जग बौराना : तोते का गला कांग्रेस के पंजे में ।
Posted by K M Mishra on मई 3, 2011
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जग बौराना : लोकतंत्र का तमाशा ।
Posted by K M Mishra on अप्रैल 22, 2011
लेखक : श्री नरेश मिश्र ।
न्याय के महाप्रतिष्ठान में देववाणी गूंज उठी । न्याय मंदिर में मौजूद भक्तगण देववाणी सुन कर निहाल हो गये । देवता ने धीर, गम्भीर वचन सुनाया – भक्तजनों जिस तरह महात्मा गांधी की आत्माकथा अपने घर रखने वाला गांधीवादी नहीं हो जाता, उसी तरह नक्सली साहित्य रखने वाला नक्सलवादी नहीं हो सकता है ।
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देव वचन सुनकर श्रद्धा से गदगदायेमान भक्तों ने एक स्वर से कहा – ‘सत्य वचन प्रभू, धन्य हो, आप की महिमा अपार है ।’
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न्याय के मंदिर में देवताओं की आकाशवाणी का यह पहला अवसर नहीं था । इससे पहले भी न्यायमंदिर में ‘लिवइन रिलेशन’ के बारे में निर्णय सुनाते हुए एक देवता ने कहा था – द्वापरयुग में राधाकृष्ण की जुगल जोड़ी भी साथ रहती थी । उसने लिव इन रिलेशन का मार्ग अपने भक्तों को दिखाया था ।
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न्याय मंदिर की इस देववाणी पर भी सेकुलर तबके ने ‘धन्य हो, धन्य हो’ का स्वर मुखरित किया था । राधाकृष्ण के करोड़ों भक्त मर्माहत हो कर सन्न रह गये थे, लेकिन इस मुल्क में उनकी सुनता कौन है । वे तो मुर्दे हैं । मुर्दे की छाती पर जैसे दस मन मिट्टी, वैसे सौ मन मिट्टी । मुर्दे की सेहत पर कोयी असर तो पड़ता नहीं ।
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मारना जिलाना, बंधन में जकड़ना या बंधन मुक्त करना न्याय मंदिर के देवताओं की मर्जी है । अर्जी लगाने वाले लाख दलीलें दें लेकिन मर्जी तो देवताओं की ही चलती है ।
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हमें विनायक सेन की जमानत पर कोयी ऐतराज नहीं है । देश विदेश का सारा मीडिया एकजुट हो कर विनायक सेन की हमदर्दी में लामबंद था । तमाम जाने माने तथाकथित स्वंयसेवी भी एकजुट थे । नीम पर तितलौकी तब चढ़ गयी जब बीस प्रख्यात नोबेल पुरस्कार प्राप्त महापुरूषों ने बयान जारी किया की विनायक सेन बेकसूर हैं । वे बेवजह हिंदू साम्प्रदायिकता और भगवाकरण की चक्की में पिस रहे हैं । जाहिर है कि उन नोबेल विज्ञानियों की कोयी संतान या रिश्तेदार दंतेवाड़ा में नहीं मारा गया था ।
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हम खत का मजमूं लिफाफा देख कर भांप लेते हैं । आसमान पर लिखी इबारत आसानी से पढ़ लेते हैं । हमें इल्हाम हो गया था कि विनायक सेन जमानत पर छूटेंगे । न्याय के देवता अपने भक्तों की सिंह गर्जना को आसानी से टाल नहीं सकते ।
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हम देवताओं पर उंगली उठाकर बुढ़ापे में बवाल मोल लेना नहीं चाहते । लेकिन एक सवाल हमारे दिमाग में कुलबुला रहा है । सवाल यह है कि विनायक सेन के सिलसिले में फैसला देते वक्त अहिंसा के अवतार महात्मा गांधी और दरिंदगी की जीती जागती मिसाल माओवादियों की विचारधारा को एक ही तराजू पर तौलने की क्या जरूरत आ पड़ी थी । गांधी जी के विचार पढ़कर हम गांधीवादी नहीं हो सकते लेकिन अच्छे इंसान तो बन ही सकते हैं । नक्सलियों का साहित्य पढ़ कर अच्छा भला इंसान हैवान बन सकता है ।
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गांधीवाद और नक्सलवाद के बीच छत्तीस का आंकड़ा है, ध्रूवी फासला है, तो दोनो को एक ही तराजू में तौलने की जरूरत क्यों पड़ गयी । क्या जजमेंट लिखते वक्त मिसालों का अकाल पड़ गया था ।
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फिर हमने अपने साम्प्रदायिक घुन से जर्जर दिमाग पर जोर दिया तो समझ में आया कि देश में गांधी का दमदमा आज भी गूंज रहा है । महात्मा गांधी से सोनिया गांधी तक यही नाम कांग्रेस के लिये तारणहार बन गया है । गांधी जी दो अक्टूबर को अपनी जयन्ती के दिन राजघाट पर कांग्रेस को हुकूमत करने का लाईसेंस रिन्यू करते हैं । उनकी प्रासंगिकता खत्म नहीं हो सकती ।
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हम इस मसले पर सोच ही रहे थे कि कांग्रेस के केबिनेट मंत्री सलमान खुर्शीद ने विनायक सेन की जमानत पर खुशी का इजहार कर दिया । तब हमें याद आया कि इस कांग्रेस का महात्मा गाँधी से कोयी रिश्ता नहीं है । यह सोनिया गांधी की कांग्रेस है ।
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हमें उम्मीद थी की कोयी गांधीवादी या गांधीटोपी वाला कांग्रेसी महात्मा गांधी के साहित्य और नक्सली साहित्य की तुलना पर एतराज जतायेगा, लेकिन हमारी उम्मीदें सुपुर्देखाक हो गयीं ।
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मीडिया से पता चला कि विनायक सेन बहुत बड़े समाजसेवी हैं , वे बालरोग विशेषज्ञ हैं, मुल्क के जाने माने डाक्टर हैं । हमें याद आया कि डाक्टरी पढ़ने के बाद इस पेशे से जुड़ने वाले एक शपथ लेते हैं । शपथ के दौरान वे कहते हैं कि अपने ज्ञान का सारा कौशल रोगियों की जान बचाने में समर्पित कर देंगे । हम ऐसे डॉक्टर की कल्पना भी नहीं कर सकते जो बेगुनाहों की जान लेने में आतंकवादियों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सहयोग करता हो ।
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लेकिन लोकतंत्र के अखड़े में सब कुछ जायज है । इसलिये हम विनायक सेन की जमानत का समर्थन करते हैं । लोकतंत्र का यह नाटक इसी तरह चलता रहा तो आने वले लगभग दस बरस में दिल्ली पर माओवादी हुकूमत कायम हो जायेगी । राहत की बात यह है कि हम तब तक दरिंदों की हुकूमत देखने के लिये जिंदा नहीं रहेंगे । जिन्दा रह गये तो भी कोई हर्ज नहीं है । हमें हजारों वर्ष की गुलामी सहने का अभ्यास हो गया है । पहले इस्लामी शहंशाह थे, फिर अंग्रेज बहादुर आये । अंग्रेज बहादुरों की जगह कांग्रेस बहादुरों ने दखल ले ली । अब माओवादी आयेंगे तो हमारा क्या बिगड़ जायेगा । कोऊ नृप होय, हमें का हानि । हम तो शायर का यह कलाम गुनगना कर खुश रहते हैं – महिफल उनकी, साकी उनका । आँखें अपनी, बाकी उनका ।
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हमें गांव की कहानी याद आयी । एक जाट और तेली में गहरी दोस्ती थी । तेली ने हंसी में कहा – जाट रे जाट, तेरे सिर पर खाट । जाट ने छूटते ही कहा – तेली रे तेली तेरे सिर पर कोल्हू । तेली ने आंखे नचा कर कहा – तेरे कहावत में तुक नहीं बैठी । जाट हंस पड़ा, कहा – तुक छोड़ वजन को देख । मैंने तेरे सिर पर ज्यादा वजन रख दिया ।
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सो, सहृदय पाठकों, सियासी बयान हो या अदालत का फैसला अहमियत वजन की होती है । तुक बैठने, न बैठने से कोयी फर्क नहीं पड़ता ।
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जग बौराना : अन्ना का आंदोलन
Posted by K M Mishra on अप्रैल 10, 2011
लेखक – श्री नरेश मिश्र

गांव की कहावत याद आ गयी “पंचों की राय सिर माथे, पनारा यहीं गिरेगा ।“ यूपीए गठबंधन सरकार के माथे पर यह कहावत सटीक चिपकती है । संकट आता है तो खेरात बांटना लाजमी हो जाता है । दिल्ली के जंतर मंतर पर अन्ना हजारे भ्रष्टाचार को जड़मूल से खोदकर उसमें मठा डालने के लिये अनशन पर बैठे तो कांग्रेस को खैरात लुटाने की याद आयी । शुरू के 24 घंटे में तो कांग्रेस के दोनो प्रलापी प्रवक्ता अभिषेक मनुसिंघवी और मनीष तिवारी प्रलाप करते रहे । उन्होंने मुल्क पर सौ जान से कुरबान अन्ना हजारे पर आरोप लगाने में भी लज्जा महसूस नहीं की । उनका प्रलाप सुनकर संस्कृत की कहावत याद आयी – एकां लज्जां परित्यज्य सर्वत्र विजयी भवेत् । राजनीति में शर्मो हया को छोड़ देने वाला हर मौके पर जीत हासिल करता है ।
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प्रवक्ताओं का प्रलाप बेअसर साबित हुआ । हजारे समर्थकों की भीड़ बढ़ती गयी तो कपिल सिब्बल और अंबिका सोनी ने मोर्चा संभाला और फरमाया – लोकतंत्र में संविधान के कायदे कानून से चुन कर आयी सरकार को इस तरह ब्लैकमेल नहीं किया जा सकता, अलबत्ता हर मुद्दे पर बातचीत की जा सकती है ।
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कांग्रेस के दोनो सिपहसालारों की बात पर गौर फरमाईये । जिस दिन वे देशवासियों को बता रहे थे कि जनप्रतिनिधि चुनाव जीत कर आते हैं, उसके 24 घंटे पहले त्रिकी बस स्टैण्ड पर एक बस से 5 करोड़ 17 लाख 27 हजार की करैंसी बरामद हुयी । यह पैसा डीएमके के उम्मीदवारों की जीत के लिये वोटरों में बांटा जाना था । मजहब और जाति की दुहाई दे कर, गरीबों में रंगीन टीवी बांटकर, आरक्षण का चुग्गा खिला कर, झूठे वायदे कर हमारे लोकतंत्र में उम्मीदवार कैसे चुनाव जीतते हैं, इस बारे में थोड़ा कहा, बहुत समझना ।
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लेकिन ऐसे उम्मीदवार बहुत वजनदार होते हैं । वे हत्या, लूट, बलात्कार, कालाबाजारी और ऐसे ही तमाम पाप कर्मों का कलंक चुनाव की गंगा में धोकर विधानसभाओं और संसद में दाखिल होते हैं । उनमें से कुछ की जबान बहुत लपलपाती है । कुछ सारे कार्यकाल के दौरान खामोश रह कर पार्टी के इशारे पर समर्थन में हाथ उठाते हैं, कुछ शोर मचाते हैं । ऐसे स्वनामधन्य जनप्रतिनिधियों का सम्मान करने की वकालत कपिल सिब्बल जैसे वकील ही कर सकते हैं । कहावत है – सांपों की लड़ाई में जीभों की लपालपी । इस लपालपी और शोरगुल से मुल्क का कुछ भी भला नहीं होता । बात टालनी हो तो बात करने में गांठ से क्या जाता है ।
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बहरकैफ, कठपुतली और पर्दे के पीछे से डोर खींच कर उन्हें नचाने वाली सोनिया गांधी को असम चुनाव जीतने की जल्दी थी । मनमोहन और सोनिया गांधी, अन्ना हजारे को भूखा प्यासा छोड़ कर चुनाव प्रचार करने चले गये । वैसे इन दोनो को अन्ना हजारे पिछले महीनों से चिट्ठी लिख कर भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त कदम उठाने की विनती कर रहे थे । दोनो ने अन्ना की चिट्ठी का जवाब देना तक जरूरी नहीं समझा । इससे साफ जाहिर है कि पीएमओ ऑफिस और यूपीए कनविनर का दफ्तर देश की कितनी परवाह करता है ।
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अन्ना हजारे अनशन पर बैठ गये और देश-विदेश से उन्हें समर्थन मिलने लगा तो सोनिया गांधी ने इस मुद्दे को विधानसभा चुनाव की तराजू में तौला । उन्हें लगा कि अन्ना के अनशन से चुनाव में कांग्रेस को घाटा उठाना पड़ सकता है ।मैडम सोनिया गांधी ने फौरन यू टर्न लेते हुये अन्ना हजारे को बेहद इमोशनल खत लिखा । खत में उन्होंने अपनी चालाकी के सारे रंग बिखेर दिये । आप उम्रदराज हैं, प्रसिद्ध गांधीवादी नेता है, देश के शुभचिंतक हैं । भ्रष्टाचार से देश को मुक्त करना कांग्रेस का संकल्प है । आप की जान कीमती है, अनशन छोड़िये और बातचीत की मेज पर आईये । हम आपके हर सुझाव पर संजीदगी से गौर करेंगे ।
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सोनिया जी के इस खत से हमें अकबर इलाहाबादी का एक शेर याद आता है -
कौम के गम में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ ।
रंज लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ ।
सोनिया गांधी को बहुत रंज है, वे बहुत संजीदा हैं लेकिन आराम के साथ संजीदा हैं । कांग्रेस में अब कोयी भूख बर्दाश्त नहीं कर सकता । सब भूखे हैं, ज्यादा से ज्यादा खाने को तैयार बैठे हैं । शीला दीक्षित ने कामनवैल्थ गेम के नाम पर करोड़ों खा लिया, फिर भी उनका पेट नहीं भरा । शुंगलू कमेटी की तीसरी रपट में जिक्र है कि शीला दीक्षित ने कैसे करोड़ों खाये हैं । कपिल सिब्बल तो आज भी मानते हैं कि 2 जी स्पैक्ट्रम में एक पैसे का नुकसान नहीं हुआ । कैग बकवास कर रही है की इसमें अरबों का घोटाला हुआ है । सुप्रीम कोर्ट न होती तो कपिल सिब्बल ए. राजा को एक सेकेण्ड के लिये भी जेल में न रहने देते । उनका वश चलता तो वे राजा को भारत रत्न बना देते ।
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अशोक च्वहाण ने बिलावजह सी.एम. की कुर्सी छोड़ दी । उन्होंने आदर्श हाउसिंग सोसाईटी में कोयी घोटाला नहीं किया था । अपनी सास और सालियों को लैट देना कोयी गुनाह नहीं है । वे सब ऐसे प्राणी हैं जिनका पुनर्वास सबसे ज्यादा जरूरी है ।
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हसनअली और उनकी धर्मपत्नी पर इंकमटैक्स के लगभग 80,000 करोड़ की देनदारी है । उस बेचारे के महाराष्ट्र के किसी कांग्रेसी मुख्यमंत्री से कोयी ताल्लुक नहीं थे । देवास इंट्रिक्स समझौते में कुछ भी गलत नहीं था फिर भी लगभग चार साल तक इस समझौते को फाईलों में दफन कर आखिरकार सरकार ने इसे क्यों रद्द कर दिया ।
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स्विस बैंकों में जमा देशवासियों का कालाधन पर्दानशीं महिला जैसा है । पर्दे में रहने दो, पर्दा न उठाओ । पर्दा उठाने से बेहुरमती का इल्जाम लगता है । कांग्रेस बेचारी क्या करे । वह घूस देकर सरकार बचाती है तो इसमें उसका क्या गुनाह है । गुनाह तो उन नाशुक्रों का है जो कांग्रेस को इत्मीनान से खाने कमाने नहीं देते हैं ।
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अब अन्ना हजारे भारी पड़ने लगे तो कांग्रेस के थिंकटैंक में उबाल आया । वे सोच नहीं पा रहे थे कि इस बुड्ढे को अनशन करके मर जाने दें या बीच का रास्ता निकाल कर बातों में उलझा कर मामले को कुछ दिन और खींच दें ।
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कांग्रेस को अभी देश की हरारत का पता नहीं है । वह ताकत के बल पर जनआंदोलन को दबाने के लिये कसमसा रही थी और इसका अंजाम सोच कर घबरा भी रही थी । इस आंदोलन से अतना तो साफ हो गया की जनता को अब किसी भी राजनीतिक दल की ईमानदारी पर भरोसा नहीं है । इस आंदोलन ने हमारे बनाना रिपब्लिक को चूल से हिला कर रख दिया है । अभी वक्त है, सियासी पार्टियों को होश में आना चाहिये । जंतर मंतर कहीं मिश्र का तहरीर चौक न बन जाये । कहीं संविधान पर देशवासियों का ईमान न डिग जाये । अन्ना हजारे तो सिर्फ एक प्रतीक हैं । व्यक्ति के जाने से विचार खत्म नहीं हो जाता । अब बहुत हो चुका, भ्रष्टाचार का बचाव करने में लफ्फाजी की हद पार करने वालों को यह आखिरी चुनौती है । अभी नहीं, तो कभी नहीं ।
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जग बौराना: लोकतंत्र की बकरमण्डी
Posted by K M Mishra on मार्च 22, 2011
लेखक: श्री नरेश मिश्र
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साधो, हमने एक खौफनाक सपना देखा । सपने में संसद को देखना अच्छा लगा । फिर बकरीद की बकरमण्डी नजर आयी । वहाँ बकरे ऊंचे दामों बिक रहे थे । कुछ बकरों को सजा संवार कर बढ़िया चारा देकर काफी तदुंरूस्त बनाया गया था । उनके दाम लाख का आंकड़ा छू रहे थे । ऑंख खुली तो हमारी अक्ल शीर्षासन करने लगी । बकरमण्डी का संसद से कोयी रिश्ता जोड़ना हमारे बूते की बात नहीं थी । फिर विकीलीक्स का खुलासा सामने आया । संसद का हंगामा बेहद दिलचस्प था । हमारी अक्ल के ऊसर में हरियाली नजर आयी । पहली बार लगा कि हॉं ! संसद और बकरमण्डी के बीच गहरा रिश्ता है । सांसद बकरे भी बिकते है, अलबत्ता उनका दाम करोड़ों में आंका जाता है ।
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अब भ्रष्टाचार और खरीद फरोख्त के जरिए संसद में बहुमत बनाये रखने और नोट-गड्डियों पर सरकार चलाने की चैम्पियनशिप पर गौर करें तो सारी दुनिया में इस ट्रॉफी पर कांग्रेस का मौरूसी कब्जा नजर आता है । नोट के बदले वोट, नोट के बदले बहुमत कायम करने की कला में कांग्रेस को महारत हासिल है । दुनिया का कोयी लोकतंत्र उसे चुनौती नहीं दे सकता । नरसिंहराव ने झारखण्ड के गुरूघंटाल को नोट के जरिए पटाया तो अर्थशास्त्री मनमोहन सिंह ने अपना कमाल दिखाया । सरकार तो दोनो बार बच गयी लोकतंत्र का सिर शर्म से झुक गया, यह दीगर बात है । राजनीति का एक फार्मूला बेहद कामयाब और जाना पहचाना है । आप शर्मोहया छोड़ दें तो कोई माई का लाल आपको हरा नहीं सकता ।
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विकीलीक्स के खुलासे की कुछ कहीकत चौंकाने वाली हैं । खरीद के वक्त राष्ट्रीय लोकदल के सांसदों का दाम प्रतिसांसद दस करोड़ लगाया गया लेकिन भाजपा के सांसदों में हर एक को सिर्फ तीन करोड़ दिये गये । सांसदों का दाम भी उनकी साख और चरित्र के मुताबिक लगया जाता है । कांग्रेसी खरीदारों को जिन सांसद बकरों पर यकीन था कि वे इस शर्मनाक लोकतंत्र की दहलीज पर कुर्बान हो जाने में कोयी गुरेज नहीं करेंगे उन्हें पूरे दाम दिये गये । भाजपाईयों पर यकीन नहीं था इसलिये उन्हें सिर्फ तीन करोड़ मिले । कांग्रेसी दलाल सौदेबाजी में माहिर हैं । वे जानते हैं कि कौन सा सौदा सिर चढ़ेगा और किसमें दग-दग हो सकती है ।
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सियासी दलालों का अंदाज गलत साबित नहीं हुआ । आखिरकार भाजपाई सांसदों ने लोकसभा के अंदर नोटों की गड्डियां लहरा कर बहुमत का स्वाद कसैला कर दिया लेकिन स्पीकर की कुर्सी पर कम्युनिस्ट नेता दादा सोमनाथ चटर्जी विराजमान थे । कम्युनिस्टों को जानने वाले बेहतर समझते हैं कि वे सियासी बेईमानी और गुण्डागर्दी में माहिर होते हैं (आने वाले पं0 बंगाल के चुनाव के लिये कम्युनिस्ट पार्टियॉं और उनके गुण्डे आजकल बंग्लादेश से स्मगल हुये हथियार बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं) । दादा ने नोटों की गड्डियों को दरकिनार कर दिया और वे यूपीए सरकार को बहुमत दिला कर माने । नोटों की गड्डियां लहराने वाले मायूस हो गये । मामले की जांच के लिये जेपीसी की रस्म निभाई गयी । इस बारात के दूल्हे जाने माने कांग्रेसी किशोर चंद देव थे । उन्होंने जांच को इस तरह घुमाया कि नोटों की गड्डी लहराने वालों का फटकार सहनी पड़ी । उन पर आरोप लगाया कि उन्हें रिश्वत दी गयी थी तो उन्होंने पुलिस या सीबीआई से इसकी शिकायत क्यों नहीं की । अब यह बताने की जरूरत नहीं कि पुलिस कांग्रेस की चाकर है और सीबीआई उसकी रखैल । रखैल और चाकरों के भरोसे कोयी अक्ल से खारिज सांसद ही रह सकता था ।
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देश की सर्वोच्च सम्प्रभू संस्था ने ही स्याह को सफेद कर दिखाया तो बेचारी पुलिस और सीबीआई की क्या औकात । बहरहाल, विकीलीक्स के खुलासे ने नोट की गड्डियां लहराने वाले भाजपाई सांसदों को क्लीनचिट दे दी । कम से कम वे गुनहगार नहीं थे । जो समाजवादी गुनाहगार थे वे आज भी कांग्रेस की ऑंखों के तारे बने हुये हैं । अमर सिंह तो अपने किये की सजा पा गये । कहते हैं भयंकर पाप की सजा मिलते देर नहीं लगती । दलाली की वार्ता चलाने वाले रेवती रमण सिंह सजा पाने वालों की कतार में हैं । उन्हें भी देर सवेर करनी का फल भुगतना ही पड़ेगा । मुलायम सिंह सजा भुगत रहे हैं । केन्द्र सरकार की नजरे इनायत से वे अभी तक आय के ज्ञात स्रोतों से ज्यादा सम्पत्ति इकट्ठी करने के मामले में बचते रहे हैं । बकरे की मॉं कितने दिन खैर मनायेगी । समाजवाद के नाम पर देश में माफियातंत्र चलाने वाले किसी दिन बेनकाब होंगे । लोकतंत्र के वोटरों के हाथ में ऊपर वाले की लाठी है, यह चलती है तो इसमें आवाज नहीं होती ।
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गरज यह कि विकीलीक्स के खुलासे पर सवालिया निशान लगा कर कांग्रेस बहुत दिन तक बेपरदा होने से बच नहीं सकती । एक प्रधानमंत्री ने देश की साख बचाने के लिये सोने की खेप गिरवी रखी थी, कांग्रेसियों ने तो देश की सम्प्रभुता को ही अमरिका के हाथ गिरवी रख दिया । चन्द्रशेखर सोने की खेप गिरवी रखने के लिये मजबूर थे, कांग्रेस के सामने कोयी मजबूरी नहीं थी । जिस पार्टी का बीज ही गुलामी के माहौल में बोया गया हो वह ताउम्र गुलाम रहने मे ही अपनी शान समझती है । विकीलीक्स खुलासे का अमरीकी सरकार ने भी खण्डन नहीं किया । उसका कहना है कि ऐसे गोपनीय सरकारी दस्तावेजों के राज खुलने से अमरीका की छवि धूमिल हुयी है । अब इतना तो जाहिर हो गया कि हमारे महान लोकतंत्रात्मक गणराज्य की नकेल अमरीका के हाथ है । यूपीए सरकार की हालत देखकर तरस खाने के सिवाय और कुछ नहीं किया जा सकता ।
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वैलेंटाइन डे स्पेशल
Posted by K M Mishra on फ़रवरी 14, 2011
आदरणीया ममता जी,
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सादर प्रणाम, आगे समाचार यह है कि ‘देखिये बुरा मत मानियेगा’ कंबख्त वैलेंटाइन डे साला फिर आ गया । पिछले साल आपने जो हड़काया था मुझे खूब याद है । पर एक साल के अन्दर मुझे आपके अन्दर काफी बदलाव नजर आया है । आपने पिछले छः महीने से मुझे देखकर मुंह बिचकाना बन्द कर दिया है, हालांकि मामला अभी भी टेंस है पर वैलेंटाइन डे का मौका फिर आया है तो चूकना नहीं चाहिये । देखिये खत के साथ मैं एक लाल गुलाब भी भेज रहा हूं और साथ में एक राखी भी है । दोनो कीमती है, कृपया नाली में मत फेंकियेगा । अगर आपको मैं यानी जगदीश प्रसाद उपाध्याय ‘जग्गू जी’ में जरा भी इन्टरेस्ट है तो वह लाल गुलाब आप पुलाव में डाल कर खा जाइये । मैं समझूंगा कि मेरा प्यार हजम हो गया । नहीं तो फिर आप उस राखी का ही प्रयोग करें । बदले मे मैं आपको एक साल तक एक भाई का स्नेह दूंगा पर सिर्फ अगले वैलेंटाइन डे तक ।
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एक दया मुझपर और करियेगा, यह खत अपने भाई दारासिंह को मत दिखलाइयेगा । नहीं तो वो मेरी 206 हड्डियों को 412 में तबदील कर देगा । आपके पिता जी का प्रेम तो मैं पिछले साल ही देख चुका हूं । मेरी नाक की हड्डी अभी भी वैसी ही है जैसी पिछले साल थी । तुम्हें पहलवानों के खानदान में जनम नहीं लेना चाहिये था । आपसे करबद्ध हो कर सविनय निवेदन करता हूं कि ममता जी मुझ पर ममता दिखाइये । सिर्फ दिल तोड़ने तक ही सीमित रहियेगा । मेरे हाथ पांव पर तरस खाइयेगा । बीमा वाले बदमाश भी ऐसी किसी टूट फूट का बीमा नहीं करते हैं।
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आपकी राह देखता ‘भाई लेकर मत आना’
जगदीश प्रसाद उपाध्याय उर्फ ‘जग्गू जी’
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मित्रों, यह एक नमूना प्रेमपत्र है जो कि मैंने इंटरमिडियेट में लिखा था, किसी रूपसी को देने के लिये नहीं, ऐसे ही हास्य में हाथ मांजने के लिये । यह पत्र मेरे एक मित्र को इतना पसंद आया कि उसने इसे इंजीनियरिंग कॉलेज के नोटिस बोर्ड पर चस्पा कर दिया था । फिर उसके बाद इस छोटे से पत्र से प्रेरणा लेकर बहुत से प्रेमपत्र रचे गये और कॉलेज में बहुत से टाईट जींस पहन कर यामाहा आर एक्स 100 और पिता जी की यज़डी चलाने वाले पृथ्वीराज चौहान बनने पर उतारू जझारू युवाओं ने प्रेमपथ में निरीह याचक भिक्षुक के रूप में अपनी अपनी भावी प्रेयसियों को प्राप्त किया । एक तरह से यह अजमाया हुआ प्रेमपत्र है । 100 परसेंट गारंटी के साथ, जिसमें कम से कम पिटने का खतरा है । लेकिन लेखक, यानी की मैं खुद कभी हसीनाओं पर पक्का यकीन नहीं करता था । इसलिये कभी भी इस प्रकार का इकबालिया बयान लिख कर उस नासमझ को देना अपनी गर्दन खुद कातिल को सुपुर्द करने के बराबर मानता था, सो बंदा एक सुरक्षित दूरी पर रह कर ही प्रेम कर लिया करता था । वही वन साईडेड प्रेम । इस प्रेम में प्रेम की रूहानियत और पवित्रता दोनों बनी रहती है क्योंकि अपवित्र होने के लिये इसमें कुछ खास नहीं होता ।
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उन दिनों तो यह वैलेंटाईन डे वगैरह का भी कोयी झमेला नहीं होता था । भाई प्रेमियों को एक दिन की मौत क्यों देते हो । वह तो फुल टाईम प्रेमी हुआ करते हैं । सातों दिन, चौबीस में अड़तालिस घंटे और साल के 730 दिन (रात और दिन दोनों काउंट करो भाई जी प्रेम का मीटर बहुत तेज भागता है । रातें साली दिन से भी लंबी, गर्म आहों के गुबारों से लबालब । इतनी गरमागरम आहें कि जाड़े की रात में हीटर जलाने की जरूरत नहीं, कमरे में साली वैसे ही लू चलती रहे)। तो भईया ऐसी होती है प्रेम अगन । यकीन नहीं आता तो हरिशंकर परसाई जी का व्यंग उपन्यास ‘रानी नागफनी की कहानी’ पढ़ कर देख लो । प्रेमिका की विरह अग्नि इतनी विकट हुआ करती थी एक जमाने में कि कहीं आग न लग जाये इसलिये दो-दो सखियों की ड्यूटी होती थी उस पर पानी का छिड़काव करने की । और पानी पड़ने पर भी “छन्न” की आवाज होती थी । है किसी में इतनी हिम्मत, आज के जमाने में ऐसा थर्मामीटर फाड़ू प्रेम करने की ।
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एक बात बताईये कि क्या हमारा प्रेम वैलेन्टाईन डे का मोहताज है जो इकरारे मुहब्बत करने के लिये सिर्फ यही दिन और अगर चूक गये तो तब फिर अगले साल तक इंतजार करना पड़ेगा । इंसान न हुआ बेचारा कुकुर हो गया जो एक कातिक बीता तो अगले कातिक का इंतजार करे । भाई आप मानव हो । ब्रह्मा का बनाया फूल टू, आल टाईम लवर । कभी भी, किसी भी वक्त हमेशा प्यार करने को तैयार । क्या जब तक आपको बाजार नहीं बतायेगा कि बाबू 14 फरवरी आ गया है अपने-अपने नाड़े कस कर तैयार हो जाओ तब तक आप प्रेम करने से महरूम थे । क्या सन 1991 के पहले आपने वैलान्टाईन डे का नाम सुना था या उसके पहले भारत में प्रेम नहीं किया जाता था । श्रृंगार रस पर इतना ढेर सारा साहित्य अगर विदेशी मीडिया न बताता तो भारत में लिखा ही न जाता । राधा-कृष्ण खड़े रहते गऊओं के पास वैलेन्टाईन डे के इंतजार में । सोनी महिवाल, मस्तानी-बाजीराव, लैला-मजनूं, हीर-रांझा तो पड़े पड़े सूख ही जाते इस वैलान्टाईन डे के इंतजार में ।
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मित्रों, पहले तो प्रेम की परिभाषा ही बड़ी विकट है । जिसे बाजार प्रेम के नाम पर बांट रहा है वह मात्र इनफेचुएशन है । यह भौतिक प्रेमोन्मांद कितनी अनवांटेड-72 की गोलियां बिकवायेगा, कितने गर्भपात करवायेगा, कितनी बिन ब्याही मॉं अगले 14 नवंबर (बाल दिवस) को बनवायेगा, कितनी लड़कियां वैलेन्टाईन डे के नाम पर यौन हिंसा की शिकार होंगी और कितनी अपने प्रेमियों के द्वारा बलात्कृत होंगी जो सिर्फ यह सोच कर जिस्मानी संबन्ध बनायेंगे कि हसीना की ना मे भी उसकी हां होती है और हजारों नये एम.एम.एस. मोबाईलों की शान बढ़ायेंगे, इसका सिर्फ आप अंदाजा ही लगा सकते हैं । प्रेम जो कि एक सतत धीमी प्रक्रिया है जिसे सिर्फ एहसास किया जा सकता है वह 14 फरवरी के दिन एक हिंसक रूप अख्तयार करता नजर आता है कि बेटा इसी बस पर चढ़ जाओ पता नहीं अगली फिर कब मिलेगी । मित्रों, यह प्रेम नहीं है । यह आप भी बखूबी समझते हो प्यारे, पर क्या कीजियेगा । जे.जे. प्यारी ने एक घुड़दौड़ शुरू करवादी और हममें से बहुत से लोग टाईम पास के लिये इस घुड़दौड़ में शामिल हो गये, सिर्फ जेजे का दिल रखने के लिये, वरना जे.जे. बेचारी बुरा मान जाती कि बताओ कैसा जमाना आ गया है एक अघोषित पुरूस्कार के लिये भी दस लोग नहीं जुट रहे हैं । जबकि इस बीच कांग्रेस की काली गंगा में कितना घोटालों का काला रूपया बह गया हमें पता ही नहीं चला । मिस्र वालों ने हुस्नी मुबारक को बाइज्जत विदा कर दिया लेकिन जेजे को खुश करना भी जरूरी है न ।
Love You JJ
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पैर उनका, कुल्हाड़ी उनकी
Posted by K M Mishra on जनवरी 25, 2011
लेखक: श्री नरेश मिश्र
हमारे परम आत्मीय, जाने माने पत्रकार ने दिल्ली से फोन किया । फोन पर उनकी बात सुन कर हमें काठ मार गया । वे कह रहे थे, ‘कांग्रेस ने अपने पैर पर कलमाड़ी मार लिया ।’ उनकी बात सुन कर हमें जिंदगी में पहली बार कांग्रेस पर तरस आया । वे पत्रकार चटखारे लेकर एक लतीफा सुनाने लगे – आज की ब्रेकिंग न्यूज । वी. एच. पी. के आशोक सिंघल ने बयान जारी कर कहा है कि वे अयोध्या में रामजन्मभूमि पर एक भव्य मस्जिद बनाने को तैयार हैं । देश के सारे हिंदू-मुस्लिम भाई इस पुनीत कार्य में सहयोग करेंगे । शर्त यह है कि मस्जिद बनाने का ठीका सिर्फ और सिर्फ कलमाड़ी को दिया जाये । यह शर्त मंजूर नहीं है तो सिंहल सुप्रीमकोर्ट में विवादित जमीन के दावे पर अड़े रहेंगे ।
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यह बयान सुन कर कांग्रेस को यकीनन असीमानन्द होना चाहिये । वैसे कांग्रेस को असीमानन्द तो पहले ही हो चुका है । यह असीमानन्द हासिल करने का दूसरा मौका बिल्ली के भाग्य से छींका टूटने जैसा है । बूढ़ा सन्यासी हाथ लगा है । उसके कंधे बहुत मजबूत हैं । वह अपने कंधों पर समझौता ब्लास्ट, अजमेर ब्लास्ट, मालेगांव ब्लास्ट और मक्का मस्जिद ब्लास्ट का बोझ बड़े आराम से ढो सकता है । सरकार का जी इतना बोझ डालने से न भरे तो वह शीतला घाट धमाके का बोझ भी इस सन्यासी के कंधों पर डाल सकती है । मुर्दे पर चाहे चार मन मिट्टी डालो या दस मन । उसे कोई फर्क नहीं पड़ता ।
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असीमानन्द की यह अवस्था कांग्रेस को ब्रह्मानन्द तक पहुंचा सकती है । पड़ोसी परसने वाला हो और रात अंधेरी हो तो खाने वालो को मजा आता है । सी बी आई, ए टी एस, और एन आई ए परस रही है । कांग्रेस सरकार दोनों हाथों से खा रही है । संस्कृत के सुभाषितकारों ने कहा है – वुभुक्क्षितः किं द्धिकरेण भुंक्ते ! भूखा क्या दोनों हाथों से खाता है । लेकिन कांग्रेस सत्ता की भूखी है । उसे दोनों हाथों से खाने में कोयी परहेज नहीं है ।
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असीमानन्द का कसूर माफी के काबिल नहीं था । चालाक ईसाई जंगली इलाके में जाल बिछाये बैठे हैं । वे हिंदू मछलियों का शिकार कर रहे हैं । कांग्रेस चाहती है कि इन शिकारियों के काम में कोयी आड़े न आये । आड़े आने वाला सरकारी कानूनों का शिकार हो जायेगा । बात सिर्फ इतनी है । इसे बढ़ा चढ़ा कर अफसाना बनाने की जरूरत नहीं । ईसाई हिंदुओं को जाल में फंसायेंगे, कट्टर दहशतगर्द मुस्लिम ईसाईयों को अपना निशाना बनायेंगे । बेचारा हिंदू इन दो बेहद खुंखार लड़ाकों के बीच फंस कर बेगुनाह मर जायेगा । उसका गुनाह इतना है कि उसने अपने पैर पर खुद ही कांग्रेस की कुल्हाड़ी मार ली है ।
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देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त
























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा . 




