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Archive for the ‘राजनैतिक विसंगतियों’ Category

कारगिल युद्ध भाग : 1 (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on July 25, 2009

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कारगिल युद्ध भाग : 1

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मेरे दरवाजे़ पर इंटरपोल पुलिस (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on July 21, 2009

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मेरे दरवाजे़ पर इंटरपोल पुलिस

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मदहोश करने का पक्का सरकारी इंतज़ाम (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on July 17, 2009

=>हिक्क! मदहोशी का डबल तड़का । सुरा और सुंदरी दोनो साथ- साथ । आखिर प्रशासन ने हमारी भी सुध ले ही ली । ठीक सामने पुलिस की चेतक रात दिन पहरा देती रहती है ताकि कोई नासपीटा हमारे आनन्द में बाधा न पहुंचाये । शाबाश ! पहली बार अच्छा इंतजाम किया है सरकार ने हम बेवड़ों के लिए । हिक्क!
->ये है इलाहाबाद का प्रतिष्ठित गल्र्स इंटर कालेज ”सेण्ट एंथोनी गल्र्स इंटरमिडियट कालेज“ और उससे मात्र पचास मीटर की दूरी पर शासनादेश और माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेशों की खिल्ली उड़ाती अभी हाल ही में शुरू हुयी ये ठेका देशी शराब की दुकान । जल्दी ही मिड डे मील की जगह सरकारी देशी शराब के ठेके ले लेंगे और सरकार की शिक्षा नीति भी बदल कर “खूब पियो, खूब पढो” हो जायेगी ।

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सत्यवादी जरदारी (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on July 10, 2009

=> ये नासपीटे दोजख के कीड़े, इनको हमने भारत को काटने के लिए पाला था, ये अब हमीं को काट खाने लगे हैं । अब इनका इलाज अमेरीकी गोलियां और बम हैं । मरो सालों ।

                

           

 पिछली रात पता नहीं कौन सी रूहानी मजबूरी पेश आई कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति ने हमेशा कि तरह एक बोतल स्काच की जगह दो बोतल स्काच खाली कर दी । शायद उनको मरहूम बेगम बेनज़ीर की याद हद से ज्यादा सता रही थी जबकि इस्लामाबाद के राष्ट्रपति भवन में उनको अमेरिकी राष्ट्रपति वाली सारी सुविधायें मुहैया कराई गयी हैं । यानी कि वो जब चाहे बिल क्लिटंन की तरह सिगार भी पी सकते हैं और पिला भी सकते हैं और पाक सेना भी यही चाहती है कि राष्ट्रपति जरदारी सारी सुविधाओं को भोगें और उसी में मशगूल भी रहें लेकिन बेकायदे आजम जिन्ना साहब के उसूलों के खिलाफ हरगिज़ न जायें । बेकायदे आजम जिन्ना साहब ने ख्वाब देखा था एक इस्लामिक राष्ट्र का जहां फिजाओं में सिर्फ इस्लाम ही इस्लाम तारी हो यानी की सड़कों पर लाशें, एक दूसरे का खून बहाते शिया और सुन्नी, एक अदद मानवाधिकार के लिए रिरियाते भूखे-नंगे बच्चे और औरतें, अपने ही देशवासियों से जूझती पाक सेना ……. और पता नहीं क्या, क्या ।

 जरदारी साहब सवेरे उठे तो उनको रात ख्वाब में चीखती, चिल्लाती मरहूम बेगम बेनजीर की याद आयी । बेनजीर चीख चीख कर उनको आदेश दे रही थीं कि मेरा हत्यारों को कब सजा दोगे । जरदारी साहब बेनजीर की चीख से अब भी उतना ही डरते हैं जितना कि पहले डरा करते थे । सवेरे उठे तो सिर भारी भारी हो रहा था । किसी तरह उठ कर गुसलखाने में जाकर फारिग़ हुए । सवेरे की नमाज़ अदा की और सिर झटकते हुऐ, आहिस्ता आहिस्ता चल कर अपने दीवान-खाने में पहुंचे और सोफे पर ढ़ेर हो गये ।

 तभी पता नहीं किस कोने से एक पत्रकार नाम का प्राणी निकल कर उनके सामने आ गया । जरदारी साहब ने आंखे मिचमिचा कर उसको देखने की कोशिश की । हाथ में कागज और कलम देखी तो समझ गये कि ये कम्बख्त अखबारनवीस की कौम से है । सवेरा हुआ नहीं कि मुंह उठाये चले आये । पूछा, क्या चाहते हो ।

 घिसे हुए पत्रकार ने देश के अंदरूनी हालात पर सवाल दाग दिया ।

 रात की स्काच अभी तक सिर पर दुगुन में तीन ताल बजा रही थी, ऊपर में मरहूम बेगम बेनजीर की भटकती आत्मा की चीखें । जरदारी साहब का ऊपरी माला कुछ देर के लिए सिफर हो गया । उस वक्त तक कामचोर सलाहकार भी सो कर नहीं उठे थे जो रात में हमप्याला बने आगे पीछे घूम रहे थे । राष्ट्रपति को कोई कूटनीतिक जवाब नहीं सूझा और सचाई ज़बान पर आ गयी । ये सब साले आतंकी, हमारे ही पैदा किये हुए हैं । इन सांपों को कल तक हमने इस लिए दूध पिलाया था कि ये जा कर भारत को डसेंगे । दुनिया भर में इस्लाम का नारा बुलंद करेंगे । ये दोजख के कीड़े, हरामी हमीं को काटने लगे । हमारी फौज फिनिट का डिब्बा लेकर इनको साफ करने में लगी है । कीड़े पड़ेंगे, कीड़े इन नासपीटों को, जिन्होंने मेरी बेगम को मुझसे जुदा कर दिया । दिल का दर्द ज़बान पर तो आया ही आया ही आंखों से भी छलकने लगा ।

 राष्ट्रपति की आंखे नम देख कर वो अखबारनवीस वहां से पोलो ले लिया । लेकिन देरी से कमरे में घुसने वाले राष्ट्रपति के सलाहकार ने जब राष्ट्रपति के मुंह से ये सचाई भरा बयान सुना तो सिर पीट लिया और सोचने लगा कि अब जनरल को इसका क्या मतलब समझायेंगे, क्योंकि कल तक तो भारत से भी कूटनीतिक दबाव पड़ना शुरू हो जायेगा ।

 

 

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सांप को दूध पिलाने वाले (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on June 26, 2009

Cobra_strikes

Angry_cow =>मेरे बच्चों,   अब मैं तुमको और दूध नहीं पिला सकता । केन्द्र सरकार की बुरी नज़र अब मेरे तबेले पर भी पड़ने लगी है ।


जैसे ही केन्द्र सरकार ने भाकपा (माओवादी) पार्टी को आतंकवादी संगठनों की सूची में डाला वैसे ही वामदलों को मिर्गी के दौरे आने लगे ।
नक्सली आंदोलन आज से 40 साल पहले वामदलों की बदौलत परवान चढा था । आज भारत के आधा दर्जन से ज्यादा राज्यों में नक्सलिस्ट कहर बरपा रहे हैं । पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आई. एस. आई. भी इनको अपना सगा सम्बन्धी मानकर मदद करती रहती है । जितना नुकसान भारत का पाकिस्तान अपनी आतंकी गतिविधियों से नहीं कर रहा है उससे ज्यादा जान-माल की क्षति भारत को नक्सली पहुंचा रहे हैं । इन सांपों को पाला और दूध पिलाया वामदल ने पश्चिम बंगाल में । नक्सली आंदोलन की वजह गरीबी, असंतुलित विकास और मदमस्त, नवाबी, कठोर, अड़ियल, बेपरवाह प्रशासन था, लेकिन पिछले 40 सालों से पश्चिम बंगाल (जहां कि इस आंदोलन ने जन्म लिया) में तो वामदलों का ही शासन है । यानी की नक्सली आंदोलन की मुख्य वजह तो यही महानुभाव थे और वो वजहें आज 40 साल बाद भी अगर जिंदा हैं तो सिर्फ इसलिए क्योंकि उस रोग का इन्होंने कोई इलाज नहीं किया बल्कि फुंसी को कैंसर बन कर पड़ोसी राज्यों में भी फैलने दिया ।

वामदल और नक्सलियों का खतरनाक गठजोड़ बहुत पुराना है । पश्चिम बंगाल में पिछले 40 साल से जिन कमुनिस्टों का राज चल रहा है उसकी दो ही बैसाखियां है ।  नं0 1 नक्सली, नं0 दो बंग्लादेशी घुसपैठिये । इन दोनों की मदद से ये 40 साल से राज्य में शासन करते चले आ रहे हैं ।  नक्सली गुंडों की बदौलत ये बूथ कैप्चर करवाते है और फर्जी बंग्लादेशी नागरिकों को वोटर बना कर वोट पड़वाते हैं । अपनी सरकार बनी रहे यही मुख्य मुद्दा है बाकी भारत देश और लोकतंत्र तो इनकी निगाह में दो कौड़ी की भी हैसियत नहीं रखते ।

भारत के महान वामदल । दस हज़ार साल से निरंतर चली आने वाली विश्व की एकमात्र सभ्यता, संस्कृति जिसे दुनिया एक प्रकाशपुंज के रूप देखती है, उस महान देश के महान इतिहास, संस्कृति से इनका कोई लेना देना नही है,  सब कूड़ा कर्कट है इनकी समझ से । विचारक भी इनको इस देश में नहीं मिले, मजबूरीवश आयात करने पड़े । कार्ल माक्र्स, लेनिन, माओ । राष्ट्र और राष्ट्रवादिता दोनों ही इनके लिए ढकोसला है । राम और कृष्ण इनके लिए किताबी कहानी से ज्यादा और कुछ भी नहीं । धर्म अफीम की पुड़िया है । अगर इतने ही बड़े सेकुलरवादी हो तो बंगाल में दुर्गा पूजा बंद करवा दो और बेलूर मठ को आग में झोंक दो । सुभाषचंद्र बोस को कुत्ता कहने वाले और देश के बंटवारे के लिए जिन्ना का समर्थन करने वाले ये मीर जाफ़र और जगत सेठ की जायज़ संताने हैं । एक पाकिस्तान बना चुके हैं, दूसरे के लिए नक्सली आंदोलन को पाल पोस रहे हैं । चीन से इनको आर्थिक और वैचारिक दोनो ही खुराकें मिलती  हैं ।

जैसे ही केन्द्र ने माओवादी (भाकपा) को आतंकवादी संगठन घोषित किया वामदलों ने एक नई बहस को परवान चढाना शुरू कर दिया कि आतंकवाद की परिभाषा क्या होती है ? ये वो लोग हैं जो कि अलगाववादी संगठनों को प्रश्रय और संरक्षण देते हैं और फर्जी राजनीति करते हैं । इनमें और कश्मीरी अलगाववादियों  में बाल बराबर भी अंतर नहीं । अब बेचारे बडे़ धर्म संकट में पड़े हुय हैं । जिन नक्सली गुंडों कीं की मदद से चुनाव जीतते रहे अब उन्हीं पर प्रतिबंध लगाने के लिए केन्द्र सरकार दबाव डाल रही है । अब क्या करें ? माओवादी कोई चीनी का खिलौना तो नहीं कि जब तक चाहा उससे खेला और जब चाहा मुंह में डाल कर गुडुप कर लिया । इनकी दशा देखकर मित्रों अवधी की एक कहावत याद आती है जो कि इनपर एकदम सटीक बैठती है  ”पूतौ मीठ, भतारौ मीठ,  के कर किरिया खाऊं ।”

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मुक्केबाज राहुल गांधी (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 28, 2009

राहुल गांधी ने चुनाव के पहले 2 महीने तक द्रोणाचार्य पुरूस्कार विजेता मुक्केबाजी कोच श्री ओम प्रकाश भरद्वाज से मुक्केबाजी का विधिवत प्रशिक्षण लिया था अपने आप को चुस्त दुरूस्त रखने के लिए और आत्मरक्षा की कला सीखने के लिए ।

– हें ! जे बात थी । तभी मैं सोचूं कि हम जैसे खुर्राट अखाड़ेबाजों को कोई कैसे दिन में तारे दिखा सकता है । जाय छोरो ने तो मोको एकइ पंच में धूल चटाये दियो । – मुलायम सिंह यादव ।

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