सुदर्शन

(हास्य व्यंग्य पर आधारित ब्लॉग) अब सुदर्शन www.kmmishra.tk पर भी उपलब्ध है .

दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचो पापड़ संग विस्की । (हास्य/व्यंग्य: होली)

Posted by K M Mishra on मार्च 17, 2014

Originally posted on सुदर्शन:

 

-बुरा न मानो होली है, हिक्क !

           

                      पड़ोसी के आंगन में खड़ा दशहरी खड़े-खड़े बौरा रहा है । बसंत आ रहा है । इस मौसम में प्रकृति से लेकर जीव-जन्तु तक सभी बौरा जाते हैं । नई-नई पत्तियाँ, रंग-बिरंगे फूल, बौराने के लिये प्रेरित करते हैं । नायिका को जो विरह वेदन वर्षा ऋतु में सताने लगती है उसकी नींव मार्च-अप्रेल में ही पड़ती है । बसंत में बौराया हुआ नायक नायिका से मिलता है । शायद होली पर । होली के दिन हिंदुस्तान में सभी बौरा जाते हैं । रंग बिरंगे हो कर, पी कर, मस्तीयाये बौराये गलियों में घूम रहे हैं । हालांकि अधिक न बौरा जायें इस लिये प्रशासन पुलीस की भी व्यवस्था करती है । पर क्या कीजियेगा, मौसम ही बौराने का है । दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचों पापड़ संग विस्की । अपन तो…

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वैलेंटाइन डे स्पेशल

Posted by K M Mishra on फ़रवरी 14, 2011

आदरणीया ममता जी,

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सादर प्रणाम, आगे समाचार यह है कि ‘देखिये बुरा मत मानियेगा’  कंबख्त वैलेंटाइन डे साला फिर आ गया । पिछले साल आपने जो हड़काया था मुझे खूब याद है । पर एक साल के अन्दर मुझे आपके अन्दर काफी बदलाव नजर आया है । आपने पिछले छः महीने से मुझे देखकर मुंह बिचकाना बन्द कर दिया है, हालांकि मामला अभी भी टेंस है पर वैलेंटाइन डे का मौका फिर आया है तो चूकना नहीं चाहिये । देखिये खत के साथ मैं एक लाल गुलाब भी भेज रहा हूं और साथ में एक राखी भी है । दोनो कीमती है, कृपया नाली में मत फेंकियेगा । अगर आपको मैं यानी जगदीश प्रसाद उपाध्याय ‘जग्गू जी’ में जरा भी इन्टरेस्ट है तो वह लाल गुलाब आप पुलाव में डाल कर खा जाइये । मैं समझूंगा कि मेरा प्यार हजम हो गया । नहीं तो फिर आप उस राखी का ही प्रयोग करें । बदले मे मैं आपको एक साल तक एक भाई का स्नेह दूंगा पर सिर्फ अगले वैलेंटाइन डे तक ।

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एक दया मुझपर और करियेगा, यह खत अपने भाई दारासिंह को मत दिखलाइयेगा । नहीं तो वो मेरी 206 हड्डियों को 412 में तबदील कर देगा । आपके पिता जी का प्रेम तो मैं पिछले साल ही देख चुका हूं । मेरी नाक की हड्डी अभी भी वैसी ही है जैसी पिछले साल थी । तुम्हें पहलवानों के खानदान में जनम नहीं लेना चाहिये था । आपसे करबद्ध हो कर सविनय निवेदन करता  हूं कि ममता जी मुझ पर ममता दिखाइये । सिर्फ दिल तोड़ने तक ही सीमित रहियेगा । मेरे हाथ पांव पर तरस खाइयेगा । बीमा वाले बदमाश भी ऐसी किसी टूट फूट का बीमा नहीं करते  हैं।

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आपकी राह देखता ‘भाई लेकर मत आना’

जगदीश प्रसाद उपाध्याय उर्फ ‘जग्गू जी’

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मित्रों, यह एक नमूना प्रेमपत्र है जो कि मैंने इंटरमिडियेट में लिखा था, किसी रूपसी को देने के लिये नहीं, ऐसे ही हास्य में हाथ मांजने के लिये । यह पत्र मेरे एक मित्र को इतना पसंद आया कि उसने इसे इंजीनियरिंग कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया था । फिर उसके बाद इस छोटे से पत्र से प्रेरणा लेकर बहुत से प्रेमपत्र रचे गये और कॉलेज में बहुत से टाईट जींस पहन कर यामाहा आर एक्स 100 और पिता जी की यज़डी चलाने वाले पृथ्वीराज चौहान बनने पर उतारू जझारू युवाओं ने  प्रेमपथ में निरीह याचक भिक्षुक के रूप में अपनी अपनी भावी प्रेयसियों को प्राप्त किया । एक तरह से यह अजमाया हुआ प्रेमपत्र है । 100 परसेंट गारंटी के साथ, जिसमें कम से कम पिटने का खतरा है । लेकिन लेखक, यानी की मैं खुद कभी हसीनाओं पर पक्का यकीन नहीं करता था । इसलिये कभी भी इस प्रकार का इकबालिया बयान लिख कर उस नासमझ को देना अपनी गर्दन खुद कातिल को सुपुर्द करने के बराबर मानता था, सो बंदा एक सुरक्षित दूरी पर रह कर ही प्रेम कर लिया करता था । वही वन साईडेड प्रेम । इस प्रेम में प्रेम की रूहानियत और पवित्रता दोनों बनी रहती है क्योंकि अपवित्र होने के लिये इसमें कुछ खास नहीं होता ।

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उन दिनों तो यह वैलेंटाईन डे वगैरह का भी कोयी झमेला नहीं होता था । भाई प्रेमियों को एक दिन की मौत क्यों देते हो । वह तो फुल टाईम प्रेमी हुआ करते हैं । सातों दिन, चौबीस में अड़तालिस घंटे और साल के 730 दिन (रात और दिन दोनों काउंट करो भाई जी प्रेम का मीटर बहुत तेज भागता है । रातें साली दिन से भी लंबी, गर्म आहों के गुबारों से लबालब । इतनी गरमागरम आहें कि जाड़े की रात में हीटर जलाने की जरूरत नहीं, कमरे में साली वैसे ही लू चलती रहे)। तो भईया ऐसी होती है प्रेम अगन । यकीन नहीं आता तो हरिशंकर परसाई जी का व्यंग उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’ पढ़ कर देख लो । प्रेमिका की विरह अग्नि इतनी विकट हुआ करती थी एक जमाने में कि कहीं आग न लग जाये इसलिये दो-दो सखियों की ड्यूटी होती थी उस पर पानी का छिड़काव करने की । और पानी पड़ने पर भी “छन्न” की आवाज होती थी । है किसी में इतनी हिम्मत, आज के जमाने में ऐसा थर्मामीटर फाड़ू प्रेम  करने की ।

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एक बात बताईये कि क्या हमारा प्रेम वैलेन्टाईन डे का मोहताज है जो इकरारे मुहब्बत करने के लिये सिर्फ यही दिन और अगर चूक गये तो तब फिर अगले साल तक इंतजार करना पड़ेगा । इंसान न हुआ बेचारा कुकुर हो गया जो एक कातिक बीता तो अगले कातिक का इंतजार करे । भाई आप मानव हो । ब्रह्मा का बनाया फूल टू, आल टाईम लवर । कभी भी, किसी भी वक्त हमेशा प्यार करने को तैयार । क्या जब तक आपको बाजार नहीं बतायेगा कि बाबू 14 फरवरी आ गया है अपने-अपने नाड़े कस कर तैयार हो जाओ तब तक आप प्रेम करने से महरूम थे । क्या सन 1991 के पहले आपने वैलान्टाईन डे का नाम सुना था या उसके पहले भारत में प्रेम नहीं किया जाता था । श्रृंगार रस पर इतना ढेर सारा साहित्य अगर विदेशी मीडिया न बताता तो भारत में लिखा ही न जाता । राधा-कृष्ण खड़े रहते गऊओं के पास वैलेन्टाईन डे के इंतजार में । सोनी महिवाल, मस्तानी-बाजीराव, लैला-मजनूं, हीर-रांझा तो पड़े पड़े सूख ही जाते इस वैलान्टाईन डे के इंतजार में ।

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मित्रों, पहले तो प्रेम की परिभाषा ही बड़ी विकट है । जिसे बाजार प्रेम के नाम पर बांट रहा है वह मात्र इनफेचुएशन है । यह भौतिक प्रेमोन्मांद कितनी अनवांटेड-72 की गोलियां बिकवायेगा, कितने गर्भपात करवायेगा, कितनी बिन ब्याही मॉं अगले 14 नवंबर (बाल दिवस) को बनवायेगा, कितनी लड़कियां वैलेन्टाईन डे के नाम पर यौन हिंसा की शिकार होंगी और कितनी अपने प्रेमियों के द्वारा बलात्कृत होंगी जो सिर्फ यह सोच कर जिस्मानी संबन्ध बनायेंगे कि हसीना की ना मे भी उसकी हां होती है और हजारों नये एम.एम.एस. मोबाईलों की शान बढ़ायेंगे, इसका सिर्फ आप अंदाजा ही लगा सकते हैं । प्रेम जो कि एक सतत धीमी प्रक्रिया है जिसे सिर्फ एहसास किया जा सकता है वह 14 फरवरी के दिन एक हिंसक रूप अख्तयार करता नजर आता है कि बेटा इसी बस पर चढ़ जाओ पता नहीं अगली फिर कब मिलेगी । मित्रों, यह प्रेम नहीं है । यह आप भी बखूबी समझते हो प्यारे, पर क्या कीजियेगा । जे.जे. प्यारी ने एक घुड़दौड़ शुरू करवादी और हममें से बहुत से लोग टाईम पास के लिये इस घुड़दौड़ में शामिल हो गये, सिर्फ जेजे का दिल रखने के लिये,  वरना जे.जे. बेचारी बुरा मान जाती कि बताओ कैसा जमाना आ गया है एक अघोषित पुरूस्कार के लिये भी दस लोग नहीं जुट रहे हैं । जबकि इस बीच कांग्रेस की काली गंगा में कितना घोटालों का काला रूपया बह गया हमें पता ही नहीं चला । मिस्र वालों ने हुस्नी मुबारक को बाइज्जत विदा कर दिया लेकिन जेजे को खुश करना भी जरूरी है न ।

beat Love You JJ

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कुछ मीठा हो जाये ।

Posted by K M Mishra on दिसम्बर 12, 2010

प्रस्तुत है “उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, इलाहाबाद” के प्रांगण में हाथ से बनी मूर्तियों के चित्र ।

 

 

 

 









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प्रेम का रसायनशास्त्र

Posted by K M Mishra on दिसम्बर 6, 2010

यह लेख मैंने तब लिखा था जब मैं टीनएजर हुआ करता था और राजकमल शर्मा जी के गुणों से सम्पन्न हुआ करता था  इसलिये इसे जवानी में की गयीं हसीन भूलों को समझ कर माफ किया जा सकता है । व्यस्तताओं के कारण इधर तमाम अच्छे विषयों पर व्यंग नहीं लिख पा रहा हूं इसके लिये मुझे खेद है (इस लेख को पढ़ कर काफी लोग खेत रहेंगे) ।
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मित्रों, अभी कुछ दिन हुये अखबार में एक बड़ा ही क्रांतिकारी लेख पढ़ने का सौभाग्य प्राप्त हुआ । उस लेख के अनुसार वैज्ञानिकों ने ऐसे रसायनों का पता लगाया है जिसकी वजह से आदमी (जानवर भी) प्रेम में पड़ जाता है । साइंसदानों के अनुसार हमारे दिमाग के अंदर कुछ ऐसे रसायन होते हैं जोकि राह चलते सैंडिल पड़वाने के लिये जिम्मेदार होते हैं या किसी सयानी युवती को किसी वीर के साथ फूट लेने के लिये प्रेरित करते हैं । यहॅंा पर वैज्ञानिकों को उन रसायनों का भी पता लगाना चाहिये जो इन फुटेरों को घर की नकदी और जेवरात वगैरह भी लपेटने के लिये प्ररित करते हैं । इससे एक बड़ा फायदा यह होगा कि नुकसान नाक कटने तक की सीमित रहेगा, आर्थिक नुकसान से घर वालों की रक्षा हो जायेगी ।
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वैज्ञानिकों के अनुसार जब भूख लगने, लघुशंका, नींद, सांस  या छींक पर आपका बस नहीं है तो फिर ऑंख मारने, सरे आम छेड़ देने, सीटी मारने, फब्तीयॉं कसने आदि पर भी ज़ोर नहीं है । यह एक नैसर्गिक और प्राकृतिक क्रिया है जो कि होती रहती है । तो फिर भईया इसके बाद उन क्रांतिकारियों पर रूपवतियों के सैंडिलों के प्रहारों को और उनके तथाकथित पिताओं और भ्राताओं के द्वारा सरे आम किये गये अभिनंदन को भी नैसर्गिक और प्राकृतिक प्रतिक्रिया ही समझें क्योंकि बहुत कुछ ऐसे प्रोटीन और एन्जायम्स दिमाग में होते हैं जो कि घर की महिलाओं और युवतियों की रक्षा के लिये लात.घूंसों और ज़बान को सक्रिय कर देते हैं । जिससे कि प्रेम को बढ़ावा देने वाले रसायन ठंडे पड़ जाते हैं । बहरहाल संतुलन बना रहता है ।
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एक दृश्य:
मुगले आज़म अकबर अपने नालायक लड़के सलीम से पूछ रहे हैं कि तुझे एक नाचने गाने वाली कनीज ही मिली थी । उन्हें क्या पता कि बेचारे सलीम की खोपड़ी में डोपार्माइन का डोज जरा ज्यादा हो गया है । अकबर को चाहिये था कि अपने राज हकीम से कोई एन्टीडोज़ बनवा कर सलीम को खिला देता । ससुरे का सारा फीवर एड्स से जुखाम हो जाता और सात दिन के अंदर . “अनारकली! कौन अनारकली ।  मैं किसी अनारकली, चंपाकली, रामकली को नहीं जानता“ । फिर अकबर को अनारकली को वेवजह तीन बाई छः फिट की तंग कोठरी में चिनवाना भी न पड़ता ।
.यहॉं पर स्थिति उलटी भी हो सकती थी । अगर सलीम अकबर को ओक्सीटोसीन का एक पावरफुल इंजेशन लगवा देता तो कुछ ऐसा भी हो सकता था . ”अमां सलीम मिंया! ये आनरकली क्या खूब नाचती है । बिल्कुल मधुबाला की कॉपी हैं जालिम । कल ही इस का रजिस्ट्रेशन हमारे हरम के लिये करवा देना“ । सलीम सोचता ”डोज जरा ज्यादा हो गई बुढ़ऊ को ।  कहॉं मैं अनारकली से निकाह के लिये बूढ़े को पटा रहा था, कहॉं ये खुद ही अनार से सेट होने की सोच रहा है ।“ वैसे इतिहास की किताबों में लंपट अकबर को ही अनारकली का आशिक बताया गया है ।
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वैज्ञानिकों के अनुसार प्रेम करने से सेहत खासा भी ठीक रहती है । प्रेमीजन जरूरत से ज्यादा स्लिम हो जाते हैं । त्वचा में और चेहरे पर पहले से ज्यादा निखार आ जाता है । शरीर में एक अलग तरह की लोच उत्पन्न हो जाती है । हर वक्त बिचारे मुस्कुराते खिलखिलाते रहेंगे और पहले से अधिक खूबसूरत दिखेंगे । ये सारे स्वास्थ्यवर्धक कार्यक्रम लफेड़ू कैमिकलों की बदौलत होते हैं । लेकिन कुछ एन्टीरोमान्टिक कैमिकलों के सौजन्य से सेहत का और इज्जत का जनाजा लिकल जाता है । हिस्ट्री और इंडियन फिल्म इंडस्ट्री  गवाह हैं कि इन एन्टी रोमान्टिक कैमिकलों ने जिनका वास प्रेमीजनों के हिंसा प्रेमी और दुष्टता पर उतारू मॉं.बाप, भाइयों और कुछ विलेन टाइप लोगों के दिमाग में होता था और सदैव होता रहेगा, प्रेमी कबूतरों की गुटरगूं में हमेशा से रोड़े अटकाते रहते थे/हैं/गे ।
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वैज्ञानिकों ने जब इतनी खोज की है तो थोड़ी और कर लें और एन्टी.लव कैमिकल्स का प्रभाव कम करने के लिये नये कैमिकल्स का अविष्कार कर डालें । इससे प्रेमीजनों को बड़ी सुविधा होगी । वे अपने मॉं.बाप और जो भी जज़्बात में हिंसा पर उतारू हो रहा हो उसको चटा दें और प्रेम की वैतरणी पार कर लें । थोड़ी हिंट में ही दे देता हॅंू । पान पसंद मार्का गोली चाहे लड़की को पटाने के लिये या मॉं.बाप को मनाने के लिये दोनों काम के लिये उपयुक्त होगी और  कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता है ।
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मेरे ख्याल से तो अब इंडियन पैनल कोड की वे सारी धाराएं खत्म कर देनी चाहिये जो कि छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न के लिये बनाई गई हैं, क्योंकि कानून के अन्तर्गत पागल या मानसिक बीमार द्वारा किया गया अपराध अपराध नहीं होता है और अब यह सिद्ध हो गया है कि कुछ रसायन ही आदमी को ऐसे वैसे, जाने कैसे.कैसे कार्य करने के लिये उकसाते हैं । अतः अदालत को दंड देने विपरीत अभियुक्त को उसकी बिमारी के इलाज के लिये पैसों का इंतजाम करना चाहिये ।
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वैज्ञानिकों के अनुसार प्यार एक कैमिस्ट्री है या रसायनिक क्रिया है । मतलब कि लैब में आप एक टेस्ट ट्यूब में चार बूंद फेनाइथायलमीन डालें और दस बॅंूद नारपाइनफाइन, इसको 210 डिग्री ताप पर गर्म कर दें । अगर इसमें विस्फोट होता है तो मुहब्बत की रसायनिक क्रिया पूरी हो गई, नहीं तो इस मटेरियल को सिंक में फेंक दीजिये, आपका प्रेम असफल हो गया है । जस्ट ए सिंपल क्रश । नेक्स्ट ।
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मैं सोचता हूं कि अगर जीवन की ज्यादातर गतिविधियों के लिये रसायन ही जिम्मेदार हैं तो वैज्ञानिकों को कुछ खोज निम्नलिखित क्रियाओं पर भी करनी चाहिये । ऐन्टी भ्रष्टाचार प्रोटीन की खोज करनी चाहिये जिससे देश से भ्रष्टाचार का सफाया हो जाये । उनको ऐन्टी मॅंहगाई की टेबलेट्स सारे व्यापारियों को खिला देनी चाहिये । देश की सरकार स्थिर रहे इसके लिये स्थिरता वाले इंजेक्शन सारे सांसदों को लगा देना चहिये । ऐन्टी गरीबी के कैप्सूल सारे गरीबी की रेखा के नीचे रहने वालों को खिला देने चाहिये जिससे कि उनको गरीबी से घृणा हो जाये और वे मेहनत करे और अमीरी को प्राप्त करें । ऐन्टी सांप्रदायिक गोलियों उनको खिला देनी चाहिये जो दंगे करवाते हैं ।
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कौन कहता है कि विज्ञान सिर्फ युद्ध ही करवा सकता है । अगर ठीक से काम लिया जाये तो जानवर बन चुके इन्सान को विज्ञान इन्सानियत भी सिखा सकता है  ।Dai

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जग बौराना : शहीदों के कफनखसोट

Posted by K M Mishra on अक्टूबर 31, 2010


लेखक: श्री नरेश मिश्र

साधो, ताली बजा कर इस सीनरी का स्वागत करो । देश के विकास का सब्जबाग दिखाने वाली कांग्रेस ने जनता के सामने मुखौटा हटा कर अपनी असली शक्ल दिखा दी । मैडम सोनिया गांधी ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी को मौत का सौदागर कहा था तो सारे कांग्रेसी चारण उनके अंदाजेबयां पर सौ जान से कुर्बान हो गये थे । यह बात दीगर है कि गुजरात की जनता को उनका बयान पसंद नहीं आया। उसने चुनाव में कांग्रेस को चारों खाने चित्त कर दिया ।

अब महाराष्ट्र मे बोतल से कांग्रेस का जिन्न बाहर निकल आया है । बोतल का ढक्कन तो उसी दिन खुल गया था जिस दिन महाराष्ट्र प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष माणिक राव ने कैमरे पर कबूल किया था कि सोनियाजी की वर्धा रैली के लिये महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण से दो करोड़ की वसूली की गयी । चव्हाण ने कांख कांख कर कांग्रेस को दो करोड़ का यह जजिया अदा दिया ।

 

मीडिया में यह बातचीत उछली तो कांग्रेस हाईकमान ने माणिकराव को दिल्ली तलब कर लिया । शायद उन्हें आगाह किया गया कि कांग्रेस को इस तरह जनता के सामने बेपर्दा करना बेजा हरकत है । माणिक राव बात करने से पहले आस-पास नजर डाल लिया करें । दीवारों के भी कान होते हैं । कैमरा दीवार से ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि उसकी आंख भी होती है । वह सिर्फ सुनता ही नहीं देखता भी है ।

देशवासियों को बताया गया कि इस मामले में गहराई से जांच हो रही है । जांच का बहाना जरूरी था । बिहार में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं । इसलिये मुर्दे को कालीन में छिपा कर रखने में ही दानिशमंदी थी । लेकिन मुर्दा तो मुर्दा ठहरा । उसे नजरों से छिपाया जा सकता है लेकिन उसकी गंध पर काबू नहीं पाया जा सकता । गरज ये कि गंध बेपनाह उड़ कर देशवासियों के नथुने में भर गयी ।

 

मामला मुंबई के कोलाबा स्थित आदर्श हाउसिंग सोसायटी का है । जिस जमीन पर सोसायटी ने इमारत खड़ी की वह पहले रक्षा विभाग के कब्जे में थी । उसे पहले फौजी अफसरों और नेताओं ने सेना के अधिकार से मुक्त कराया । इस नापाक गठजोड़ का सिलसिला यहीं खत्म नहीं हुआ । इस जमीन पर कारगिल युद्ध के शहीदों की विधवाओं को बसाने के लिये छः मंजिली इमारत का प्रस्ताव पास कराया गया । कुदरत के करिश्में से छः मंजिल की यही इमारत आसमान की तरफ उठने लगी और 31 मंजिल पर आकर रूकी ।

इस इमारत में फ्लैटों पर काबिज महान विभूतियों के नाम सुनकर चौंकने की जरूरत नहीं है । इन फ्लैटों पर मुख्यमंत्री अशोक चव्हाण की सास, उनकी बहू और दूसरे रिश्तेदारों को कब्जा मिला । स्थल सेना के पूर्व कमाण्डर इन चीफ दीपक कपूर, नेवी के बड़े एडमिरल और दूसरे सैनिक अफसरों को भी फ्लैट बांटे गये । कांग्रेस के विधायकों को भी इस लूट में हिस्सा मिला । शिवसेना के एक नेता को भी इस डकैती पर जबान बंद रखने के लिये हिस्सा दिया गया । डकैती के बचे खुचे माल को मालदार नागरिकों ने आपास में बांट लिया । इस इमारत की तामीर में कारगिल शहीदों का नाम भुनाया गया । इन शहीदों की विधवाओं को एक भी फ्लैट नहीं दिया गया ।

बुरा हो मीडिया का, उसने मुख्यमंत्री को बेनकाब कर दिया । अब कांग्रेस का असली चेहरा देख कर देशवासी दंग है । नरेन्द्र मोदी तो कांग्रेस की डिक्शनरी में मौत के सौदागर हैं लेकिन कांग्रेस क्या है । क्या उसे शहीदों के कफनचोर या कफनखसोट की संज्ञा देने में कोई हर्ज है । जिन शहीदों को कमांडर इन चीफ दीपक कपूर ने चुस्त सलामी दी थी क्या उनके परिवारजनों के साथ यही सलूक होना चाहिये था ।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की नजर में देश की कौन सी शक्ल है । उनके देश की सीमा उनकी सास, बहू और चंद विधायकों पर जाकर खत्म हो जाती है । महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने कोयी अनहोनी नहीं की है । उनके पहले पूर्व केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री सतीश शर्मा अपने रिश्तेदारों, चापलूसों, नौकर-चाकर, ड्राइवरों तक को पेट्रोल पंप बांट कर सही रास्ता दिखा चुके हैं । अशोक चव्हाण तो कांग्रेस द्वारा दिखाये रास्ते पर चल रहे हैं ।

साधो, एक झूठ को छिपाने के लिये हजार झूठ बोलना सियासी परंपरा है । अशोक चव्हाण ने जो सफाई दी वह काबिले गौर है । उन्होंने बताया आदर्श हाउसिंग सोसायटी को मंजूरी देते वक्त वे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री नहीं थे । इस सादगी पर कौन न मर जाये ए खुदा । अशोक चव्हाण मुख्यमंत्री नहीं थे तो क्या वे कांग्रेस के मंत्री भी नहीं थे । कांग्रेस बड़ी पार्टी है । हाथ की सफाई दिखाना, लम्बे हाथ मारना कांग्रेस की आदत, इसीलिये तो हाथ के पंजे को कांग्रेस का चुनाव चिन्ह बनाया गया है । कांग्रेस के फौलादी पंजों में देशवासियों की गर्दन जकड़ी है । राम भली करें, देश बच जाये तो अल्ला मियां का शुक्रगुजार होना चाहिये ।

साधो, अभी तुमने क्या देखा है । 70000 करोड़ के कामनवेल्थ गेम्स घोटला का असली चेहरा देखोगे तो तुम्हारी अक्ल शीर्षासन करने लगेगी ।शक सिर्फ यह है कि जो महकमें इस घोटाले की जांच कर रहे हैं अपना फर्ज निभायेंगे या नहीं ।

अशोक चव्हाण का चेहरा देख कर हमें कवि जगन्नाथदास रत्नाकर की लंबी कविता ‘सत्य हरीश्चन्द्र’ का एक अंश याद आ गया जो इस प्रकार है –

कीन्हे कम्बल बसन तथा लीन्हें लाठी कर ।
सत्यव्रती हरिचंद हुते टहरत मरघट पर ।
कहत पुकार पुकार बिना कर कफन चुकाये ।
करहि क्रिया जनि कोउ सबहिं हम देत बताये ।

सत्यवादी राजा हरीशचन्द्र ने अपना कर्तव्य निभाने के लिये जहां अपनी रानी से बेटे के कफन का टुकड़ा कर में लिया था वहीं आज के राजा अशोक चव्हाण तो हरीशचन्द्र के भी नगड़ दादा निकले । उन्होंने कारगिल शहीदों का कफन खसोट लिया । उन्हें यह धत् कर्म करने में कोयी शर्म महसूस नहीं हुयी ।

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जग बौराना : विधवा रोवे सेर सेर…….

Posted by K M Mishra on अक्टूबर 29, 2010

लेखक: श्री नरेश मिश्र

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कांग्रेस के चुनाव का एक माहौल जाना माना है । कांग्रेस जब चुनाव हारती है तो एक सिर का बलिदान मांगती है । गुजरात मे नगरमहापलिका से पंचायत चुनाव तक कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया । बलि का बकरा बनने के लिये सिद्धार्थ पटेल को आगे आना पड़ा । बड़े बेआबरू हो कर तेरे कूचे से हम निकले । सिद्धार्थ पटेल ने हार की जिम्मेदारी सिर माथे लेते हुये इस्तिफा दे दिया । इस चुनाव में हारने के बाद पहले दौर में पटेल ने इवीएम मशीन पर आरोप लगाये थे । उन्होने कहा कि भाजपा ने इवीएम में गड़बड़ी कर दी है । पहली बार किसी कांग्रेसी के मुंह से यह सचाई सुन कर हमारी अक्ल शीर्षासन करने लगी । यही बात तो बहुत दिनों से विरोधीदल के लोग कह रहे थे । कांग्रेस इसे मानने को तैयार नहीं थी । केन्द्र की सत्ता पकार कांग्रेस सदा सुहागिन है, अब उसे इवीएम पर रूलाई क्यों आ रही है । अवधी की एक कहावत है –

विधवा रोवे सेर सेर । सुहागिन रोवे सवा सेर ।

कांग्रेस के दिन तब बहुरे जब मुख्य चुनाव आयुक्त जनाब नवीन चावला हुये और एकाएक बाजी पलटने लगी । अब उसी कांग्रेस को इवीएम पर शिकायत क्यों हो रही है । यह बात देशवासियों को समझनी चाहिये ।

कांग्रेस का तरीका जानामाना है । हारने पर यह पार्टी किसी को बलि का बकरा बनाती है । जो नेता नाकामयाब होते हैं, पस्त होते हैं उन्हें कुछ दिन तक कूड़े, गोदाम में रहना होता है, बाद में वो राज्यपाल बना दिये जाते हैं । उनके लिये एक अच्छी कुर्सी की तलाश जारी रहती है और लोग भूल जाते हैं । शिवराज पाटिल को लोग भूले न होंगे । गृहमंत्री थे तो देश का बंटाधार कर दिया था । आज बड़ी शान से, मंछों पर ताव देकर कांग्रेस के मंच पर जलवा अफरोज हैं और उनका साज श्रंगार भी बदस्तूर जारी है ।

इन दिनों बिहार में विधान सभा चुनाव चल रहे हैं । राहुल गांधी दौरे पर हैं । कांग्रेस बहुत उत्साहित है । राहुल गांधी भाषण देने से पहले, भाषण देने के बाद आस्तीन चढ़ाते हैं । पता नहीं वो किसे चुनौती देते हैं । अभी शरद यादव ने उनकी नकल उतारी और जोश में कुछ ऐसी बाते कह गये जो नहीं कहनी चाहिये ।

यह बांह चढ़ाने की राजनीति समझ में नहीं आती । जनता समझती है कि उनके युवानेता हमलावर हो रहे हैं । समझ में नहीं आती कि ये कौन सी अदा है । हमने हिटलर की अदा के बारे में सुना था । जब वह मंच पर आता था तो एक खास स्टाईल का इस्तेमाल करता था । लेकिन राहुल गांधी भाषण देने के पहले, भाषण देने के बाद । किसी से मिलने के पहले, किसी से मिलने के बाद । खुश होने से पहले, खुश होने के बाद । काम पूरा होने के पहले, काम पूरा होने के बाद, वह बांह चढ़ान नहीं भूलते । इस बांह में क्या करिश्मा है, यह समझने की जरूरत है ।

वैसे कुल मिलाकर राहुल बाबा की कामयाबी अमेठी और रायबरेली तक ही महदूद है । आगे की राम जाने । तकदीर में होगा तो उन्हें प्रधानमंत्री बनने का मौका मिल ही जायेगा । कम से कम कांग्रेसी तो यही समझते हैं कि उनसे ज्यादा काबिल प्रधानमंत्री कोयी हो ही नहीं सकता,  ठीक वैसे ही जैसे जम्मु कश्मीर का मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला से ज्यादा काबिल कोयी हो नहीं सकता । जवानी का जोश है, लहर बहर है । जवानी दीवानी होती है । क्या कर डाले । अल्लामियां को भी पता नहीं होती । कहावत भी है अल्ला मेहरबान तो …………………….।

हमें इस बात से कोयी फर्क नहीं पड़ता कि राहुल गांधी प्रधानमंत्री बन जायेंगे । उनका स्वागत है । इस देश के करोड़ों जवान बेरोजगार हैं, सड़कों पर चप्पलें घिस रहे हैं । किसी एक जवान को (अगर42 वर्ष की उम्र में आप उसे जवान कह सकते हैं) मौका तो मिलेगा ।

उनके पिता स्व0 राजीव गांधी भी जवानी में प्रधानमंत्री बने थे और उन्होंने अपनी माता जी के दुखद निधन पर कहा था कि जब बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती कांपती है । धरती कांप गयी , सिखों का नरसंहार हो गया । इसके आलावा उन्होंने पंचायत चुनाव की शुरूआत की । ग्रासरूट लेवल तक उन्होंने लोकतंत्र को पहुंचा दिया । संसद में जो रिश्वतखोरी होती है, वह अब गांव में भी हो रही है । उसके साथ-साथ हत्याएं हो रही हैं, लाठियां चल रही हैं, अपहरण हो रहा है, लोग पीटे जा रहे हैं । बापू जी की आत्मा स्वर्ग से यह ग्रामस्वराज्य देख रही होगी । वो सोच रहे होंगे कि हमने क्या सोचा था और हमारे नाम पर 2 अक्टूबर को हमारी समाधि पर जाकर हुकूमत करने का लाईसेंस लेने वाले क्या कर रहे हैं । किसी महापुरूष के नाम का इससे ज्यादा बेजा इस्तेमाल इतिहास में देखने को नहीं मिलता है। कांग्रेस की करनी, चाल, चरित्र देख कर वही शेर याद आता है कि

शैख ने मस्जिद बना मिस्मार बुत खाना किया ।

पहले एक सूरत भी थी अब साफ वीराना किया ।

Big Bus Busin

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