सुदर्शन

टके सेर भाजी, टके सेर खाजा (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on June 13, 2009

=>ये देखिये साहब, बाजार में आग लगी हुई है । फल और भाजी  तक खरीदने के लिए अब तो बैंक से पर्सनल लोन लेना पड़ेगा ।

मित्रों आप लोगों को अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहानी तो याद ही होगी । अपने देश में भी पिछले कई महीनों से यही कहानी दोहराई जा रही है । 30 मई को खत्म हुए सप्ताह में मंहगाई की दर पिछले तीन दशक के सबसे निचले पायदान पर जाकर सुस्ता रही है । पिछले सप्ताह यह 0.13 प्रतिशत थी । तकरीबन शून्य । देखा आपने, ऐसे ही नहीं इस देश के न्यूज़ चैनलों पर ऐड आ रहा था ”कांग्रेस का हाथ, आम आदमी के साथ” । वैसे पैसा मिल जाये तो निष्पक्ष पत्रकारिता का झंडा ऊंचा लहराने वाले ये न्यूज़ चैनल कुछ भी दिखाने को तैयार हो जाते हैं । और तो छोड़िये इनके पास तो बहस के लिए भी मुद्दों का अकाल रहता है ।

अब सरकारी आंकड़ों की माने तो इस देश में मंहगाई दर जब शून्य के करीब पहुंच गई है तो यह मान लिया जाये कि बाज़ार ‘टके सेर भाजी और टके सेर खाजा’ वाली स्थिति में पहुंच गया है ।

मित्रों, मंहगाई दर शून्य के करीब है और आलू 15 से 20 रू0 किलो बाज़ार में बिक रहा है । अरहर की दाल का भाव 60 रू0 किलो है । चीनी 28 रू0 किलो । गुड़ 35 रू0 किलो । देशी घी 225 रू0 किलो । सरसों का तेल 80-90 रू0 किलो । पका आम 40-50 रू0 किलो । कच्चा आम 20 – 25 रू0 किलो । केला 25-35 रू0 दर्जन, प्याज 40 रू0 किलो । लहसुन 50 रू0 किलो । खाने पीने की हर चीज के दाम ड्योढ़े, दुगुने हो गये हैं । आम हिन्दुस्तानी जो पहले दाल रोटी से पेट भर लेता था अब नमक रोटी पर आ गया है । प्रदेश सरकार टैक्स बढा रही है और यूपीए सरकार को तो पांच साल के लिए लाइसेन्स टू किल मिल ही गया है । चुनाव जीतना ही सबसे बड़ा सिर दर्द था इन लोगों का, बाकी वादे तो तोड़े जाने के लिए ही किये जाते हैं । मंहगाई जब चुनाव के पहले ही कोई मुद्दा नहीं थी इनके लिए तब आज की कौन कहे । अब तो यह भी नहीं कह सकते कि तेल देखिये और तेली की धार देखिये, काहे कि इस मंहगाई में वनस्पति छोड़िये खलिस कड़ुआ तेल भी अब सिर पर लगाने को मयस्सर न होगा ।

6 Responses to “टके सेर भाजी, टके सेर खाजा (व्यंग्य/कार्टून)”

  1. आज तो हम करोड़पति हो गये। भरतलाल १० किलो आलू लाया है फाफामऊ से!🙂

  2. Nidia said

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  3. मित्रों आप लोगों को अंधेर नगरी, चौपट राजा वाली कहानी तो याद ही होगी । अपने देश में भी पिछले कई महीनों से यही कहानी दोहराई जा रही है । 30 मई को खत्म हुए सप्ताह में मंहगाई की दर पिछले तीन दशक के सबसे निचले पायदान पर जाकर सुस्ता रही है । पिछले सप्ताह यह 0.13 प्रतिशत थी । तकरीबन शून्य । देखा

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