांटी जा चुकी थीं। कई बिल्लियों और कुत्तों ने उनके पीछे बच्चे दिए थे जिनका नाम-ओ-निशान भी न रहा था… उसकी अक्सर बदआदत (बुरी आदत) मुर्गियां वहां अंडे दे दिया करती थीं जिनको हर सुबह उठाकर वो ले जाती थीं।

उसी बाग में किसी आदमी ने उनकी नौजवान मुलाजिमा (नौकरानी) को बडी बेदर्दी से कत्ल कर दिया था… उसके गले में उसका फुंदनों वाला सुर्ख रेशमी इजारबंद जो उसने दो रोज पहले फेरी वाले से आठ आने में खरीदा था फंसा हुआ था। इस जोर से कातिल ने पेच दिए थे कि उसकी आंखें बाहर निकल आई थीं।

उसको देखकर उसको इतना तेज बुखार चढा था कि बेहोश हो गई थी… और शायद अभी तक बेहोश थी, लेकिन नहीं ऐसा क्यों कर हो सकता था इसलिए कि इस कत्ल के देर बाद मुर्गियों ने अंडे नहीं बिल्लियों ने बच्चे दिए थे और एक शादी हुई थी। कुतिया थी जिसके गले में लाल दुपट्टा था, मुकैशी… झिलमिल करता। उसकी आंखें बाहर निकली हुई नहीं थी, अंदर धंसी हुई थीं।

बाग में बैंड बजा था… सुर्ख वर्दियों वाले सिपाही आए थे जो रंग-बिरंगी मशकें बगलों में दबाकर मुंह से अजीब-अजीब आवाजें निकालते थे। उनकी वर्दियों के साथ कई फुंदने लगे थे जिन्हें उठा-उठाकर लोग अपने इजारबंदों में लगाते जाते थे… पर जब सुबह हुई थी तो उनका नाम-ओ-निशान तक नहीं था… सबको जहर दे दिया था।

दुल्हन को जाने क्या सूझी कमबख्त ने झाडियों के पीछे नहीं अपने बिस्तर पर सिर्फ एक बच्चा दिया … जो बडा गुलगुथना था। उसकी मां मर गई थी… बाप भी … दोनों को बच्चे ने मारा… उसका बाप मालूम नहीं कहां था। वो होता तो उसकी मौत भी इन दोनों के साथ होती।
सुर्ख वर्दियों वाले सिपाही बडे-बडे फुंदने लटकाए जाने कहां गायब हुए कि फिर न आए। बाग में बिल्ले घूमते थे जो उसे ढूंढते थे, उसको छिछडों की भरी हुई टोकरी समझते थे हालांकि टोकरी में नारंगियां थीं।

एक दिन उसने अपनी दो नारंगियां निकाल के सामने रख दीं। उसके पीछे हो के उसने उनको देखा, मगर नजर न आईं उसने सोचा उसकी वजह ये है कि छोटी हैं। मगर वो उसके सोचते-सोचते ही बडी हो गई और उसने रेशमी कपडे में लपेटकर आतिशदान पर रख दीं।
अब कुत्ते भौंकने लगे… नारंगियां फर्श पर लुढकने लगीं… कोठी के हर फर्श पर उछलीं, हर कमरे में कूदीं, और उछलती-कूदती बडे-बडे बागों में भागने-दौडने लगीं… कुत्ते उनसे खेलते और आपस में लडते-झगडते रहते। जाने क्या हुआ। इन कुत्तों में दो जहर खा के मर गए जो बाकी बचे वो उनकी अधेड-उम्र की हट्टी-कट्टी मुलाजिमा खा गई।

ये उस नौजवान की जगह आई थी जिसको किसी आदमी ने कत्ल कर दिया था, गले में उसके फुंदनोंवाले इजारबंद का फंदा डालकर।
उसकी मां थी। अधेड उम्र की मुलाजिमा से उम्र में छह-सात बरस बडी। उसकी तरह हट्टी-कट्टी नहीं थी। हर रोज सुबह-शाम मोटर में सैर को जाती थी और बदआदत मुर्गियों की तरह दूर-दराज बागों में झाडियों के पीछे अंडे देती थी। उनको वो खुद उठाकर लाती थी न ड्राइवर।
आमलेट बनाती थी जिसके दाग कपडों पर पड जाते थे। सूख जाते तो उनको बाग में झाडियों के पीछे फेंक देती थी जहां से चीलें उठाकर ले जाती थी।

एक दिन उसकी सहेली आई… पाकिस्तान मेल मोटर नम्बर पी.एल. 9612 । बडी गर्मी थी। डैडी पहाड पर थे, मम्मी सैर करने गई हुई थी… पसीने छूट रहे थे। उसने कमरे में दाखिल होते ही अपनी ब्लाउज उतारी और पंखे के नीचे खडी हो गई। उसके दूध उबले हुए थे जो आहिस्ता-आहिस्ता ठंडे हो गए। उसके दूध ठंडे थे जो आहिस्ता-आहिस्ता उबलने लगे। आखिर दोनों दूध हिल-हिल के गुनगुने हो गए और खट्टी लस्सी बन गए।

उस सहेली का बैंड बज गया… मगर वो वर्दी वाले सिपाही फुंदने नचाते न आए। उनकी जगह पीतल के बर्तन थे… छोटे और बडे जिनसे आवाजें निकलती थीं। गरजदार और धीमी… धीमी और गरजदार।

ये सहेली जब फिर मिली तो उसने बताया कि वो बदल गई है। सचमुच बदल गई थी। उसके अब दो पेट थे। एक पुराना, दूसरा नया। एक के ऊपर दूसरा चढा हुआ था। उसके दूध फटे हुए थे।
फिर उसके भाई का बैंड बजा… अधेड उम्र की हट्टी-कट्टी उम्र की मुलाजिमा बहुत रोई। उसके भाई ने उसको बहुत दिलासा दिया, बेचारी को अपनी शादी याद आ गई थी।

रातभर उसके भाई और उसकी दुल्हन की लडाई होती रही, वो रोती रही वो हंसता रहा… सुबह हुई तो अधेड उम्र की हट्टी-कट्टी मुलाजिमा उसके भाई को दिलासा देने के लिए अपने साथ ले गई। दुल्हन को नहलाया गया… उसकी सलवार में उसका लाल फुंदनोंवाला इजारबंद पडा था… मालूम नहीं ये दुल्हन के गले में क्यूं न बांधा गया।

उसकी आंखें बहुत मोटी थीं। अगर गला जोर से घोंटा जाता तो वो जिबह किए हुए बकरे की आंखों की तरह बाहर निकल आतीं। और उसको बहुत तेज बुखार चढता मगर पहला तो अभी तक उतरा नहीं … हो सकता है उतर गया हो और ये नया बुखार हो जिसमें वो अभी तक बेहोश है।
उसकी मां मोटर ड्राइवरी सीख रही है… बाप होटल में रहता है। कभी-कभी आता है और अपने लडके से मिलकर चला जाता है। लडका भी कभी-कभी बीवी को घर बुला लेता है। अधेड उम्र की हट्टी-कट्टी मुलाजिमा को दो-तीन रोज के बाद कोई याद सताती है तो रोना शुरू कर देती है वो उसे दिलासा देता है, वो उसे पुचकारती है। और दुल्हन चली जाती है।

अब वो और दुल्हन भाभी दोनों सैर को जाती हैं… सहेली भी पाकिस्तान मेल मोटर नम्बर पी.एल. 9612 सैर करते-करते अजंता जा निकलती है जहां तस्वीरें बनाने का काम सिखाया जाता है। तस्वीरें देखकर तीनों तस्वीरें बन जाती हैं। रंग ही रंग, लाल-पीले, हरे-नीले। सबके सब चीखने वाले हैं। उनको उन रंगों का खालिक (बनानेवाला) चुप कराता है। उसके लंबे-लंबे बाल हैं। सर्दियों और गर्मियों में ओवर-कोट पहनता है। अच्छी शक्ल-ओ-सूरत का है। अंदर बाहर हमेशा खडाऊं इस्तेमाल करता है… अपने रंगों को चुप कराने के बाद खुद चीखना शुरू कर देता है। उसको ये तीनों चुप कराती हैं और बाद में खुद चिल्लाने लगती हैं।

तीनों अजंता में मुजर्रद (अकेला, अविवाहित) आर्ट के सैकडे नमूने बनाती रहीं। एक की हर तस्वीर में औरत के दो पेट होते हैं। मुख्तलिफ (विभिन्न) रंगों के। दूसरी की तस्वीरों में औरत अधेड उम्र की होती है, हट्टी-कट्टी। तीसरी की तस्वीरों में फुंदने ही फुंदने, इजारबंदों का गुच्छा। मुजर्रद तस्वीरें बनती रहीं, मगर तीनों के दूध सूखते रहे … बडी गर्मी थी इतनी कि तीनों पसीने में सराबोर थीं…लगे कमरे के अंदर दाखिल होते ही उन्होंने अपने ब्लाउज उतारे और पंखे के नीचे खडी हो गई। पंखा चलता रहा। दूधों में ठंडक पैदा हुई न गर्मी।

उसी मम्मी दूसरे कमरे में थी। ड्राइवर उसके बदन से मोबिल ऑयल पोंछ रहा था। डैडी होटल में था। जहां उसकी लेडी स्टेनोग्राफर उसके माथे पर यूडीक्लोन मल रही थी।
एक दिन उसका भी बैंड बज गया। उजाड बाग फिर बारौनक हो गया। गमलों और दरवाजों की आराइश (सजावट) अजंता स्टूडियो के मालिक ने की थी। बडी-बडी गहरी लिपिस्टिकें उसके बिखेरे हुए रंग देखकर उड गई। एक जो ज्यादा स्याही-मायल थी, इतनी उडी कि वहीं गिर कर उसकी शागिर्द हो गई।

उसके उरुसी (शादी का) लिबास का डिजाइन भी उसने तैयार किया था। उसने उसी हजारों सम्तें (दिशाएं) पैदा कर दी थीं। ऐन सामने से देखो तो वो मुख्तलिफ रंगों के इजारबंदों का बंडल मालूम होती थी। जरा उधर हट जाओ तो फलों की टोकरी थी। एक तरफ हो जाओ तो खिडकी पर पडा हुआ फुलकारी का पर्दा। अकब (पीछे) में चले जाओ तो कुचले हुए तरबूजों का ढेर। जरा जाबिया (कोण) बदलकर देखो तो टमाटो सास से भरा हुआ मर्तबान। ऊपर से देखो तो यगाना आर्ट, नीचे से देखो तो कीराजी की मुबहम शायरी।

फनशनास निगाहें अश-अश कर उठीं… दूल्हा इस कदर मुताअस्सिर हुआ था कि शादी के दूसरे रोज ही उसने तहैया कर लिया कि वो भी मुजर्रद आर्टिस्ट बन जाएगा। चुनांचे अपनी बीवी के साथ अजंता गया जहां उन्हें मालूम हुआ कि उसकी शादी हो रही है और वो चंद रोज से अपनी होने वाली दुल्हन ही के घर रहता है।

उसकी होने वाली दुल्हन वही गहरे रंग की लिपिस्टिक थी जो दूसरी लिपिस्टिकों के मुकाबले में ज्यादा स्याही-मायल थी। शुरू-शुरू में चंद महीने तक उसके शौहर को उससे और मुजर्रद आर्ट से दिलचस्पी रही। लेकिन जब अजंता स्टूडियो बंद हो गया और उसके मालिक की कहीं से भी सुनबुन न मिली तो उसने नमक का कारोबार शुरू कर दिया जो बहुत नफआ-बख्श था। उस कारोबार के दौरान में उसकी मुलाकात एक लडकी से हुई जिसके दूध सूखे हुए नहीं थे। ये उसको पसंद आ गए। बैंड न बजा लेकिन शादी हो गई। पहली अपने ब्रश उठाकर ले गई। अलग रहने लगी।
ये नाचाकी (मनमुटाव, वैमनस्य) पहले तो दोनों के लिए तलखी का मूजिब (कारण, सबब) हुई, लेकिन बाद में एक अजीब-ओ-गरीब मिठास में तब्दील हो गई। उसकी सहेली ने जो दूसरा शौहर तब्दील करने के बाद सारे यूरोप का चक्कर लगा आई थी और अब दिक (तपेदिक, क्षय रोग) की मरीज थी, इस मिठास को क्यूबिक आर्ट में पेंट किया। साफ शफ्फाफ चीनी के बेशुमार क्यूब थे जो थोहर के पौधों के दरमियान इस अंदाज से तुले रखे थे कि उनसे दो शक्लें बन गई थीं। उन पर शहद की मक्खियां बैठी चूस रही थीं।

उसकी दूसरी सहेली ने जहर खाकर खुदकुशी कर ली थी। जब उसको ये अलमनाक (खेदजनक) खबर मिली तो वो बेहोश हो गई। मालूम नहीं बेहोशी नई थी या वही पुरानी जो बडे तेज बुखार के बाद जुर (प्रकट होना) में आई थी।
उसका बाप यूडीक्लोन में था जहां उसका होटल उसकी लेडी स्टेनोग्राफर का सर सहलाता था।
उसकी मम्मी ने घर का सारा हिसाब-किताब अधेड उम्र की हट्टी-कट्टी मुलाजिमा के हवाले कर दिया था। अब उसको ड्राइविंग आ गई थी। मगर बहुत बीमार हो गई थी। मगर फिर भी उसको ड्राइवर के बिन मां के पिल्ले का बहुत खयाल था। वो उसको अपना मोबिल ऑयल पिलाती थी।
उसकी भाभी और उसके भाई की जिंदगी बहुत अधेड और हट्टी-कट्टी हो गई थी। दोनों आपस में बडे प्यार से मिलते थे कि अचानक एक रात जबकि मुलाजिमा और उसका भाई घर का हिसाब कर रहे थे, उसकी भाभी नमूदार हुई। वो मुजर्रद थी। उसके हाथ में कलम था न ब्रश, लेकिन उसने उन दोनों का हिसाब साफ कर दिया।

सुबह कमरे में से जमे हुए ल के दो बडे-बडे फुंदने निकले जो उसकी भाभी के गले में लगा दिए गए। खाबिन्द (पति) से नाचाकी के बाइस (कारण) उसकी जिंदगी तल्ख होकर बाद में अजीब-ओ-गरीब मिठास में तब्दील हो गई थी। उसने उसको थोडा-सा तल्ख बनाने की कोशिश की और शराब पीना शुरू की मगर नाकाम रही, इसलिए मिकदार कम थी- उसने मिकदार बढा दी, हत्ता कि वो उसमें डुबकियां लेने लगी… लोग समझते थे कि अब गर्क (डूब जाना) हुई और अब गर्क हुई। मगर वो सतह पर उभर आई थी, मुंह से शराब पोंछती हुई, कहकहें लगाती हुई।

सुबह को जब उठती तो उसे महसूस होता कि रातभर उसके जिस्म का जर्रा-जर्रा दहाडे-मार-मारकर रोता रहा है…उसके वो सब बच्चे जो पैदा हो सकते थे, उन कब्रों में जो उनके लिए बन सकती थीं, उस दूध के लिए जो उनका हो सकता था, बिलख-बिलखकर रो रहे हैं। मगर उसके दूध कहां थे… वो तो जंगली बिल्ले पी चुके थे।

वो और ज्यादा पीती कि अथाह समन्दर में डूब जाए मगर उसकी ख्वाहिश पूरी नहीं होती। जहीन थी। पढी-लिखी थी। जिंसी (लिंग संबंधी) मौजूआत (विषय) पर बगैर किसी तसन्नोअ (बनावट) के बेतकल्लुफ गुफ्तगू करती थी। मर्दों के साथ जिस्मानी रिश्ता कायम करने में मजायका (आपत्ति) नहीं समझती थी। मगर फिर भी कभी-कभी रात की तारीकी में उसका जी चाहता था कि अपनी किसी बदआदत मुर्गी की तरह झाडियों के पीछे जाए और एक अंडा दे आए।

बिल्कुल खोखली हो गई। सिर्फ हड्डियों का ढांचा बाकी रह गया तो उससे लोग दूर रहने लगे… वो समझ गई, चुनांचे वो उनके पीछे न भागी और अकेली घर में रहने लगी… सिगरेट पर सिगरेट फूंकती, शराब पीती और जाने क्या सोचती रहती… रात को बहुत कम सोती थी। कोठी के इर्द-गिर्द घूमती रहती थी।

सामने क्वार्टर में ड्राइवर का बिना मां का बच्चा मोबिल ऑयल के लिए रोता रहता था। मगर उसी मां के पास खत्म हो गया था। ड्राइवर ने एक्सीडेंट कर दिया था। मोटर गिराज में और उसकी मां अस्पताल में पडी थी, जहां उसकी एक टांग काटी जा चुकी थी। दूसरी काटी जाने वाली थी।

वो कभी-कभी क्वार्टर के अंदर झांककर देखती तो उसको महसूस होता कि उसके दूधों की तलछट में हल्की लर्जिश (कंपकंपी) हुई है। मगर उस बदजायका शय (चीज) से तो उसके बच्चे के होंठ भी तर न होते।
उसके भाई ने कुछ अर्से से बाहर रहना शुरू कर दिया था। आखिर एक दिन उसका खत स्विट्रजरलैंड से आया कि वो वहां अपना इलाज करा रहा है, नर्स बहुत अच्छी है। अस्पताल से निकलते ही वो उससे शादी करने वाला है।
अधेड उम्र की हट्टी-कट्टी मुलाजिमा ने थोडा जेवर, कुछ नकदी और बहुत से कपडे जो उसकी मम्मी के थे चुराए और चंद रोज के बाद गायब हो गई। इसके बाद उसकी मां ऑपरेशन नाकाम होने बायस अस्पताल में मर गई।
उसका बाप जनाजे में शामिल हुआ। उसके बाद उसने उसकी सूरत न देखी। अब वो बिल्कुल तन्हा थी। जितने नौकर थे उतने अल्हदा कर दिए। ड्राइवर मोहब्बत… उसके बच्चे के लिए उसने एक आया रख दी..। कोई बोझ उसके खयालों में बाकी न रहा था। वो चाहती थी कि आहिस्ता-आहिस्ता उसे उनसे भी छुटकारा मिल जाए। कभी-कभार अगर कोई उससे मिलने आता तो वो अंदर से चिल्ला उठती, ‘चले जाओ… जो कोई भी तुम हो, चले जाओ… मैं किसी से मिलना नहीं चाहती।

सेफ में उसको अपनी मां के बेशुमार कीमती जेवरात मिले थे उसके अपने भी थे जिनसे उसको कोई रगबत (रुचि) न थी। मगर अब वो रात घंटों आईने के सामने नंगी बैठकर ये तमाम जेवर अपने बदन पर सजाती और शराब पीकर कन्सुरी आवाज में फह्श (अश्लील) गाने गाती थी। आसपास और कोई कोठी नहीं थी, इसलिए मुकम्मल आजादी थी।
अपने जिस्म को तो वो कई तरीकों से नंगा कर चुकी थी। अब वो चाहती थी कि अपनी रूह को भी नंगा कर दे, मगर उसमें वो जबर्दस्त हिजाब (शर्म) महसूस करती थी। इस हिजाब को दबाने के लिए सिर्फ एक ही तरीका उसकी समझ में आता था कि पीए और खूब पीए और इस हालत में अपने नंगे बदन से मदद ले… मगर ये बहुत बडा अलमिया (दुखांत) था कि वो आखिरी हद तक नंगा होकर सतरपोश (शरीर का वह भाग छिपाना जिसे छिपाना आवश्यक है) हो गया था।

तस्वीरें बना-बनाकर वो थक चुकी थी… एक अर्से से उसका पेंटिंग का सामान संदूकचे में बंद पडा था। लेकिन एक दिन उसने सब रंग निकाले और बडे-बडे प्यालों में घोले तमाम ब्रश धो-धो कर एकतरफ रखे और आईने के सामने नंगी खडी हो गई और अपने जिस्म पर नई खद-ओ-खाल (रूपरेखा) बनाने शुरू किए। उसकी ये कोशिश अपने अजूद को मुकम्मल तौर पर उरयां (नंगा) करने की थी।
वो अपने सामने का हिस्सा ही पेंट कर सकती थी। दिनभर वो उसमें मसरूफ रही। बिन खाए-पिए आईने के सामने खडी अपने बदन पर मुख्तलिफ रंग जमाती और टेढे ननके खुतूत बनाती रही। उसके ब्रश में एतिमाद था… आधी रात के करीब उसने दूर हटकर बगौर जायजा लेकर इत्मीनान का सांस लिया। उसके बाद उसने तमाम जेवरात एक-एक करके अपने रंगों से लिथडे हुए जिस्म पर सजाए और आईने में एक बार फिर गौर से देखा कि एकदम आहट हुई।

उसने पलटकर देखा… एक आदमी छुरा हाथ में लिए, मुंह में ढाटा बांधे जैसे हमला करना चाहता था, मगर जब वो मुडी तो हमलावर के हलक से चीख बुलंद हुई। छुरा उसके हाथ से गिर पडा। अफरा-तफरी के आलम में कभी उधर का रुख किया, कभी इधर का … आखिर जो रास्ता मिला उसमें से भाग निकला।

वो उसके पीछे भागी, चीखती-पुकारती- ठहरो… ठहरो … मैं तुमसे कुछ नहीं कंगी … ठहर।
मगर चोर ने उसकी एक न सुनी और दीवार फांद कर गायब हो गया। मायूस होकर वापस आई। दरवाजे की दहलीज के पास चोर का खंजर पडा था उसने उसे उठा लिया और अंदर चली गई… अचानक उसकी नजरें आईने से दो-चार हुई। जहां उसका दिल था वहां उसने मियान नुमा चमडे के रंग का खोल बनाया हुआ था। उसने उस पर खंजर रख कर देखा। खोल बहुत छोटा था, उसने खंजर फेंक दिया और बोतल में से शराब के चार-पांच बडे घूंट पीकर इधर-उधर टहलने लगी… वो कई बोतलें खाली कर चुकी थी। खाया कुछ भी नहीं था… देर तक टहलने के बाद वो फिर आईने के सामने आई। उसके गले में इजारबंदनुमा गुलूबंद था। जिसके बडे-बडे फुंदने थे। ये उसने ब्रश से बनाया था।
दफअतन (यकबयक) उसको ऐसा महसूस हुआ कि ये गुलूबंद तंग होने लगा है। आहिस्ता-आहिस्ता वो उसके गले के अंदर धंसता जा रहा है… वो खामोश खडी आईने में आंखे गाडे रही जो उसी रफ्तार से बाहर निकल रही थीं… थोडी देर के बाद उसके चेहरे की तमाम रगें फूलने लगीं। फिर एकदम से उसने चीख मारी और औंधे मुंह फर्श पर गिर पडी।

हलाल और झटका

“मैंने उसकी शहरग पर छुरी रखी, हौले-हौले फेरी और उसको हलाल कर दिया.”

“यह तुमने क्या किया?”

“क्यों?”

“इसको हलाल क्यों किया?”

“मज़ा आता है इस तरह.”

“मज़ा आता है के बच्चे…..तुझे झटका करना चाहिए था….इस तरह. ”

और हलाल करनेवाले की गर्दन का झटका हो गया.

(शहरग – शरीर का सबसे बड़ा शिरा जो हृदय में मिलता है)

टोबा टेक सिंह

बेख़बरी का फ़ायदा

ठंडा गोश्त

इस्मत चुगताई की कहानी
लिहाफ

10 Responses to “सआदत हसन मंटो की कहानियां”

  1. A really usefull website – many thanks I hope you dont mind me blogging about this post on my website I will also link back to this post Thanks

  2. This was a very helpfull post – Thank you very much. I hope you dont mind me blogging about this article on my website. I will also leave a linkback. Thank you!

  3. A really usefull site – A big thank you I wish you dont mind me commenting about this website on my blog I will also leave a linkback Thanks

  4. z8881973 said

    घऎआट

  5. hghythtyh

  6. I seldom post comments until this point. You have plausible points, but readers beware – to be safe, dont believe most of what you read in the net. If you find an article in one blog, try and research some more. Remember, it is always safer to analyze articles from several sources, study them, and decide which one to trust. Greetings from Eritrea!

  7. rananjay pratap singh said

    i m unable to find pdf of saadat hasan manto stories.please help me

  8. bahut achha aapse judane ke liye kya karna hoga/

  9. Devrajpal said

    i want to read more story…plz

  10. ankit kumar said

    good sites usefuf for me …thanks

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Google+ photo

You are commenting using your Google+ account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
%d bloggers like this: