सुदर्शन

भारतीय संस्कृति में हास्य व्यंग्य की जड़ें

Posted by K M Mishra on November 22, 2015

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भारतीय संस्कृति में हास्य व्यंग्य की जड़ें

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चाट का ठेला

Posted by K M Mishra on November 14, 2015

 

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चाट का ठेला

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मेले में चलते फिरते नजर आयें – दशहरा स्पेशल (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on November 10, 2015

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मेले में चलते फिरते नजर आयें – दशहरा स्पेशल

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मेले में चलते फिरते नजर आयें – 2 (दशहरा स्पेशल) (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on November 10, 2015

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दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचो पापड़ संग विस्की । (हास्य/व्यंग्य: होली)

Posted by K M Mishra on March 17, 2014

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वैलेंटाइन डे स्पेशल

Posted by K M Mishra on February 14, 2011

आदरणीया ममता जी,

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सादर प्रणाम, आगे समाचार यह है कि ‘देखिये बुरा मत मानियेगा’  कंबख्त वैलेंटाइन डे साला फिर आ गया । पिछले साल आपने जो हड़काया था मुझे खूब याद है । पर एक साल के अन्दर मुझे आपके अन्दर काफी बदलाव नजर आया है । आपने पिछले छः महीने से मुझे देखकर मुंह बिचकाना बन्द कर दिया है, हालांकि मामला अभी भी टेंस है पर वैलेंटाइन डे का मौका फिर आया है तो चूकना नहीं चाहिये । देखिये खत के साथ मैं एक लाल गुलाब भी भेज रहा हूं और साथ में एक राखी भी है । दोनो कीमती है, कृपया नाली में मत फेंकियेगा । अगर आपको मैं यानी जगदीश प्रसाद उपाध्याय ‘जग्गू जी’ में जरा भी इन्टरेस्ट है तो वह लाल गुलाब आप पुलाव में डाल कर खा जाइये । मैं समझूंगा कि मेरा प्यार हजम हो गया । नहीं तो फिर आप उस राखी का ही प्रयोग करें । बदले मे मैं आपको एक साल तक एक भाई का स्नेह दूंगा पर सिर्फ अगले वैलेंटाइन डे तक ।

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एक दया मुझपर और करियेगा, यह खत अपने भाई दारासिंह को मत दिखलाइयेगा । नहीं तो वो मेरी 206 हड्डियों को 412 में तबदील कर देगा । आपके पिता जी का प्रेम तो मैं पिछले साल ही देख चुका हूं । मेरी नाक की हड्डी अभी भी वैसी ही है जैसी पिछले साल थी । तुम्हें पहलवानों के खानदान में जनम नहीं लेना चाहिये था । आपसे करबद्ध हो कर सविनय निवेदन करता  हूं कि ममता जी मुझ पर ममता दिखाइये । सिर्फ दिल तोड़ने तक ही सीमित रहियेगा । मेरे हाथ पांव पर तरस खाइयेगा । बीमा वाले बदमाश भी ऐसी किसी टूट फूट का बीमा नहीं करते  हैं।

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आपकी राह देखता ‘भाई लेकर मत आना’

जगदीश प्रसाद उपाध्याय उर्फ ‘जग्गू जी’

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मित्रों, यह एक नमूना प्रेमपत्र है जो कि मैंने इंटरमिडियेट में लिखा था, किसी रूपसी को देने के लिये नहीं, ऐसे ही हास्य में हाथ मांजने के लिये । यह पत्र मेरे एक मित्र को इतना पसंद आया कि उसने इसे इंजीनियरिंग कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया था । फिर उसके बाद इस छोटे से पत्र से प्रेरणा लेकर बहुत से प्रेमपत्र रचे गये और कॉलेज में बहुत से टाईट जींस पहन कर यामाहा आर एक्स 100 और पिता जी की यज़डी चलाने वाले पृथ्वीराज चौहान बनने पर उतारू जझारू युवाओं ने  प्रेमपथ में निरीह याचक भिक्षुक के रूप में अपनी अपनी भावी प्रेयसियों को प्राप्त किया । एक तरह से यह अजमाया हुआ प्रेमपत्र है । 100 परसेंट गारंटी के साथ, जिसमें कम से कम पिटने का खतरा है । लेकिन लेखक, यानी की मैं खुद कभी हसीनाओं पर पक्का यकीन नहीं करता था । इसलिये कभी भी इस प्रकार का इकबालिया बयान लिख कर उस नासमझ को देना अपनी गर्दन खुद कातिल को सुपुर्द करने के बराबर मानता था, सो बंदा एक सुरक्षित दूरी पर रह कर ही प्रेम कर लिया करता था । वही वन साईडेड प्रेम । इस प्रेम में प्रेम की रूहानियत और पवित्रता दोनों बनी रहती है क्योंकि अपवित्र होने के लिये इसमें कुछ खास नहीं होता ।

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उन दिनों तो यह वैलेंटाईन डे वगैरह का भी कोयी झमेला नहीं होता था । भाई प्रेमियों को एक दिन की मौत क्यों देते हो । वह तो फुल टाईम प्रेमी हुआ करते हैं । सातों दिन, चौबीस में अड़तालिस घंटे और साल के 730 दिन (रात और दिन दोनों काउंट करो भाई जी प्रेम का मीटर बहुत तेज भागता है । रातें साली दिन से भी लंबी, गर्म आहों के गुबारों से लबालब । इतनी गरमागरम आहें कि जाड़े की रात में हीटर जलाने की जरूरत नहीं, कमरे में साली वैसे ही लू चलती रहे)। तो भईया ऐसी होती है प्रेम अगन । यकीन नहीं आता तो हरिशंकर परसाई जी का व्यंग उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’ पढ़ कर देख लो । प्रेमिका की विरह अग्नि इतनी विकट हुआ करती थी एक जमाने में कि कहीं आग न लग जाये इसलिये दो-दो सखियों की ड्यूटी होती थी उस पर पानी का छिड़काव करने की । और पानी पड़ने पर भी “छन्न” की आवाज होती थी । है किसी में इतनी हिम्मत, आज के जमाने में ऐसा थर्मामीटर फाड़ू प्रेम  करने की ।

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एक बात बताईये कि क्या हमारा प्रेम वैलेन्टाईन डे का मोहताज है जो इकरारे मुहब्बत करने के लिये सिर्फ यही दिन और अगर चूक गये तो तब फिर अगले साल तक इंतजार करना पड़ेगा । इंसान न हुआ बेचारा कुकुर हो गया जो एक कातिक बीता तो अगले कातिक का इंतजार करे । भाई आप मानव हो । ब्रह्मा का बनाया फूल टू, आल टाईम लवर । कभी भी, किसी भी वक्त हमेशा प्यार करने को तैयार । क्या जब तक आपको बाजार नहीं बतायेगा कि बाबू 14 फरवरी आ गया है अपने-अपने नाड़े कस कर तैयार हो जाओ तब तक आप प्रेम करने से महरूम थे । क्या सन 1991 के पहले आपने वैलान्टाईन डे का नाम सुना था या उसके पहले भारत में प्रेम नहीं किया जाता था । श्रृंगार रस पर इतना ढेर सारा साहित्य अगर विदेशी मीडिया न बताता तो भारत में लिखा ही न जाता । राधा-कृष्ण खड़े रहते गऊओं के पास वैलेन्टाईन डे के इंतजार में । सोनी महिवाल, मस्तानी-बाजीराव, लैला-मजनूं, हीर-रांझा तो पड़े पड़े सूख ही जाते इस वैलान्टाईन डे के इंतजार में ।

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मित्रों, पहले तो प्रेम की परिभाषा ही बड़ी विकट है । जिसे बाजार प्रेम के नाम पर बांट रहा है वह मात्र इनफेचुएशन है । यह भौतिक प्रेमोन्मांद कितनी अनवांटेड-72 की गोलियां बिकवायेगा, कितने गर्भपात करवायेगा, कितनी बिन ब्याही मॉं अगले 14 नवंबर (बाल दिवस) को बनवायेगा, कितनी लड़कियां वैलेन्टाईन डे के नाम पर यौन हिंसा की शिकार होंगी और कितनी अपने प्रेमियों के द्वारा बलात्कृत होंगी जो सिर्फ यह सोच कर जिस्मानी संबन्ध बनायेंगे कि हसीना की ना मे भी उसकी हां होती है और हजारों नये एम.एम.एस. मोबाईलों की शान बढ़ायेंगे, इसका सिर्फ आप अंदाजा ही लगा सकते हैं । प्रेम जो कि एक सतत धीमी प्रक्रिया है जिसे सिर्फ एहसास किया जा सकता है वह 14 फरवरी के दिन एक हिंसक रूप अख्तयार करता नजर आता है कि बेटा इसी बस पर चढ़ जाओ पता नहीं अगली फिर कब मिलेगी । मित्रों, यह प्रेम नहीं है । यह आप भी बखूबी समझते हो प्यारे, पर क्या कीजियेगा । जे.जे. प्यारी ने एक घुड़दौड़ शुरू करवादी और हममें से बहुत से लोग टाईम पास के लिये इस घुड़दौड़ में शामिल हो गये, सिर्फ जेजे का दिल रखने के लिये,  वरना जे.जे. बेचारी बुरा मान जाती कि बताओ कैसा जमाना आ गया है एक अघोषित पुरूस्कार के लिये भी दस लोग नहीं जुट रहे हैं । जबकि इस बीच कांग्रेस की काली गंगा में कितना घोटालों का काला रूपया बह गया हमें पता ही नहीं चला । मिस्र वालों ने हुस्नी मुबारक को बाइज्जत विदा कर दिया लेकिन जेजे को खुश करना भी जरूरी है न ।

beat Love You JJ

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