सुदर्शन

एक नगाड़ा ना मढै सौ चूहे की चाम (हास्य,व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on April 10, 2009

नरेश मिश्र

 

साधो, लोकतंत्र का नगाड़ा इस कदर बेरहमी से बजाया जाता है कि हर पांचवे साल उसका चमड़ा बदलने की जरूरत पड़ती है । कभी-कभी तो पांच साल से पहले ही उसे बदलना मजबूरी हो जाता है । लोकतंत्र की भाषा में इसे मध्यावधि चुनाव कहते हैं । नगाड़ा बजाने वाले इस कदर बेदर्द, नाशुक्रे, चालबाज और मौका परस्त होते हैं कि उन्हें सरकारी खजाने पर रहम नहीं आता । उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि इस नगाड़े का चमड़ा बदलने में कई अरब रूपयों का खर्च आता है ।

 

बहर कैफ, संविधान में चमड़ा बदलने का उल्लेख है । उसके मुताबिक पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान नगाड़े का चमड़ा बदलने की तैयारी चल रही है।

 

अब सियासत के जंगल में शेरों का तो सफाया हो गया । हिरन, बारहसिंघे और जंगली भैंसे भी कहीं   नजर  नहीं आते । पण्डित नेहरू से अटल बिहारी युग तक सियासत के जंगल में गाहे-बगाहे शेर दिख जाते थे । कुछ मौका परस्त रंगे सियार भी इस दौरान लोकतंत्र के जंगल के राजा बन बैठे । देवगौड़ा जैसे कुछ   सियारों   की बन  आयी । लेकिन कांग्रेस का यह खेल ज्यादा दिन नहीं चल  पाया । चन्द्रशेखर और चरण सिंह जानते थे कि उनकी सरकार अकाल मृत्यु का ग्रास बनेगी फिर भी उन्हें राजनीति की मायानगरी से दूर  रहने की   प्रेरणा नहीं मिली । शातिर सियासतबाज वी. पी. सिंह ने तो अपनी भोली भाली चितवन और भूदानी छवि से जनता की आंखों में ऐसी धूल झोंकी कि आज तक वह दीदे मल-मल कर बार-बार अपना सिर धुन रही है ।

 

साधो, अब पन्द्रहवीं लोकसभा के दौरान नगाड़े का चमड़ा बदलने की प्रक्रिया चल रही है तो सियासत के जंगल में ऐसे कद्दावर जानवर की तलाश जारी है, जिसका चमड़ा इस्तेमाल किया जा सके । यह तलाश यकीनन नाकाम रहेगी । सियासत के जंगल में अब कद्दावर जानवर तो गायब हो गये हैं । सिर्फ चूहे बच रहे हैं जो अपनी बिल से बिल-बिलाकर बड़ी तादाद में ताल ठोंकते हुए बाहर निकल आये हैं । उनका दावा है कि वे गुट बना कर अपनी चमड़ी का दान करेंगे । इस चमड़ी को सिल कर लोकतंत्र के विशाल नगाड़े को मढने में कोई दिक्कत पेश नहीं आयेगी ।

 

चूहों के गठबन्धन का जायजा लेना दिलचस्प होगा । बिहार और यूपी में लालू, पासवान, मुलायम कोआपरेटिव लिमिटेड हैं । तमिलनाडु में जया, चन्द्रबाबू नायडू, वाइको और माक्र्सवादियों की छोटी सी थैली है । यह थेली बड़े ज़ोर से खनखना रही है । इसकी आवाज सुनकार काहवत याद आती है कि थोथा चना बाजे घना । महाराष्ट्र का हाल बेहाल है । छत्रपति शिवाजी की विरासत पर दलाल काबिज होना चाहते हैं । झारखण्ड में दल बदलू सियासत के गुरूजी है । इनका दावा है कि ये ढाई चावल की ऐसी खिचड़ी पकायेंगे, जिससे देश का पेट भर जायेगा । बिहार के सबसे चालाक चूहे का नाम रामविलास पासवान है । इनका दावा है कि सियासत की कौड़ी चाहे चित पड़े या पट, बाजी तो इन्ही के हाथ रहेगी । सियासत का ऐसा कामयाब जुआड़ी इससे पहले देश में पैदा नहीं हुआ ।

 

यूपी में मायावती बहन जी हैं । इन्होंने सारे देश में अपने प्रत्याशी खड़े कर रखे हैं । इनकी माया देख कर मुलायम के होश गुम हो गये हैं और सोनियाजी की  नींद  हराम है । नरेन्द्र मोदी और शरद पवार जैसे कूटनीति कुशल भी सोच रहे हैं कि मायावती उन्हें कितने फीसदी वोट काट कर चोट पहुंचायेगी ।

 

बहर कैफ, चूहों की चमड़ी का योगदान अभी जारी है । सबसे कामयाब चूहा कौन साबित होगा, इसका खुलासा तो मतगणना से पहले करना मुमकिन नहीं । सभी चूहों का दावा है कि वे सरकार बनाने में अहम भूमिका निभायेंगे । अपने बलबूते कोई पार्टी सरकार बनाने के बारे में सोचने की हिमाकत नहीं कर सकती । सभी चूहे मानते हैं कि उनके दांत ज्यादा पैने हैं, इसलिए वे ज्यादा कामयाबी के साथ काटने की क्रिया कर सकते हैं ।

 

साधो, उम्मीद करो कि लोकतंत्र का नगाड़ा इन चूहों की चमड़ी से मढ जायेगा । वह बजेगा या नहीं ? उसका सुर कैसा लिकलेगा ? इस  बारे  में  अभी से सोचना बेमानी है ।

=> लालू भइया! कांग्रेस को तो हमने अपनी गिरफ्त में ले लिया है । सरकार भी अब अपनी ही बनेगी ।


            
=> अरे मुलायम सिंह जी, मंत्रालयों की चूहाबांट में पासवान और शरद पवार को मत भूल जाइयेगा । हमें मिलजुल कर देश को कुतरना है ।

6 Responses to “एक नगाड़ा ना मढै सौ चूहे की चाम (हास्य,व्यंग्य, कार्टून)”

  1. damdaar!

  2. बढिया व्यंग्य है।

  3. संगीता पुरी said

    अच्‍छा व्‍यंग्‍य किया है …

  4. सही मुहावरा दिया है।

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