सुदर्शन

(हास्य व्यंग्य पर आधारित ब्लॉग) अब सुदर्शन www.kmmishra.tk पर भी उपलब्ध है .

हमीं से मोहब्बत, हमीं से लड़ाई ……..(व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on November 18, 2009


वही हो रहा है मित्रों जिसका मुझे डर था । शांति का नोबेल भारत को भारी पड़ने जा रहा है । मियां ओबामा न्यूक्लियर डील के बाद भी अपनी आंखों के मोतियाबिंद से छुटकारा नहीं पा सके हैं । डील के एक साल बाद अचानक उन्होंने भारत से परमाणु अप्रसार पर आश्वासन पत्र की मांग कर डाली। भारत का परमाणु अप्रसार में अब तक का बेदाग रिकार्ड उनकी आंखों के मोतियाबिंद ने छिपा दिया । मियाँ ओबामा, अमेरिकी सरकार आज भी आई.एस.आई जो कि पूरी दुनिया में फैले आतंकवादियों की घोषित मालकिन है को गुप्त रूप से धन मुहैया कराती है, उससे आज तक कोई आश्वासन पत्र नहीं प्राप्त कर सकी और हम जो कि विश्व शांति के सबसे ऊंचे एफिल टावर है सो तुम्हें दिखाई नहीं पड़ रहा है । गांधी के भारत के साथ ऐसा सलूक । धन्य हो तुम और तुम्हारी चिरकुटई । चित्थड़ कहीं के, तुम्हें शांति के नोबेल का मोतियाबिंद हुआ है, जिसका कोई इलाज नहीं । ओबामा मियां, तुम शांति के नोबेल की झाड़ पर ज्यादा दिन नहीं टिक पाओगे और जल्द ही मुंह के बल अफ्गानिस्तान, पाकिस्तान में ढेर पड़े मिलोगे ।

शांति के नोबेल का साईड इफैक्ट अब नजर आने लगा है । ओबामा आजकल चीन की यात्रा पर हैं । चीन के नाम से आजकल बड़े बड़ों की पेंट गीली हो जा रही है । ओबामा ठहरे वैसे ही शांति के पुजारी । एक बयान में तिब्बत की दिक्कत को सुलटा दिया । ”तिब्बत चीन का हिस्सा है और दलाई लामा को चीन के साथ बैठ कर सब मसले सुलटा लेने चाहिये ।” प्राचीन काल के संतों वाली मोहक अदाएं । एक डायलॉग बोला और हो गया दुष्ट का हृदय परिवर्तन । बीजिंग से आया ओबामा का यह बयान दुष्ट दलाईलामा का हृदय परिवर्तन कर देगा । आक्रमणकारी चीन ने तिब्बत हड़प लिया तो क्या हुआ । समरथ को नाहीं दोष गुसाईं । विश्व शांति के लिये बड़ी-बड़ी कीमतें चुकानी पड़ती हैं । अबकी कीमत चुकाने की बारी दलाईलामा की है । दबंगों ने एक गरीब, दुखियारी माँ का अपहरण कर लिया तो शांति के पुजारी उसके रोते बच्चे को विश्व शांति की नसीहत देकर चुप करा रहे हैं । ओबामा तुम टुन्न हो गये हो शांति के नोबेल की शराब से । जब तक किसी नाली में नहीं गिरोगे तब तक इसका हैंगओवर बना रहेगा ।

ओबामा के राष्ट्रपति बनने से पहले बड़े हल्ले थे । बड़ी उम्मीदें थीं कि जो गंदगी जार्ज बुश पूरी दुनिया में फैला कर गये हैं शायद ओबामा उसे साफ कर सकें । शुरू शुरू में ऐसा लग भी रहा था । लेकिन शांति का नोबेल लग रहा है सारा खेल ही चौपट कर डालेगा । नवजात ओबामा के सकुमार कंधों पर इत्ता भारी बोझ । कदम डगमागने लगे हैं । तिब्बत चीन का हिस्सा है, भारत से परमाणु अप्रसार के लिये आश्वासन पत्र की मांग, अफ्गानिस्तान में नर्म तालिबानियों की तरफ झुकाव ये सब शांति के नोबेल की करतूत है ।

जल्द ही मनमोहन सिंह ओबामा के सरकारी मेहमान बनने जा रहे हैं । मनमोहन के एजेंडे में इस्तेमाल हो चुके यूरेनियम के पुनर्संस्करण की तकनीकी हासिल करना है और ओबामा के एजेंडे में भारत को ठेंगा दिखाना है । मुझको लगता है कि आश्वासन पत्र की मांग भारत पर प्रेशर बनाने के लिये की जा रही बार्गेनिंग भर है । बना लो प्रेशर । यहां तो एन.एस.जी. से छूट मिलते ही भारत सरकार ने न्यूक्लियर डील की हांडी आधे दर्जन देशों के साथ चढ़ा ली है । तुम नहीं सनम, कोई और सही । रानी रूठेगी तो अपना ही सुहाग लेगी । डील नहीं होगी तो तुम्हारी ही कम्पनियां बैठ कर टापेंगी । और अच्छा ही है कि यह डील न हो क्योंकि हमारे वैज्ञानिक हैवी वॉटर रियेक्टर और लाइट वॉटर रियेक्टर दोनों ही प्रकार के न्यूक्लियर रियेक्ट बनाने में सक्षम हैं । पूर्ण स्वेदेशी न्यूक्लियर सबमरीन आई. एन. एस. अरिहंत इसका सबसे बड़ा उदाहरण है । रही सही कसर हम रूस और फ्रांस से तकनीकी सहयोग लेकर पूरी कर लेंगे । रही यूरेनियम की उपलब्धता की बात तो लाखों टन यूरेनियम मेघालय और राजस्थान मे पड़ा हुआ है । भारत में किसी चीज की कमी नहीं है प्यारे ओबामा । बस नेताओं को कमीशन खाने का रोग लगा हुआ है । यही हमारी सबसे बड़ी दिक्कत है ।

<=ओबामा के राष्ट्रपति बनने से पहले बड़े हल्ले थे । लेकिन अब इनके लच्छन देख कर अवधी की एक कहावत याद आती है ''रात भर सोहर गायेन । सवेरे देखे तो बेटवा के औजारय नाहीं ।''

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मराठी वनमानुषों का हल्लाबोल । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on November 17, 2009

सचिन की टिप्पणी ”मैं मराठी हूं पर पहले मैं एक भारतीय हूँ” पर चिंचिआये बुढऊ बाल ठाकरे ने सचिन को फोकट की नसीहत दे डाली ”आप क्रिकेट की पिच पर चौके छक्के लगाने के लिये स्वतंत्र हैं लेकिन राजनीति की पिच से दूर रहें (क्योंकि बुढऊ ठाकरे अपने भतीजे से ही पार नहीं पा रहे हैं सचिन भी अगर राजनीति में उतर गये तो उनको रिटायर्ड हर्ट हो जाना पड़ेगा) । आपके इस बयान से मराठी मानुष दुखी हुआ है ।” मराठी मानुष का तो पता नहीं पर मराठी वनमानुष के टेसुए जरूर बहने लगे हैं ।

बुढऊ ठाकरे भी मजबूर थे । इससे पहले की उनका वनमानुष भतीजा मुद्दे पर हाथ साफ करता उन्होंने डाईव मार कर मुद्दे को कैच कर लिया । राष्ट्रीय स्तर पर गाली खाने के लिये उन्हें कोई अंतर्राष्ट्रीय स्तर का घटिया बयान देना था । उन्होंने दिया और बदले में उन्हें पूरे देश से ‘गेट वेल सून’ के संदेश प्राप्त हुये । सनकने की कोई उम्र नहीं होती । चचा-भतीजे के पास और कोई काम नहीं है । एक पट्ठा विधानसभा को अखाड़ा बनाये हुये है तो दूसरा चांद की तरफ मुंह कर के लघु शंका से निवृत हो रहा है ।

बी. सी. सी. आई. उपाध्याक्ष, कांग्रेस रत्न श्री राजीव शुक्ल ने दशकों बाद कोई अच्छी बात कही ”ठाकरे मो0 अली जिन्ना की भाषा बोल रहे हैं ।” इस बयान से दो बातें पता चलती हैं कि कांग्रेसी जिन्ना को अच्छा आदमी नहीं मानते हैं और दूसरी बात राजीव शुक्ल का यह बयान कांग्रेसी नीतियों से कोसों दूर है । राजीव शुक्ल को इस बयान के लिये सोनिया गांधी शांति पुरस्कार से नवाजा जाना चाहिये । वनमानुष चचा के वनमानुष भतीजे को पाला पोस कर कांग्रेस ने ही खड़ा किया है । अगर कांग्रेस हृदय से इस देश के संविधान में आस्था रखती है तो संविधान की मूल भावना और देश की एकता और अखंडता के साथ दुराचार करने वाले इन दोनों मराठी वनमानुषों की पार्टी को प्रतिबंधित करने के लिये उसे इलेक्शन कमीशन का दरवाजा खटखटाना चाहिये ।

कांग्रेस ने अंग्रेजों से सत्ता पाई । अंग्रेजों ने भारत पर लगभग 200 साल ‘डिवाईड एण्ड रूल’ पॉलिसी की मदद से राज किया । सत्ता पर लम्बे समय तक कब्जा बनाये रखने के लिये कांग्रेसियों ने भी इसी पॉलिसी का सहारा लिया । वोट काटो और राज करो । इस काम के लिये वोट कटवा वनमानुषों की जरूरत पड़ती है इसलिये अलग अलग राज्यों में वनमानुषों को मजबूरीवश पालना पड़ता है । महराष्ट्र और आंध्रप्रदेश इसके ताजा उदाहरण् हैं ।

ठाकरे के इस बयान से महान सचिन का कुछ भी नुकसान नहीं हुआ पर दुनिया को पता चल गया कि बूढ़ा वनमानुष तन से अब भी स्वस्थ्य है अलबत्ता दिमाग जरूर पहले की तरह अस्वस्थ है । मैं तो ईश्वर से दोनो चचा-भतीजे के मानसिक स्वास्थ्य की कामना करता हूँ और गेट वेल सून के मंत्र का जाप करता हूँ । आप भी मित्रों इसी मंत्र का जाप करिये ।

=>सचिन क्रिकेट खेलो, क्रिकेट । राजनीति मत खेलो ।

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ये आग कब बुझेगी ? (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on October 31, 2009

पिछले 36 घंटे से जयपुर के सीतापुर इलाके में इंडियन आयल के डिपो में अग्निदेव ने अपनी क्रोधाग्नि प्रज्जवलित कर रखी है । भारत सरकार एक पंथनिरपेक्ष सरकार है इसलिये वह किसी धर्म-कर्म के मामले में हाथ नहीं डालती । नीति के विरूध्द होता है । इसलिये हमारे सुयोग्य केन्द्रीय मंत्री श्री मुरली देवड़ा ने अपने दोनो हाथ खड़े कर दिये हैं । उनका कहना है कि किसी भी प्रकार की कोशिश बेकार है इसलिये हम अग्निदेव का क्रोध शांत होने का इंतजार करेंगे । आग सब कुछ जला कर खुद-ब-खुद खत्म हो जायेगी । वही बात हुयी कि गाड़ी में ब्रेक की क्या जरूरत है, टकरा कर अपने आप रूक जायेगी । तब तक क्या करेेंगे ? दिल्ली में बैठ कर टी.वी. पर अलाव तापेंगे । ग्यारह टैंकर फट चुके हैं । बारहवें के भी फटने का मजा लेना है । दीपावली के बाद 1000 करोड़ का दिवाला निकल रहा है ।

मित्रों, ज्वलनशील पदार्थ रखने के लिये सरकार से लाइसेंस लेना जरूरी होता है । ज्वलनशील पदार्थ रखने के लिये तमाम सुरक्षा के मानकों को पूरा करना होता है । जब सरकारी कम्पनियां ही मानकों को पूरा करने में लापरवाही बरत रही हैं तब दूसरों से तो उम्मीद करना ही बेकार है । जयपुर की घटना के बाद तेल मंत्रालय कह रहा है कि हमने कभी इतनी बड़ी आग के बारे में सोचा ही नहीं था । भइया जब बुझाने का बूता नहीं है तब इत्ता मसाला एक जगह इकट्ठा ही क्यों करते हो । जन, धन और पर्यावरण का टेंटुआ दबाने के लिये । सरकार भले न सोचे मगर ऐसे डिपो, रिफाइनरियों, रिफलिंग स्टेशनों के बगल में मकान लेने वाले सबसे पहले यही सोचते हैं कि अगर किसी दिन ससुरा फटा तब कितना बड़ा इलाका स्वाहा होगा? जनता को सरकार की औकात के बारे में कफी कुछ पता होता है ।

हमेशा की तरह जांच के लिये एक कमेटी का गठन कर दिया गया है । पता नहीं ये कोई दुर्घटना है या पड़ोसी की वह करतूत जिसकी चेतावनी पिछले दो महीने से इज़रायल, अमेरिका सहित प्रधानमंत्री तक खुद दे चुके हैं । जो भी हो लेकिन इससे देश भर में फैले आयल डिपो की सुरक्षा पर शंका उठनी शुरू हो गयी है । बहुत से डिपो और रिफलिंग स्टेशनों की दूरी तो आबादी से अधिक दूर भी नहीं है । जयपुर के अग्निकाण्ड ने आतंकियों को खूब नयनसुख प्रदान किया होगा । इस प्रकार के डिपो और रिफलिंग स्टेशन आतंकियों के लिये साफ्ट टार्गेट तो नहीं ? चेक कर लो भइया । कहीं अगली बार फिर से न कह दो कि हमारी सरकार पंथनिरपेक्ष सरकार है और देवी-देवताओं के काम में हम लोग टांग घुसाने की कोशिश नहीं करते हैं ।

=>प्रणाम अग्निदेव ।

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मनमोहन-ओबामा का घरेलु मामला । (व्‍यंग्‍य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on October 26, 2009

अमे‍रिका के राष्‍ट्रपति बराक ओबामा हमारे चिरंजीवी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की मेजबानी की तैयारियों में जी जान से लगे हुये हैं । महात्‍मा गांधी के साथ डिनर की ख्‍वाहि‍श ने ही उनको शांति के नोबेल से विभूषित करवा दिया तो सशरीर मनमोहन सिंह के साथ लंच-डिनर करने पर उनको न जाने कौन सी महान उपलब्धि हो जाये । कुछ भी सरप्राइज़ हो सकता है । फिलहाल उनको मनमोहन सिंह जी का बेसब्री से इंतजार है । उनका हृदय इतना पुलकित हुआ जा रहा है कि भावावेश में उनकी जबान फिसली जा रही है । कल ही मारे खुशी के उनके मुंह से निकल गया कि वे मनमोहन सिंह जी को अपने परिवार का हिस्‍सा मानते हैं । उनके इस डायलाग से इस्‍लामाबाद में कुछ 4.5 तीव्रता का भुकंप महसूस किया गया लेकिन फिर सब नार्मल हो गया । पाकिस्‍तान जिसके रिश्‍ते अमेरिका से नितांत घरेलु टाइप रहे हैं वो अच्‍छी तरह से जानता है कि बड़े लोगों को जब गरीब गुरबा से कोई छोटा मोटा काम निकलवाना होता है तो वो सिर्फ जबानी खर्च से काम लेते है और अपना उल्‍लू सीधा कर लेते हैं । जैसे रिक्‍शेवाले को 5-10 रूपये कम देने हों तो रास्‍ते भर उसके गांव और खेती बाड़ी का हाल चाल लेते रहो और घर पहुंच कर एक ढेला गुड़ एक लोटे पानी के साथ टिका दो । हो गया फायदे का सौदा । ओबामा को भी न्‍यूक्लियर डील के बाद अब सीटीबीटी और एनपीटी के उल्‍लू दिखाई पड़ रहे हैं जिन्‍हें वह हमें टिकाना चाहता है । शांति का नोबेल साला कहीं भारत को भारी न पड़ जाये ।

न्‍यूक्लियर डील में बहुत सी कमीनी हरकत हमारे साथ की गयीं या ये कहिये कि पिछली मनमोहन सरकार ने पता नहीं किस लालच में इन शर्तों को स्‍वीकार किया था । हमको इस्‍तेमाल हुये यू‍रेनियम के पुनर्संस्‍करण का अधिकार इस डील में नहीं दिया गया है । मनमोहन सिंह को अपनी इस वाशिंगटन यात्रा में यह उपहार मिलने की बड़ी उम्‍मीद है लेकिन ओबामा सिर्फ जबानी जमाखर्च से ही काम चलाना चाहते हैं और गरीब आदमी को कुछ देने के बजाये वो उसकी अंटी में से ही कुछ काम की चीज़ निकाल लेना चाहते हैं । जैसे धंधे के नये क्षेत्र । भारत सरकार अपनी रक्षा जरूरतों के लिये आने वाले कुछ साल में 100 अरब डालर की खरीदारी करने जा रही है । मंदी से जूझते अमेरिका को फिलहाल मनमोहन सिंह परिवार के आदमी ही लगेंगे । अपने भारत में अगर किसी फरियादी को टालना होता है तो उससे यही कहा जाता है ‘अरे आप क्यूं परेशान हो रहे हैं । आप तो घर के आदमी हैं’’ । घर का आदमी यानी की घर की मुर्गी दाल बराबर । देखिये मनमोहन‍ सिंह जी को क्‍या हासिल होता है इस यात्रा से । वे ओबामा से कुछ हासिल कर पाते हैं या ओबामा मनमोहन को मू़ड़ते हैं, ये तो वक्‍त ही बतायेगा ।


^=आई लव चिकन पुलाव एण्‍ड लेग पीसेज़

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मास्टरमाइंड आतंकी हाफिज सईद बाइज्ज़त बरी (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on October 13, 2009

=>जज साहब, कृपया मुकद्दमे की बारीकियों पर नज़र डालें. मोहतरमा की टांगों से ज्यादा संगीन मुलजिम के अपराध हैं.

दृश्य : लाहौर की एक क्रिमिनल कोर्ट ।

जमादार : मुलजिम हाफिज सईद हाज़िर हों sssss ।

हाफिज सईद : मादर…, नाबीने की औलाद । दीदे फूट गये हैं तेरे । सामने ही तो खड़ा हँ, क्यूं हलक फाड़ कर चिल्ला रहा है । जिस दिन ए.के. -47 की नाल हलक में घुसेड़ दूंगा उस दिन सुनूंगा तेरी आवाज़ ।

जमादार : माई बाप, मुआफ करें, नौकरी है, सो चिल्लाना पड़ता है । फिर आपको कौन नहीं जानता । हिन्दुस्तान से लेकर अमरीका तक बड़े हल्ले हैं आपके । तशरीफ लाइये । अदालत इंतज़ार कर रही है ।

हाफिज सईद : अबे साले, इंतजार तो हमारा मियां मुशर्रफ तक किया करते थे, ये दो टके की अदालत क्या चीज़ है । भैन….., एक तो मुल्क और इस्लाम के लिए ज़िहाद का नारा बुलंद करते फिरो, ऊपर से ये कोर्ट-कचहरी का चक्कर अलग से । अब कोर्ट में हाजिरी दें कि हिन्दुस्तान में दहशत गर्दी का नंगा खेल खेलें । जब से हरामखोरों ने नज़रबंद किया है ज़िंदगी दोज़ख हो गई है । दो महीने हो गये किसी कश्मीरी औरत के साथ जिना किये।

जज : अरे! आइये, आइये हाफिज साहब । आदाब । आज इधर कैसे आना हुआ आपका । सब खैरियत तो है ।

हाफिज सईद : खुदा खैर करे । जब मुल्क के सिपाही बंदूक छोड़ कर अदालतों के चक्कर लगायेंगे तब परवरदिगार ही इस मुल्क पर रहम खा सकता है ।

जज : ओ अच्छा, अच्छा । अब समझा । कहां तो सरकार को मुबंई हमले के लिए आपको निशाने- पाक से नवाज़ना चाहिए था और कहां काफिरों के ज़रा सा चिल्लाने पर आपको नज़रबंद कर दिया । मिट्टी पड़े मरदूदों के मुंह पर । आप आराम से तशरीफ रखिये । क्या लेंगे ? ठंडा गरम या फिर कुछ खाने को मंगाये ।

हाफिज सईद : अरे नहीं, नहीं । तकल्लुफ़ क्यूं करते हैं । अभी दो प्लेट कबाब घर से खा कर निकला हूं । आज नहीं, फिर कभी घर आकर मजे से चाय-नाश्ता कर जाउंगा । बच्चे कैसे हैं । बेगम का कौन सा महीना चल रहा है । कितने बच्चे हो गये आपके? सात हैं कि आठ ?

जज : आपकी याद्दाश्त भी अब कमज़ोर होने लगी है । नौ तो पहले से ही थे । अबकी जुलाई में कुल दस हो जायेंगे । बड़ा करम है अल्ला ताला का ।

हाफिज सईद : आप भी इस्लाम के सच्चे सिपाही हैं । जितने बच्चे होंगे उतना ही इस्लाम मजबूत होगा । सबको मेरे मदरसे में तालीम के लिए भेज देना । सबको तालिबानी बना दूंगा ।

जज : जी, जी, बहुत अच्छा, शुक्रिया आपका । हां, पेशकार मुकद्दमा शुरू किया जाये ।

सरकारी वकील आगे आता है ।

जज : आप सरकार की तरफ से वकील हैं । मुलजिम का वकील कहां है ।

सरकारी वकील : हुजूर, मैं सरकार और मुलजिम दोनों का ही वकील हूं । सरकार का वकील बन कर नौकरी बजा रहा हूं और हाफिज साहब का वकील बन कर इस्लाम की मदद कर रहा हूं ।

जज : अच्छा ठीक है । बहस शुरू करें ।

सरकारी वकील : हुजूर, मुलजिम पर इल्जाम है कि उसने भारत के शहर मुंबई पर आतंकी हमले के लिए दहशतगर्दों को ट्रेनिंग दी, हथियार और रूपये मुहैया कराये और हमले का पूरा मंसूबा भी इन्होंने ही तैयार किया ।

जज : वकीले सफाई का क्या कहना है ।

वकील सफाई : हुजूर, ये इल्जाम सौ फीसदी सही हैं । लेकिन चूंकि मुलजिम ने ये सारी कार्यवाही इस्लाम और मुल्क के प्रति अपनी वफादारी दिखाने के लिए की है, इसलिए मुलजिम के जज्बातों का ख्याल रखते हुए इस नेक काम के लिए उसकी हौसलाअफजाई करनी चाहिए और बाइज्ज़त बरी किया जाना चाहिए । ज़िहाद के लिए मर मिटने वाले खुद्दार सैनिकों की जगह अदालतों और कैदखानों में नहीं है । उन्हें तो काफिरों को उन्हीं की ज़मीन पर जिबह करने और उनकी औरतों, बच्चियों के साथ जिना करने का पाक काम अजांम देना होता है ।

जज : ठीक कह रहे हैं आप । सरकारी वकील साहब, मुलजिम के खिलाफ आपके पास कोई सबूत या गवाह है या सिर्फ कोरी लफ्फाजी से ही आप काम चलायेंगे ।

सरकारी वकाल : हुजूर, भारत से कुछ रद्दी दस्तावेज़ भेजे गयें हैं, जिन्हें कि वो सबूत कह रहे हैं ।

वकीले सफाई : जज साहब, अब भला कागज़ के चंद टुकड़ों के बिना पर क्या हम मुल्क और इस्लाम के खैरख्वाह इस इंसान को कैद कर सकते है । अब ऐसे ही काफिरों की चिल्ल-पों पर कान देने लगेंगे तो हो चुका ज़िहाद और बन चुका पाकिस्तान मुस्लिम देशों का सरदार । अब देखिए इतने सबूत थे डा0 अब्दुल कादिर खां साहब के खिलाफ, अमरीका पीछा पड़ा हुआ था कि उन्होंने ही लीबिया, ईरान जैसे मुल्कों को परमाणु तकनीकि मुहैया करायी थी, तो क्या हम हमारे मुल्क के महान साइंसदान को तिल तिल कर मरने के लिए सी. आई. ए. को सुपुर्द कर देते । फिर हुजूर क्या कोई मुल्क अपने बहादुर सिपाहियों पर इसलिए मुकद्दमा चलाता है कि उसने दुश्मनों को हलाक किया था । भारत के लिए हाफिज साहब भले ही अपराधी हो लेकिन हमारे लिए तो वो इस्लाम का परचम लहराने वाले एक बहादुर सिपाही हैं और पूरे मुल्क को उन पर नाज़ है । मुल्क की भलाई के लिए और ज़िहाद के झंडे को ऊंचा बनाये रखने के लिए मैं इस अदालत से दरख्वास्त करता हूं कि इस महान शख्सियत और सिपाही को इस अदालत से बाइज्ज़त बरी किया जाये ।

जज: सरकारी वकील को और कुछ कहना है ।

सरकारी वकील : नहीं हुजूर । आप जैसा मुनासिब समझें फैसला सुनाएं ।

तभी अदालत का एक कर्मचारी आकर जज के कान में कुछ कहता है ।

कर्मचारी : हुजूर, बलुचिस्तान से मुल्ला उमर और लादेन साहब का तार आया है कि हाफिज साहब को ज़िहाद का परचम लहराने के लिए जल्द से जल्द रिहा किया जाये ।

जज : अच्छा, अच्छा ।

जज : दानों तरफ की दलीलों को सुनने के बाद और पेश किये गये चंद रद्दी सबूतों को देखने के बाद ये अदालत इस फैसल पर पहुंची है कि मुलजिम हाफिज सईद कतई गुनेहगार नहीं हैं और चूंकि भारत के कानून पाकिस्तान में लागू नहीं होते हैं और कोई भी मुल्क अपने सिपाहियों को बहादुरी के एवज में उन्हें इनामों से नवाज़ता है नाकि उनको सजा सुनाता है इसलिए ये अदालत इस्लाम और मुल्क के आला सिपाही हाफिज सईद साहब को बाइज्ज़त बरी करती है ।

भीड़ : मुबारक हो, मुबारक हो ।

पत्रकार : हाफिज साहब अब आप आज़ाद हैं । सबसे पहला काम अब आप कौन सा करेंगे ।

हाफिज सईद : बहुत दिन हो गये किसी काफिर का कत्ल किये हुए और कमसिन कश्मीरी सेब दांतो से काटे हुए । कुछ दिन मुज्ज़फराबाद में रह कर पहले शरीर की थकान उतारूंगा उसके बाद कश्मीर की आज़ादी के लिए फिर से ज़िहाद शुरू करूंगा । अच्छा खुदा हाफिज ।

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बराक ओबामा को शांति का और नोबेल पुरस्कार कमेटी को हास्य-व्यंग्य का नोबेल (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on October 10, 2009

धन्य हैं नोबेल प्राइज कमेटी वाले भी । युध्द, गरीबी, भुखमरी, स्वाइन फ्लू, आतंकवाद, प्राकृतिक आपदाओं आदि से त्रस्त दुनिया के चहरे पर एक अदद मुस्कान लाने के लिये वो किसी भी हद तक जा सकते हैं । वो चले भी गये । कामयाबी ने चरण चूमे और ओबामा को मात्र तीन भाषणों के लिये शांति का नोबेल दे दिया गया । ओबामा को शांति का और पुरस्कार कमेटी को दुनिया को हंसाने के लिये हास्य-व्यंग्य का नोबेल ।

प्राग, काहिरा और संयुक्त राष्ट्रसंघ में शांति और परमाणु निरस्त्रीकरण की माला जपने के लिये ओबामा को यह पुरस्कार दिया गया है लेकिन पुरस्कार कमेटी वालों से एक भारी चूक हो गयी । वो मनमोहन सिंह को भूल गये जिन्होंने अमेरिका के चरके मे न्यूक्लियर डील पर साइन करके भारत को बधिया बनाने में अमेरिका की मदद की । हमने प्लूटोनियम आधारित साइरस न्यूक्लियर रियेक्टर को बंद कर दिया है जिससे हमें परमाणु बम के लिये प्लूटोनियम मिलता था । शांति का नोबेल सम्मिलित रूप से ओबामा और मनमोहन दोनो को मिलना चाहिये था ।

महात्मा गांधी के साथ डिनर का ख्वाब देखने वाले को आठ माह में ही नोबेल पुरस्कार मिल गया और बापू जीवन भर सत्य, अहिंसा के लिये अनशन करते रह गये और मिली भी तो गोडसे के पिस्तौल से निकली गोलियां । भारत के हाथ से परमाणु बम की ताकत छीन कर बापू की लाठी पकड़ाने के लिये ही ओबामा को नोबेल मिला है । जो देश असहयोग आंदोलन का जन्मदाता रहा हो उसके हाथ में परमाणु बम शोभा नहीं देते । परमाणु बम बने हैं पाकिस्तान, ईरान, म्यांमार, चीन और अलकायदा के लिये । अब्दुल कादिर खान, मुशर्रफ चाहे मक्का मदीने में खड़े हो कर चिल्लायें कि हमने ही परमाणु बम का फार्मूला दूसरे देशों को गिफ्ट किया था तो भी अमेरिका को उनकी बात पर विश्वास नहीं होगा (मजाक करने से बाज नहीं आते हरामखोर) ।

आजकल दलाई लामा ओबाम के बुलावे पर वाशिंगटन की खाक छान रहे हैं । चीन ने घुड़क दिया है इसलिये शांति के पुजारी ओबामा अब लामा से मिलने में हिचक रहे हैं । दुनिया में शांति तो बनी रहेगी पर घर की शांति में खलल पड़ गयी तो मन की शांति भी जाती रहेगी ।


<=सर जी जो 14 लाख डालर आपको मिल रहे हैं इनाम के वो हमें दे दीजिये । उनसे हम कुछ हथियार खरीद लेंगे तालिबान और भारत से लड़ने के लिये । इन हथियारों से हमारे मन को शांति मिलेगी और भारत की नींद हराम होगी ।

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आशिकों ने नजरें गड़ा गड़ा कर देखा है । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on October 9, 2009

पृथ्वी के एक मात्र उपग्रह श्रीमान चांद की अब खैर नहीं । भारत के चन्द्रयान – 1 ने मि0 चांद की सतह पर पानी होने की सम्भावना बतायी तो नासा ने तुरंत एक राकेट चांद की तरफ उछाल दिया जो मि0 चांद की खुपड़िया (ध्रुव) पर एक के एक दो धमाके करेगा और पता करेगा कि चांद पर वाकई में पानी है या एक बार फिर अमेरिका के करोड़ों डालर पर पानी फिर गया है । टक्कर की खबर सुन कर श्रीमान चांद पसीने पसीने हो रहे हैं उस रोगी के माफिक जिसे स्ट्रेचर पर लाद कर मेजर आपरेशन के लिये आपरेशन थियेटर की तरफ ले जाया जा रहा हो ।

श्रीमान चांद की हालत देख कर मुझे उस माशूका का (मेरी नहीं गालिब की) ख्याल आ रहा है जिसके चेहरे पर चेचक निकल आयी थी और उसने कुछ इस तरह अपनी मुसीबत का ठीकरा अपने आशिकों के सिर फोड़ा था ।

ये चेचक के दाग नहीं गालिब ।
आशिकों ने नजरें गड़ा गड़ा कर देखा है ।

श्रीमान चांद की चांद पर अगर इस टक्कर के बाद भी पानी नहीं निकला तो वह तो शर्म से पानी पानी हो जायेंगे । भला यह भी कोई बात होगी कि पानी से लबालब भरी पृथ्वी का रात दिन चक्कर लगाने वाले मि0 चांद के घर से एक बाल्टी पानी भी न बरामद हो । डूब मरने की बात होगी । लेकिन डूबने के लिये भी तो चुल्लू भर पानी की जरूरत होती है । देखते हैं कि आज की इस टक्कर से नासा को कितना पानी मिलता है । मिल जाये तो नासा की नाक भी बची रहे और श्रीमान चांद भी शर्म से पानी पानी होने से बच जायेंगे।

<=शरीफ औरतों का घर से निकलना मुश्किल हो गया है । नासपीटा रात दिन पृथ्वी के चक्कर लगाता फिरता है । चांद सी शक्ल पर बड़ा गुमान है न तेरे को । इतनी मार मांरूगा कि शेरो-शायरी से चांद सा चेहरा डिलीट हो जायेगा ।

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करीना अब सीखेंगी एक्टिंग के गुर (हास्य/व्यंग्य)

Posted by K M Mishra on October 7, 2009

आखिर बेबो को अक्ल आ ही गयी । कब तक वो ही, ही, हू, हू, वाली अदाओं और ज़िरो साइज़ फिगर के खंभे पर चढ़ी रहतीं । बालीवुड में हिरोइनें 13 साल की उम्र में ही जवान हो जाती है पर उनकी अक्ल की डाढ़ तब निकलनी शुरू होती हैं जब उनकी चिकनी त्वचा में झुर्रियां पड़ने लगती हैं । देर आयद दुरूस्त आयद । बेबो एक्टिंग सीख लेंगी तो कुछ साल और सिल्वर स्क्रीन पर खिंच जायेंगी नहीं तो सैफ अली से खर्चा मांगने की नौबत आ जायेगी ।=>

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उपद्रवियों ने हाथरस में महानंदा एक्सप्रेस को आग में झोंका । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on October 1, 2009

=>
भारतीय रेल, हमारी संपत्ति । अपनी संपत्ति को फूंकने का हमें नैसर्गिक अधिकार है । हा, हा, हा, । सरकार भी हमारा कितना ख्याल रखती है । परिवहन विभाग जल्दी ही उत्तरप्रदेश में 2200 बसें उतारने जा रहा है । अपनी संपत्ति को फूंकने का मजा ही कुछ और होता है । जो घर फूंके आपना चले हमारे साथ ।

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क्वात्रोची के खिलाफ सी.बी.आई. के पास कोई सबूत नहीं। (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on September 30, 2009

=>भौं, भौं, भौं, भौं, भौं,

<=अबे साले ! तेरे कू इतना भी नहीं पता कि अतिथि देवो भव होते हैं । फिर सरकारी अतिथि पर भौंक कर तू अपनी हड्डी से भी पंजे धो बैठेगा । सरकारी नौकरी में सिर्फ उसी पर भौंका जाता है जिससे सरकार को खतरा हो ।

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पाकिस्तान के सत्य की जीत । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on September 27, 2009

नवरात्र के नौ दिन अत्यंत शुभ और चमत्कारी होते हैं । श्रध्दालु नौ दिन व्रत रखते हैं, देवी का पाठ करते हैं और मनमांगी मुराद पाते हैं । दशहरा असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक माना जाता है । जो सत्य पर डटा रहता है उसकी विजय निश्चित है । महात्मा गांधी सत्य की माला जपते-जपते शहीद हो गये पर जितनी कद्र उनके सिध्दांतों की पड़ोसी दुश्मन देश पाकिस्तान ने की उसका चारआने भी अगर भारत सरकार ने की होती तो आज ये दिन न देखना पड़ता ।

पड़ोसी दुनिया जहान की फिक्र भुला कर सत्य पर डटा हुआ है । जो होगा देखा जायेगा । कोई गुनाह थोड़े ही कर रहे हैं । मुहब्बत और जंग में सब जायज होता है । हम न छोड़ेंगे सच का रास्ता, भले ही ये रास्ता कांटों भरे जंगल से गुजरता हो । दुनिया से जो उखाड़ते बने उखाड़ ले । डर-वर नहीं लगता है हमको सच बोलने से । साला एक झूठ के लिये हजार झूठ बोलने पड़ते हैं । झूठ बोल कर भी देख लिया । सौ स्टेटमेंट देने पड़ते हैं । अब झूठमूठ का कोई लफड़ा नहीं पालते हम लोग । सीधे सीधे सच का सामना करते हैं । इकदम खरा, 24 कैरेट सोने के माफिक सच । देशहित में हम दुनिया में आग लगा रहे हैं । पड़ोसी का घर फूंक रहे हैं । हथियार जमा कर रहे हैं । परमाणु बम की तकनीकि अपने जैसे हरामी मुल्कों को बेच रहे हैं । आतंक की सबसे बड़ी फैक्ट्री हमने सरकारी पैसे से लगाई है और माल सारी दुनिया में एक्सपोर्ट कर रहे हैं । इस्लाम का परचम लहराने के लिये और भी जो जरूरी होगा, वह भी करेंगे । आतंक फैलाना हमारा जन्मसिध्द अधिकार है । हमारा जन्म ही आतंक फैला कर हुआ था । जिन्ना ने डाइरेक्ट एक्शन लिया था हम डाइरेक्ट-इनडाइरेक्ट दोनो तरह से आतंक की फसल तैयार करते हैं । आतंक हमारा राष्ट्रीय उद्योग है । पब्लिक सेक्टर और प्राइवेट सेक्टर दोनो ही इस धंधे में लगे हुये हैं और जो इन दोनो में नहीं आते उनकी हम आतंक का लघु उद्योग लगाने में मदद करते हैं, न सिर्फ पाकिस्तान में बल्कि अफ्गानिस्तान, कश्मीर, सूडान, लीबिया, उत्तर कोरिया, तमाम गरीब अफ्रीकी देशों में । (अब क्या अपने ग्राहकों की पूरी लिस्ट ही आप को सौंप दें ।)

इधर एक हम हैं । सच भी ऐसे बोलेंगे जैसे झूठ बोल रहें हों । नजरें झुका कर । महीन दबी आवाज में । चोरों की तरह । बड़े मुल्कों की शर्ट खींच खींच कर बता रहे हैं – सर जी एक हमारा पड़ोसी मुल्क है । बड़ा बमबाज । रोज हमारे यहां बम फोड़ जाता है । उसको बोलिये कि शरीफों के मुहल्ले में ऐसी हरकत न किया करे । एटिकेट्स देखिये । दुश्मन मुल्क को दुश्मन तक न बोलेंगे और नाम भी ससुरे का जबान पर नहीं लायेंगे, जैसे शुध्द भारतीय पतिव्रताएं अपने भरतार का नाम जबान पर नहीं लेतीं बिल्कुल वैसे । भारत सरकार की हैसियत उस लड़की के बाप की है जिसकी नाबालिग लड़की को दबंगों ने उसके ही घर में घुस कर रेप किया हो और वो बेचारा कानून की दुहाई देता बलात्कार की मेडिकल रिपोर्ट लिये थाने में घूम रहा है । भारत सरकार भी क्या करे । पं0 नेहरू के पद चिन्हों पर भी तो चलना है । वो कश्मीर मामला यूएनओ की चौकी में ले गये थे । ये मुंबई हमाले के साक्ष्य दुनिया भर को कूरियर करते फिर रहे हैं । 1947 से 2009 तक के बलात् दुराचार की मेडिकल रिपोर्ट लिये दुनिया भर में घूम रहे हैं । हालत ये है कि बौना बंग्लादेश तक हमको कुछ नहीं समझता । पता करिये कहीं अब्दुल कादिर खान साहब ने परमाणु बम का फार्मूला शेख हसीना को भी तो नहीं सप्लाई कर दिया था । म्यांमार तो बम फोड़ने की दहलीज पर पहुंच भी चुका है ।

अब देखिये पाक की सीनाजोरी । जुलाई में राष्ट्रपति जरदारी ने कबूला था कि आतंकवादी हमारे ही पैदा किये हुये सांप हैं । इन्हें हमने भारत के लिये पाला था लेकिन अब ये हमारे लिये ही मुसीबत बने हुये हैं । पिछले महीने पूर्व राष्ट्रपति जनरल मुशर्रफ ने फरमाया कि हर अमेरिकी मदद का इस्तेमाल हम भारत के खिलाफ करते हैं । अमेरिका द्वारा दी गयी पोतभेदी हार्पून मिसाईल का जमीनी संस्करण तैयार करके पाकिस्तान ने अमेरिकी कानून की धज्जियां उड़ा दी । अभी परमाणु विज्ञानी अब्दुल कादिर खान का एक पुराना प्रेमपत्र प्रकाश में आया जो कि उन्होंने 2003 में अपनी पत्नी को लिखा था । इस पत्र में उन्होंने कुबूला था कि पाकिस्तान के परमाण्ाु अभियान में सबसे बड़ा मददगार चीन है । पाकिस्तान ने अपना पहला परमाणु परीक्षण सन 1989 में चीन में किया था । बाद में पाकिस्तान सरकार (मरहूम प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो) और पाक सेना ने परमाणु तकनीकि को इरान, उत्तर कोरिया, लीबिया जैसे दूसरे शांतिपरस्त देशों को बेच दिया था । इतने बड़े बड़े खुलासे । इतने महान सच दुनिया के सामने उद्धाटित हुये बस कुछ ही दिनों में । दुनिया, खासकर अमेरिका इस महान सच की रोशनी से अभिभूत हो गया । सत्यवादी पाकिस्तान की पीठ थपथपाने के लिये खुश होकर अमेरिकी संसद ने अगले पांच साल तक प्रतिवर्ष डेढ़ अरब डॉलर की अमेरिकी मदद वाले कानून को हरी झंडी दिखा दी । इसके अलावा अमेरिकी संसद ने युध्द कोष विधेयक के तहत 40 करोड़ डॉलर की आर्थिक मदद को भी मंजूरी दे दी ।

पाकिस्तान ने अपना सत्य ज्यादा जोरदार तरीके से रखा इसलिये अरबों डॉलर की अमेरिकी मदद उसे दे दी गयी । भारत सरकार ने अपना सत्य मनमोहनी कांग्रेसी तरीके से रखा इसलिये हमे एनपीटी की नसीहत दे दी गयी । वैसी ही नसीहत जैसी कि बलात्कार की शिकार लड़की के बाप को थाने में दी जाती है । गलती से इस बाप के पास अपनी लाइसेंसी बंदूक है इसलिये थानेदार उस बंदूक को थाने में जमा कराने पर भी जोर दे रहा है । गोलियां तो न्यूक्लियर डील में जमा ही करवा ली गयीं थी (न्यूक्लियर रियेक्टरर्स को सैन्य और असैन्य में विभाजित करवा कर ।) देखते हैं बंदूक कब तक बची रहती है ।

शुक्रिया, शुक्रिया हुजूरेआला । इन पैसों से हम आपके दुश्मनों की भी खबर लेंगे और अपने दुश्मनों की भी । =><

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हम संतन से का मतलब ! (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on September 26, 2009

_____________________________लेखक – नरेश मिश्र

चार कुकर्मी थे । निहायत नापाक । वारदात करने के बाद पुलिस से बचने के लिये चारों ने गेरूआबाना धारण किया । गेरूआ वस्त्र तमाम कुकर्मों को ढ़क लेता है ।चारों कुकर्मी संत बन कर तीर्थयात्रा पर निकल लिये । रास्तें में एक गांव के बाहर कुछ किसान एक साही को लाठियों से पीट रहे थे । उनकी लाठियाँ साही के कांटों पर गिर कर बेअसर हो रही थीं । किसान लाठी चलाकर पसीने से लथपथ हो गये । साही सिकुड़ी बैठी रही । चारों कुकर्मी संत बड़ी दिलचस्पी से किसानों की मशक्कत देख रहे थे । पहले के हत्यारे थे इसलिये उन्हें साही के मारे जाने का इंतजार था । साही नहीं मरी तो एक संत ने चिल्लाकर कहा ”नारायण, नारायण । साही मरे मूड़ के मारे । हम संतन से का मतलब ।” (साही सिर पर चोट करने से मरती है लेकिन हम संतन को इससे क्या मतलब)

किसान संत का इशारा समझ गये । उन्होंने साही के सिर पर लाठियों से चोट की । साही तड़प कर मर गयी । संत नारायण नाम का उच्चारण करते अपने रास्ते चले गये । उन्हें कोई पाप नहीं लगा ।

अपने इंडिया दैट इज भारत में ऐसे संतों की कमी नहीं है । एक ढूढ़ों हजार मिलते हैं । हाल ही में दिल्ली पुलिस ने एक कुख्यात नक्सली चिंतक, दार्शनिक को गिरफ्तार किया । ये महान बुध्दिजीवी इन दिनों तिहाड़ की सुविधाओं का लाभ उठा रहे हैं । केन्द्रीय मंत्री चिदंबरम ने तिहाड़ जेल का मुआयना किया । मुआयने के बाद वे इस जेल के इंतजामात से खुश नजर आये । हमारी उल्टी खोपड़ी में यह कीड़ा रेंग रहा है कि चिदंबरम के तिहाड़ मुआयने और माओवादी आइडियोलोग के उस जेल में रहने के बीच कोई अंदरूनी रिश्ता तो नहीं है । वैसे नक्सली बेहद खुंखार भेड़िये होते हैं । कांग्रेसी नेता व मंत्री भी इनसे खौफ खाते हैं । चिदंबरम शायद तिहाड़ मुआयने के जरिये नक्सलियों को यह संदेश देना चाहते हों कि उनके बुध्दिजीवी नेता खैरियत से हैं । उन्हें कोई तकलीफ नहीं है ।

छत्तीसगढ़ में तैनात कोबरा बटालियन ने दंतेवाड़ा में नक्सलियों को घेर कर उनका बड़ी तादद में सफाया कर दिया । घेराबन्दी के दौरान हथियार बनाने की एक फैक्ट्री भी पकड़ी गयी । यह खबर सुन कर हमें कोई अचरज नहीं हुआ । स्वावलंबन अच्छी बात है । चीन के मुकाबले हमारी हवाई सेना स्वालंबी हो न हो नक्सली तो अपनी लड़ाई के दौरान अपने पैरों पर खड़ा होना सीख गये हैं । चीन से बरास्ते नेपाल हथियार कहां तक मंगाते रहेंगे । आज नहीं तो कल इस देश पर नक्सलियों को ही हुकूमत करनी है । उन्हें हमारे देश की पुलिस और फौज से मुकाबला करने के लिये अपने ही कारखाने के हथियारों पर भरोसा करना होगा ।
जिन अक्लमंदों को हमारे लोकतंत्र की ताकत पर जरूरत से ज्यादा भरोसा है उन्हें चीन के इतिहास पर गौर करना चाहिये । चीन में माओ के हमले से पहले च्यांग-काइ-शेक की लोकतांत्रिक सरकार थी । माओ की चंगेजी सेना ने चीन की सरहद पार कर मुख्य भूमि पर हमला किया तो च्यांग-काइ-शेक बहुत लाल ताल हुये । उन्होंने बड़े गर्व से ऐलान किया कि चीन की लोकतांत्रिक सरकार आतंकवादियों का जोरदार मुकाबला कर उन्हें समुद्र में ढकेल देगी । माओ का तो कुछ नहीं बिगड़ा खुद च्यांग-काइ-शेक फना हो गये । जो मुल्क इतिहास से सबक नहीं सीखता उसे इतिहास सबक सिखाता है ।

अपने देश में माओवादियों के समर्थक तरह तरह के संत वेश धारण कर विचर रहे हैं । इसमें कुछ संत चिंतक, दार्शनिक मार्गदर्शक हैं । कुछ स्वंयसेवी संगठनों का चोला पहन कर मुल्क की जड़ों में मठा डाल रहे हैं । ऐसे ही देशद्रोहियों की छत्रछाया में माओवाद फल-फूल रहा है । एक टी.वी. चैनल पर बहस के दौरान माओवादी चिंतक वारवरा राव ने फरमाया कि क्रांतिकारियों को दुश्मन के खिलाफ जंग में हमेशा से खूंरेज कह कर बदनाम किया गया है । भगत सिंह को भी अंग्रेज खूनी और अपराधी कहते थे । इस बंदे का बयान सुन कर हमारे कान में खौलते तेल की धार पड़ गयी । हम सोचने लगे कि शहीदे आजम भगत सिंह तो ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ लड़े थे । उन्होंने किसी हिन्दुस्तानी को भूल भी कर नहीं मारा था । तो इस पट्टे ने ऐसे महान शहीद का नाम अपने हक में क्यों भुनाना चाहा । फिर हमें जाट और तेली का किस्सा याद आया । जाट और तेली पड़ोसी थे । तेली ने कहा – ‘जाट रे जाट, तेरे सिर पर खाट ।’ जाट भुन्ना कर बोला – ‘तेली रे तेली, तेरे सिर पर कोल्हू ।’ तेली मुस्कुराया ‘जाट तूने कहावत तो कही लेकिन तुक नहीं बैठा । जाट छूटते ही बोला ‘तुक नहीं बैठा तो क्या हुआ । तेरे सिर पर खाट से ज्यादा वजन तो लद गया ।’
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शहीदे आजम भगत सिंह ने आज से 75 साल पहले ये तो अंदाजा लगा लिया था कि कल इस देश पर काले अंग्रेज राज करेंगे लेकिन पाकिस्तान और चीन की मदद से इस देश को तोड़ने वाले साम्यवादी गद्दारों के बारे में उन्हें अगर जरा भी अनुमान होता तो शायद वे फांसी का फंदा छोड़ कर भविष्य के इन देशद्रोहियों से निबटने के तरीके ढूंढते जो आज उनके नाम का भी बेजा इस्तेमाल करने से नहीं चूक रहे हैं ।

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