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Archive for the ‘चुनाव’ Category

मुक्केबाज राहुल गांधी (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 28, 2009

राहुल गांधी ने चुनाव के पहले 2 महीने तक द्रोणाचार्य पुरूस्कार विजेता मुक्केबाजी कोच श्री ओम प्रकाश भरद्वाज से मुक्केबाजी का विधिवत प्रशिक्षण लिया था अपने आप को चुस्त दुरूस्त रखने के लिए और आत्मरक्षा की कला सीखने के लिए ।

– हें ! जे बात थी । तभी मैं सोचूं कि हम जैसे खुर्राट अखाड़ेबाजों को कोई कैसे दिन में तारे दिखा सकता है । जाय छोरो ने तो मोको एकइ पंच में धूल चटाये दियो । – मुलायम सिंह यादव ।

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रामपुर की बसंती (जयाप्रदा) (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 16, 2009

=>नाच मेरी बुलबुल तुझे पैसा मिलेगा, ऐसा कदरदान तुझे कहां मिलेगा ।

=>मैं इतना ज़ोर से नाची आज, की घुंघरू टूट गये ।

=>जरा नचनिया के हाथ पांव तो देखो ।  बहुत करारे है साले ।  इ रामपुर की कौने चक्की का पिसा आटा खाती है ।

(चुनाव के दौरान रामपुर में जयाप्रदा के अश्लील पोस्टर लगाये गये थे और उनकी अश्लील सी.डी. बांटी गई थी । अमर सिंह का आरोप है कि ये शुभ काम आज़म खां के दिशा निर्देशन में किया गया था ।)

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दे दाता के नाम…….. (हास्य/व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 15, 2009

=>भाइसाहब! ये आपस में लड़ क्यू रहे है

Confused_man

=>ये लड़ नहीं रहे हैं, सरकार बनाने के लिए पसीना बहा रहे हैं ।


जिसका डर था वही होने जा रहा है । पंद्रहवीं लोकसभा में किसी भी पार्टी को जनता ने बहुमत का आशीर्वाद नहीं दिया । अखिर काहे को दें आशीर्वाद । जब ससुरों तुम ही लोग एक नहीं हो, तो जनमत भी काहे को एक हो । कनफ्यूज़ कर के रख दिये हो । कौन किसका दोस्त है, कौन किसका दुश्मन है, कुछ भी पक्का नहीं है । जो साले एक महीने पहले तक जिस पार्टी को सपोर्ट कर रहे थे, एक महीने बाद उसी पार्टी के खिलाफ उम्मीदवार खड़े कर रखे हैं और पत्रकारों के सामने अगले को बल भर के ले, दे करते फिर रहे हैं । पब्लिक का रहा सहा दिमाग दही कर के रख दिया । यार एक-एक, दो-दो महीने की शार्ट टर्म यारी दोस्ती पर चुनाव लड़ोगे, तो इतनी भी अपने यहाँ की जनता जनार्दन की जनरल नॉलेज अच्छी नहीं होती ।

न्यूक्लियर डील के चलते वामदल ने यूपीए से सपोर्ट खींचा तो मुलायम सिंह नये तारणहार बन कर अवतरित हुए । कांग्रेस और सपा  में  फिर एक नई डील हुई । सरकार बचाने के लिए काइंड में नहीं कैश में बात फिक्स हुई । अमर सिंह भला कहां चूकने वाले थे । सांसदों की खरीद फरोख्त में संसद में गड्डियाँ लहराई गईं । रेवती रमण सिंह की जय जयकार हुई । देश ने राजनीति में नैतिक प्रपात का नया कीर्तिमान देखा ।  दो लाख करोड़ की न्यूक्लियर डील के लिए कांग्रेस ऐसी दसियों सरकार कुर्बान कर सकती थी । देश की सम्प्रभुता सिर्फ संविधान की प्रस्तावना में ही लिखी अच्छी लगती है । सौदा करने के लिए इस बार यही सही । अभी इसी सप्ताह वाशिंगटन से बयान आया है कि भारत को हम सी.टी.बी.टी. की तरफ ले जा रहे हैं । भारत को सी.टी.बी.टी. की तरफ धकेलने के लिए न्यूक्लियर डील पहला कदम था ।

मित्रों, सरकार क्या है ? सरकार है पांच साल तक भारत देश, भारतवासियों और भारत के अमूल्य संसाधन को लूटने, खसोटने, विदेशी सरकारों से दलाली खाने, देशी-विदेशी मल्टीनेशनल्स को मनमाना कारोबार करने की अनुमति देकर बदले में मिले अपने हिस्से को विदेशी बैकों में जमा करने, अपने दुश्मनों के खिलाफ पुलिस, जांच एजेंसियों और न्यायपालिका को ब्रह्मास्त्र की तरह इस्तेमाल करने, अपने भाई-भतीजों, साले-सालियों, बहन-बहनोइयों को सरकार में जगह देना, ऊंची नौरियाँ देना, सरकारी कान्टै्रक्ट दिलाना, अपने चाटुकारों को पद्म श्री, पद्म भूषण बांटना इत्यादि । सरकार मतलब कुबेर का खजाना । जिसको लूटने के लिए दस लाख हाथ भी कम पड़ते हैं । इस कारू के खजाने को लूटने के लिए डाकूओं का एक प्रजातांत्रिक गिरोह बनाना पड़ता है, जिसे चुनाव आयोग किसी राजनेतिक पार्टी के नाम से पंजीकृत कर देता है । आज स्थिति ये है कि  किसी एक गिरोह को बहुमत नहीं मिलने जा रहा है, इसलिए बड़े दस्यु गिरोह छोटे-छोटे  दस्यु  गिरोहों  को फुसलाने में लगे हैं ।

लालू, मुलायम और पासवान ने यूपी और बिहार में और वामदल ने पश्चिम बंगाल और केरल में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था । मतगणना अभी शुरू भी नहीं हुई और ये लोग एक दूसरे की मदद से सरकार बनाने  के सपने भी देखने लगे । जनता ने इन्हें इमानदारी से वोट दिया और ये दुगनी इमानदारी से जनादेश के साथ सामूहिक बलात्कार करने की तैयारी में लगे हुए हैं । इनकी तैयारियाँ को देखते हुए लगता है कि इस बार विपक्ष में कोई नहीं बैठेगा । सभी सरकार बनाना चाहते हैं, इसलिए सब एक दूसरे को समर्थन दे कर सरकार    में शामिल हो जायेगें ।

साम्प्रदायिक गठबंधन एन.डी.ए. को सत्ता से दूर रखने के लिए सभी तथाकथित सेकुलर दल कांग्रेस के नेतृत्व में एक हो जाते हैं । मुस्लिम वोट बैंक को बरगलाने लिए साम्प्रदायिकता का कार्ड खेला जाता है, लेकिन अफसोस देश पर पचास साल शासन करने वाली कांग्रेस पार्टी ने मुस्लिमों के विकास के लिए कुछ भी नहीं किया । सच्चर कमेटी की रिपोर्ट गवाह है कि आज मुसलमानों का सबसे ऊंचा जीवन स्तर नरेन्द्र मोदी के राज्य गुजरात में है और सबसे तंगहाली में मुसलमान पश्चिम बंगाल में जी रहे हैं, जहाँ उन्हें मूर्ख बनाकर कम्युनिस्ट पार्टी उनका इस्तेमाल सिर्फ एक वोट बैंक के रूप में करती है ।

चुनाव के पहले तीसरा और चौथा मोर्चा प्रकाश में आया था । अभी मतगणना शुरू भी नहीं हुई और वो नमक के ढेले के समान गल कर यूपीए या एनडीए में समाने को बेकरार है । चुनाव लड़ा कांग्रेस के खिलाफ । जनता ने उन्हें वोट दिये कांग्रेस के खिलाफ लेकिन अंत में साम्प्रदायिकता के खिलाफ उनका कांग्रेसीकरण हो गया । आज स्थिति ये है कि सुबह तक जिनको गरियाते फिर रहे थे शाम को फोन कर के कहते हैं ‘कहा-सुना माफ करियेगा’ ।   16 मई की शाम से सभी एक स्वर में गायेंगे   ‘दे दाता के नाम, तुझको अल्ला रखे’ । सभी भिखारी है और राजा बनने के सपने देख रहे हैं । जनता जनार्दन तो मुगलों और अंग्रेजों के जमाने में भी भिखारी थी और आजादी के 6 दशक बाद भी भिखारी है । हम भिखारियों को कोई एक वोटर से ज्यादा मानने को तैयार नहीं है । बकौल अलोक पुराणिक ‘फ्यूज़ बल्ब और यूज्ड़ वोटर किसी काम के नहीं होते । दोनों से जल्दी   छुटकारा   पाने में ही समझदारी है ।

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मनमोहन सिंह की वफादारी (व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 13, 2009

”सिख समाज 84 के दंगों को भूल जाए । इस मामले का पटाक्षेप हो चुका है ।                                                                                              – प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ।

=> ठीक ही कह रहे हैं मनमोहन सिंह जी आप, पर उपदेश कुशल बहुतेरे । चुनाव के वक्त कांग्रेस मुस्लिम संवेदनाओं को उभाड़ने के लिए गुजरात दंगों की माला जपने लगती है लेकिन 84 के दंगों के प्रतापी कांग्रेसी वीर जगदीश टाइटलर और सज्जन सिंह को निर्दोष साबित करने के लिएं सी.बी.आई. उन्हें क्लीनचिट दे देती है । सिख हो कर भी आप सिख समुदाय का दर्द नहीं समझ पा रहे हैं । सच्चा कांग्रेसी बनने के लिए क्या इस हद तक संवेदनहीन होना पड़ता है ।

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वादा तेरा वादा (हास्य/व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 7, 2009

– नरेश मिश्र

साधो, कोटेदारों और कालाबाजारियों के लिए एक खुशखबरी, जल्दी ही उन्हें तीन रूपये किलो गेहूँ और चावल खरीद कर ग्राहकों से उसका मनमानी दाम वसूलने का मौका मिलेगा । कांग्रेस का मैनीफेस्टो कालाबाजारियों की उम्मीद बढाने वाला है । उन्हें मालामाल होने का मौका जरूर मिलेगा ।

कांग्रेस ने वादा किया है कि वह चुनाव जीतने के बाद देश के जरूरतमंदों को तीन रूपये किलो गेंहू और तीन रूपये किलो चावल मुहैया करायेगी । यह गेहूँ और चावल कहां से आयेगा? कांग्रेस के पास तो गेहूं, धान बोने    काबिल जमीन है नहीं । देश के खेतों में जो गेहूं, चावल पैदा होता है, उसे खरीदने के लिए सरकार को वाजिब कीमत देने में दुश्वारी महसूस होती है ।

मुल्क में इन दिनों सड़कें और कारखाने बड़े पैमाने पर बन रहे हैं । सड़कों और कारखानों को खाया नहीं जा सकता । अपने प्रदेश में ही गंगा एक्सप्रेस वे बन रहा है । इस सड़क पर बसपा की गाड़ी हाई स्पीड से दौड़ेगी । आम पब्लिक को कोई खास फायदा नहीं होगा । गाजियाबाद से बलिया को जोड़ने के लिए सड़क आज भी मौजूद है । लेकिन इस सड़क के निमार्ण में जिन पार्टियों को मोटी कमाई हुई है, उसमे बसपा शामिल नहीं है । बसपा को अपनी कमाई सुनिश्चित करने का जरिया चाहिए । केरल से कश्मीर और असम से गुजरात तक पार्टी प्रत्याशियों को चुनाव लड़ाने में काफी पैसा खर्च होता है । सड़क नहीं बनेगी तो पैसा कहां से आयेगा । पैसा नहीं आयेगा तो चुनाव के रास्ते मुल्क पर कब्जा कैसे किया जायेगा ।

साधो, ये पब्लिक है, सब जानती है । बदलाव की बात कौन करेगा । सिर्फ चंद बूढे नेता और रिटायर्ड आला नौकरशाह अंत समय में किताब लिख कर लोकतंत्र की बखिया उधेड़ते हैं । लेकिन वे किताबों में इस बात का जिक्र भूल कर भी नहीं करते कि जब उनके हाथ में सत्ता थी, तब उन्होंने बगावत का बिगुल क्यों नहीं फूंका ।

कबीरदास ने ठीक ही कहा है – ”करता था सो क्यों किया अब करि क्यों पछताय, बोया पेड़ बबूल का तो आम कहां से खाय ।” अपने लोकतंत्र में बबूल बोने की परम्परा बेरोकटोक चल रही है और जनता को आम खिलाने का वादा भी कायम है । मराठा छत्रप शरद पवार विदेशों से गेहूं, चावल खरीद कर लायेंगे और चुनावी वादा पूरा करेंगे ।

अर्थशास्त्रियों को यकीन है कि अगर केन्द्र सरकार सचमुच अपने वायदे के मुताबिक चुनाव जीतने पर सस्ता गेहूं और चावल जनता को मुहैया करायेगी तो खजाना खाली हो जायेगा । इस खजाने को लबालब भरने का नुस्खा भी उद्योगपतियों ने सरकार को सुझाया है । नासिक के प्रेस में करारे नोट छापें और बाजार में जारी कर दें । यह सौ दुखों का एक रामबाण इलाज है । सरकार अपने लोगों के लिए नोट नहीं छापेगी तो भी पाकिस्तान हमारे लिए नोट छापने से बाज नहीं आयेगा । पाकिस्तान में छपे नोट अपने मुल्क के बाजारों में धड़ल्ले से चल रहे हैं । इन नोटों ने बैंक के खजानों में भी अच्छी घुसपैठ बना ली है । यही हाल रहा तो पाकिस्तान में छपे नोट चलन में आ जायेंगे और अपने रिजर्व बैंक के गवर्नर साहब के दस्तखत वाले नोट बाजार से बाहर हो जायेंगे ।

मुल्क की इस हालत पर पर खुद देशवासियों को शर्म महसूस नहीं होती है । हम खुद शर्मिंदा नहीं है तो गैर मुल्कों को क्या पड़ी है कि वे हमारे लिए शर्मिंदा हों । हम तो ऑस्कर पा कर निहाल हैं, नेता वोट पाकर मालामाल हैं, नौकरशाह घूस खाकर संतुष्टि की डकार ले रहा है । सिर्फ इस मुल्क का आम आदमी बदहाल है । इस बदहाली पर टेसुए बहाने की जरूरत कतई नहीं है । हम तो ‘जय हो’ की धुन पर थिरकने से ही निहाल हो जाते हैं । मुल्क का क्या है, वह तो मनमोहन के मजबूत हाथों में महफूज है ।

=> ‘जय हो’

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मालिक की ससुराल का सवाल है । (कार्टून)

Posted by K M Mishra on May 3, 2009

=>किसी भले आदमी (क्वात्रोची) को परेशान करना अच्छा नहीं है । जबकि पूरी दुनिया कहती है कि उसके खिलाफ कोई मामला नहीं है । – मनमोहन सिंह ।

=>बिल्कुल आज इनके मालिक राजीव गांधी जिंदा होते तो क्या वो अपने इटैलियन साले (क्वात्रोची) का ख्याल न रखते । मालिक न सही, मालकिन तो हैं । पता नहीं अगली सरकार कांग्रेस की बने न बने । चलते-चलते मायके वालों का भी कल्याण करते चलें ।   इसलिए सी. बी. आई. ने क्वात्रोची के खिलाफ रेड कार्नर नोटिस वापस ले ली,  विपक्ष भले ही बोफोर्स दलाली के तमाम सबूत गिनाता रहे । दूसरे करें तो भ्रष्टाचार, हम करें तो सदाचार ।

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