सुदर्शन

फर्जी सरकारी मुद्रास्फीति (हास्य,व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on April 8, 2009

 

=> अरे पगले

 पेट्रोल इतना भी सस्ता नहीं हुआ है कि तू सारा दिन बाइक दौड़ाता रहे ।


 

साधो, नवरात के पावन पर्व पर उम्मीदों की भारी भरकम गठरी लेकर हम बाज़ार में दाखिल हुए । बाज़ार जाने से पहले हमने अखबार की एक खबर को बड़े चाव से पढा था । हमारा वश चलता तो हम उस खबर की कटिंग अपनी छाती पर चिपका लेते और सीना फुलाकर, सिर उठाकर घूमते ।

 

खबर  यह थी  कि   मुद्रास्फीति शून्य के करीब   पहुँच गई है ।


 

हमें यह मुगालता था कि मुद्रास्फीति घटने का मतलब बाज़ार भाव में मंहगाई घटने से हैं । हमारी ही तरह करोड़ों अक्ल से पैदल लोग ऐसा ही मानने की बेवकूफी करते होंगे । हमें यह जानकर थोड़ी राहत महसूस हुई कि बेवकूफों की फौज में हम अकेले नहीं हैं । बहुमत अगर बेवकूफों का हो तो किसी को शर्माने की जरूरत नहीं पड़ती है ।

 

बहर कैफ, बाजार में फलाहार सामग्री से लेकर पूजा-पाठ की चीजों का दाम आसमान छू रहा था । हमने सिर उठाकर आसमान को निहारने का प्रयास किया । हम जानना चाहते थे कि बाज़ार भाव कितनी ऊंचाई तक चढ गया है । यह हमारी दूसरी बेवकूफी थी । इसे शरीफों की ज़बान में बेवकूफी दर बेवकूफी कहते हैं ।

 

बाज़ार की जबरदस्त भीड़ में हम सड़क चूमने लगे । फिर किसी तरह कराह कर उठे और फलवाले पर बिफर पड़े । तुम मुद्रास्फीति के बारे में जानते हो । फलवाला छूटते ही बोला यह फ्रूट तो अभी बाज़ार में आया ही नहीं है । यह किस मुल्क में पैदा होता है । अमेरिकन सेब आया है । भाव दो सौ रूपये किलो है । कहिए, कितना तौल दूँ ।

 

मेरा बुध्दिजीवी रोष प्रकट हुआ । मैंने कहा, यह फल नहीं है । यह मंहगाई घटने का सरकारी आंकड़ा है । क्या तुमने आज का अखबार नहीं पढा ।

 

बाबू साहब चुनाव के वक्त मैं अखबार नहीं पढता । इन दिनों तमाम सरकारी गप्पें अखबार में छपती रहती हैं । आप को अफवाहों पर यकीन नहीं करना चाहिए ।

 

हम भड़क उठे, अफवाह नहीं यह सरकार का अधिकृत आंकड़ा है । मंहगाई घट गई है । हर जिंस का भाव सस्ता हो गया है । तुम कल तक पपीता 15 रूपये किलो बेच रहे थे । आज उसका भाव 25 रूपये बता रहे हो ।

 

हाँ, बता रहा हँ । आपको 25 रूपये किलो पपीता इस दुकान से मिलेगा । 15 रूपये किलो चाहिए तो सरकारी दुकान पर जाइये ।

 

क्या सरकारी दुकान पर सेब, केला और पपीता भी बिकता है ?

 

जरूर बिकता होगा, आप सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान पर चले जाइये । वहाँ सब कुछ मिलता है, बस दुकान खुली नहीं मिलती है ।

 

हमारी अक्ल घास चरने लगी । हमने मान लिया कि मूर्ख को समझाने से गांठ का ज्ञान बेकार खर्च हो जाता है ।

 

फलवाले ने नहले पर दहला मारा, बाबू साहब सरदार मनमोहन सिंह और सोनिया गांधी की दुकान पर जाइये । वहाँ इन दिनों जिंसे सस्ती मिल रही हैं । अगर आप गरीब हैं तो आपको मुफ्त भी मिल सकती हैं। सावन (चुनाव) के मौसम में जिसके दीदे फूट जाते हैं उसे ताजिंदगी हरियाली ही दिखाई देती है । अब आप मेरा वक्त खोटी मत कीजिए, तमाम ग्राहक खड़े हैं । आप जिस मुद्रास्फीति के बारे में मुझे समझा रहे थे वही लेक्चर किसी चुनाव सभा में जाकर दीजिए । आपको लेक्चर देने के कुछ पैसे मिल जायेगें । इन दिनों किराये के लेक्चरबाजों का दाम आसमान छू रहा है

 

हम खाली झोली लिए बाज़ार से लौट आये । फलवाला ठीक ही कह रहा था । चुनावी मौसम में किराये की भीड़ जुटाने वाले अच्छी कमाई कर लेते हैं । पोस्टर, बैनर, झंडा, झंडी के धंधे में अच्छी खासी कमाई हो रही है । रही मुद्रास्फीति, संकुचन और मुद्रा प्रसार की बात तो मुद्रा प्रसार से ज्यादा लम्बे चौड़े दावे करने वाले नेताओं के मुंह का फैलाव हो गया है । वे सुरसा के बदन की तरह मुंह फैलाये जा रहे हैं और जनता मुद्रा संकुचन का स्वरूप देख रही है । वह हैरत में सोच रही है कि इस सुरसा के मुंह से किस रास्ते बाहर निकलें । अब सिर्फ बलबुध्दि निधान पवनसुत का ही आसरा है । इनकी कृपा होगी तो जनता उबर जायेगी वरना उसे डूबने से कोई नहीं बचा सकता ।

नरेश मिश्र

 

2 Responses to “फर्जी सरकारी मुद्रास्फीति (हास्य,व्यंग्य, कार्टून)”

  1. संगीता पुरी said

    बहुत बढिया …

  2. Luba said

    I would like to many thanks for the efforts you have made in writing this blog post. I am hoping the same best work from you in the future as well. I loved your style I will sign up for your feed please keep posting! My best regards, Luba.

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