सुदर्शन

इण्डियन पराई लीग (हास्य, व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on April 20, 2009

नरेश मिश्र

साधो, आई. पी. एल. को पहले इण्डियन प्रीमियर लीग कहते थे, अब वक्त की मार से मजबूर होकर इसे इण्डियन पराई लीग कहना पड रहा है । इसकी पैदाइश तो अपने मुल्क में हुई थी । लेकिन एक बरस के इस शिशु को दक्षिण अफ्रीका भेजना पड़ गया । अंग्रेजों ने हमारे मुल्क को क्रिकेट खेलना सिखाया था । तेरा तुझको अपर्ण, क्या लागे है मेरा ।

हमारी सरकार की नीयत बिल्कुल बेदाग है । वह या तो चुनाव करा सकती है या क्रिकेट । दोनो साथ नहीं कराये जा सकते । आतंकवादियों का भूत सरकार के सिर पर सवार हो गया है । सरकार ने आई. पी. एल. को सुरक्षा देने में मजबूरी दिखाकर सारी दुनिया को यह तो बता ही दिया कि वह दहशतगर्दों से डरती है । उसे डरना भी चाहिए । वह जानती है कि दहशतगर्दों की मुश्कें कसना उसके बूते की बात नहीं, चुनाव के दौरन ऐसा करना और भी मुश्किल है । दहशतगर्दों पर लगाम कस कर सरकार अपने वोट बैंक से हाथ नहीं धोना चाहती । वैसे सरकार कुछ ज्यादा ही डर गयी है । मुंबई पर हमले के बाद दिल्ली और राजस्थान में चुनावी कामयाबी हासिल हुई थी । इससे जाहिर है कि हमारे मुल्क के लोग आतंकवाद को र्कोई अहमियत नहीं देते हैं । मुल्क की आबादी वैसे भी संसाधन के मुकाबले बहुत ज्यादा है । ऐसे में सौ-दो सौ लोगों के मारे जाने से देश की सेहत पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है । दहशतगर्दों की मारक क्षमता इतनी नहीं है कि वे हमारे देश की आबादी पर ज्यादा असर डाल सकें, उनके पास एटम बम होता तो बात और थी । हमारी सरकार और दहशतगर्द उस घड़ी का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं जब पाकिस्तान के एटमी जखीरे पर कठमुल्लाओं का कब्जा होगा ।

अब साधो, आई पी एल की मुल्क से बिदाई के बाद हम यह सोचकर हैरान हैं कि बड़े नेता और आला अफसर तो आतंकवादियों के हमलों से महफूज हैं, देश के चूहे, सांप इसलिए महफूज हैं कि वे बिल में घुसकर अपनी जान बचा लेंगे । परिन्दें हवा में उड़ जायेगें, चरिन्दे मैदान में चौकड़ी भरकर बच जायेगें लेकिन उस आम आदमी का क्या होगा, जिसका हाथ कांग्रस के साथ है (या आम आदमी की गर्दन पर कांग्रेस का हाथ है) ।

महाराष्ट्र सरकार ने बड़े जोर शोर से कसाब को फांसी पर चढाने का अनुरोध किया है । यह चुनावी अनुरोध उन वोटरों को कैसे लुभाएगा जिन्हें अच्छी तरह से मालूम है कि संसद पर खतरनाक हमले का दोष सिध्द अपराधी अफजल गुरू सुप्रीम कोर्ट से फांसी की सजा पाने का बाद भी तिहाड़ जेल में सरकारी मेहमान बना बैठा हुआ है । कांग्रेसियों को सिलसिले से काम करने की   तमीज नहीं है । संसद पर हमला कई साल पहले हुआ था । मुंबई पर हमला कुछ महीने पहले हुआ था । पहले संसद हमले के गुनाहगार को उसके अंजाम तक पहुंचाना जरूरी है कि कसाब को । कसाब पर तो अभी मुकद्दमा ठीक से शुरू भी नहीं हुआ है । वह जेल में बैठ कर गांधी जी की आत्मकथा पढ़ रहा है। मुमकिन है कि आत्मकथा पढने के बाद उसका हृदय परिवर्तन हो जाये और धर्म निरपेक्ष धड़े की तरफ से उसे माफ करने की मांग भी उठे । हमारे मुल्क में हृदय परिवर्तन बड़े आराम से हो जाता है । मुल्क के कुख्यात अपराधी और बाहुबली आम चुनाव की गंगा में गोता लगा कर अपने हृदय परिवर्तन की प्रक्रिया से गुजर रहे हैं । हृदय परिवर्तन के लिए चुनाव के पर्व से ज्यादा कोई शुभ घड़ी नहीं होती ।

बहर कैफ, आई पी एल तो पराया हो गया । ग्लोबलाइजेशन की जानिब हमारे देश की ओर से उठाया गया यह एक महत्वपूर्ण कदम है । हम शायर का यह कलाम गुनगुना रहे हैं – महफिल उनकी, साकी उनकी, ऑंखे अपनी, बाकी उनका ।

=>दहशतगर्दों के हमलों से बचने के लिए हम अपने देश से भाग खड़े हुए । लेकिन क्या पता यहां भी लाहौर वाला हाल न हो जाये ।

One Response to “इण्डियन पराई लीग (हास्य, व्यंग्य, कार्टून)”

  1. एकदम सटीक!

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