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Archive for the ‘कुरीतियों’ Category

मदहोश करने का पक्का सरकारी इंतज़ाम (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on July 17, 2009

=>हिक्क! मदहोशी का डबल तड़का । सुरा और सुंदरी दोनो साथ- साथ । आखिर प्रशासन ने हमारी भी सुध ले ही ली । ठीक सामने पुलिस की चेतक रात दिन पहरा देती रहती है ताकि कोई नासपीटा हमारे आनन्द में बाधा न पहुंचाये । शाबाश ! पहली बार अच्छा इंतजाम किया है सरकार ने हम बेवड़ों के लिए । हिक्क!
->ये है इलाहाबाद का प्रतिष्ठित गल्र्स इंटर कालेज ”सेण्ट एंथोनी गल्र्स इंटरमिडियट कालेज“ और उससे मात्र पचास मीटर की दूरी पर शासनादेश और माननीय उच्च न्यायालय इलाहाबाद के आदेशों की खिल्ली उड़ाती अभी हाल ही में शुरू हुयी ये ठेका देशी शराब की दुकान । जल्दी ही मिड डे मील की जगह सरकारी देशी शराब के ठेके ले लेंगे और सरकार की शिक्षा नीति भी बदल कर “खूब पियो, खूब पढो” हो जायेगी ।

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रोज़गार के नये अवसर – 1 (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on July 15, 2009


वित्त मंत्री प्रणव दा ने इस बजट में एक करोड़ बीस लाख नये रोज़गार पैदा करने की बात कही है । कारपोरेट सेक्टर कहता है कि ये सारे रोज़गार नरेगा या आंगनबाड़ी जैसी योजनाओं के लिए है और ग्रामीण क्षेत्रों में मात्र 100 दिन के ही रोज़गार की गारंटी देते हैं । शहरी और शिक्षित युवकों के लिए बजट में कोई प्रावधान नहीं है जबकि आज देश में 20 करोड़ रोज़गार की जरूरत है । तो दोस्तों वित्त मंत्री ने तो बजट संसद में रख कर अपने हाथ झाड़ लिये । अब आप जानो, आपका काम जाने । कांग्रेस तो युवाओं का वोट लेकर पांच साल के लिए तगड़ा रोज़गार पा गयी ।

युवा मित्रों, ये तो आप जानते ही हो कि अपना हाथ, जगन्नाथ । माफ कीजिएगा टाईम पास की बात नहीं कर रहा हूं बल्कि आपको स्वरोज़गार के नये क्षेत्र बता रहा हूं । हालांकि ये स्वरोज़गार के क्षेत्र नये नहीं हैं लेकिन इनमें नोट कूटने की अपार संभावनाएं हैं और साथ ही ये समाजसेवा से भी जुड़े हुए हैं । स्वरोज़गार के अपने मजे हैं । कोई ससुरा बॉस नहीं होता । जब मन किया काम किया जब मन किया तब बाल-बच्चों को (अगर ये कष्ट आपके ऊपर नहीं पड़ा है) तो बाजूवाली भाभीजी को, पड़ोसी की लड़की को, अपनी हसीन सेक्रेटरी को स्कूटर की पिछली सीट पर बैठाया और सिनेमा देखने या इडली-डोसा के बाद आइसक्रीम खाने निकल गये । जिंदगी का मजा तो इसी में है । जब मन किया काम किया जब मन किया तफरी कर डाली । न किसी के बाप से लेना, न किसी के बाप को देना यानी न लेना एक, न देना दो ।

तो दोस्तों मैंने इस बढ़ती हुयी बेरोज़गारी पर गंभीरता से विचार किया और इस कारण मुझे एक झपकी भी आयी (दिमाग पर लोड डालते ही थोड़ी देर के लिए दिमाग की एम.सी.वी ट्रिप कर जाती है) । काफी देर तक विचारने (झपकने) के बाद ये लाखों का आइडिया दिमाग में लपलपाया । हींग लगे न फिटकरी, रंग भी चोखा वाला आइडिया था । ढेर सारे नये स्वरोज़गार के क्षेत्र हैं जिनपर सरकार की नजर नहीं पड़ी है हालांकि सरकार बहुत कुछ इन्हीं तरीकों और सिद्वांतों पर चला करती हैं । इस श्रंखला के अन्तर्गत मैं आपको इन्हीं तरीकों की जानकारी दूंगा । इसमें बहुत ज्यादा इन्वेस्टमेन्ट की जरूरत नहीं है, हां, अपने स्किल डेवलप करना जरूरी है । आप इनको प्रोफेशन का दर्जा दे सकते हैं जैसे डाक्टर, वकील, सी.ए. वगैरह होते हैं । अगर आप गौर से देखेंगे तो हर प्रोफेशनल आदमी मूल रूप से इन्हीं सिध्दांतों की मदद लेता है । चलिए अब ज्यादा आपकी दिमाग का दही नहीं करूंगा और शुरूआत करते हैं इस श्रंखला की पहली कड़ी की ।

रोज़गार नं0 एक – हाईटेक तांत्रिक या ज्योतिषाचार्य बनिये ।

मित्रों, मुंह न बनाओ । कुन्टलों संभावनाएं हैं इस क्षेत्र में और बोरा भर कर नोट भी हैं । घर बैठे आमदनी । पैर छूने वालों की भीड़ । कैश और काइंड में इंकम । बलभर यश । अफसर और नेता चरणों में लोटन कबूतर । बाबा बन कर ठाठ से गद्दी पर विराजो । समाजसेवा की समाजसेवा और खूबसूरत औरतों से संपर्क बढ़ाने के मौके । मैं कहता हूं क्या कमी है इस धंधे में । पैसा ही पैसा और ग्लैमर के साथ नाम भी । कोई आई.ए.एस या किसी मल्टीनेशनल का सी.ई.ओ क्या खा कर तुम्हारी बराबरी करेगा । चलो अब धंधे की बारीकियां भी समझा दूं और ट्रेनिंग कैसे लेनी है वो भी बता दूं । ध्यान से सुनना । हास्य, व्यंग्य समझ कर हंसी में मत उड़ा देना । जीवन बदल जायेगा ।

पहले तो अख़बार पढना सीखो । काहे कि ये सारे चऊचक धंधेबाज रोज अखबारों के वर्गीकृत पन्ने पर छपते हैं और इनकी कोई जांच भी नहीं होती । विज्ञापन इस तरह का होता है – विवाह में अड़चन, प्रेमविवाह, मोहनी वशीकरण, यंत्र हाथ पर रगड़िये प्रेमी-प्रेमिका भाग आयेंगे, धनवान बनें, व्यापार, विदेश यात्रा, नौकरी, लॉटरी, सौतन, गृहक्लेश, तलाक, अदालत, शिक्षा, संतान न होना, आदि एक यंत्र सौ काम । मिलिए पहाड़ वाले बाबा से । पुराने डॉट के पुल के बगल में, मसाले वाली गली, मिंया की सरांय, अलीगढ ।

इस तरह के विज्ञापन रोज अख़बार में छपते हैं । जाइये पहले वो विज्ञापन पढ़ कर आइये फिर धंधे की बात बताता हूं ।

जारी…………

=>पुत्र तुम्हारे हाथ में कालसर्प योग स्पष्टरूप से दिखाई पड़ रहा है । राहु-केतु ने तुम्हारा जीवन नर्क बना रखा है ।

=>हां महाराज, आप सही कहते हैं । मेरी पत्नी और मेरी सास ही मेरे लिए साक्षात राहु-केतु का अवतार हैं । इनसे मेरे प्राणों की रक्षा का कोई उपाय बतायें ।

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समलैंगिकता से देशसेवा (हास्य/व्यंग्य)

Posted by K M Mishra on July 4, 2009

=>मां का लड़ला बिगड़ गया ।

साधो, अब हम मंज़िले-मक़सूद पर जल्दी ही पहुंच जायेंगे। बस दो-चार कदम का फासला बाकी है, उसे तय करने में चंद दिन बाकी रह गये हैं । हलब्बी जनादेश हासिल कर सरकार ने सौ दिन के विकास का प्रोग्राम बनाया है । इस एजेंडे पर अमल करते ही  अरहर की दाल तो 80 रू0 किलो हो गई और रजामंदी से बनाये गये समलैंगिक रिश्तों को अदालत ने हरी झंडी दे दी ।

अब कौन मुल्क हमसे आंखे मिलाकर कह सकता है कि हम डेवलप्ड कंट्री नहीं हैं । पश्चिम की ओर थोबड़ा करके हम उस जानिब की खिड़की खोलते हैं तो ताजी हवा, चमकदार रोशनी और पुर सुकून पर्यावरण मिलता है । पश्चिम की खिड़की नहीं खुले तो दम घोंटू माहौल में तबीयत घबराने लगती है और पिछड़ेपन की कालिख धोने के लिए कोई माकूल साबुन नहीं मिलता है ।

सो, पश्चिम के विकसित मुल्कों ने समलैंगिक रिश्तों को कानूनी जामा पहले ही पहना दिया था । हम कुछ कदम पिछड़ गये थे, अब अदालत के आदेश से समलैंगिकता का गलाफाड़ समर्थन करने वाली संस्थाएं उछल कूद मचा रही हैं । मानवाधिकार समर्थकों का कलेजा बल्लियों उछल रहा है । केन्द्रीय केबिनेट के मंत्री भी मुस्कुरा रहे हैं । उन्होंने भानुमति के पिटारे से निकाल कर एक चूहा उछाल दिया । मीडिया को बैठे बिठाये बढ़िया मुद्दा  हाथ लग गया । वे कई दिनों तक इस अदालती आदेश के गन्ने को जोर-शोर से पीसेंगे और इसकी खोई से एक-एक बूंद निचोड़े बिना चैन से नहीं बैठेंगे ।

साधो, सवाल यह है कि अदालत के इस फैसले में नया क्या है । रजामंदी से बनाये गये किसी भी रिश्ते पर पुलिस की दखल का दायरा बहुत सिकुड़ा होता है । अदालत ने बड़ी दूर तक सोच कर ये फैसला दिया है । देश की बढ़ती हुयी आबादी को रोकने के लिए अब समलैंगिकता को कानूनी जामा पहना देना चाहिए । सरकार को संसद में  बिल लाकर दस साल के लिए समलैंगिकता को सभी नागरिकों के लिए बाध्यकारी बना देना चाहिए, इससे देश की बढती हुयी जनसंख्या पर रोक लगेगी, नागरिकों को देशसेवा का एक मौका मिलेगा और देश दस साल के भीतर विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायेगा ।

रजामंदी से बनाये गये समलैंगिक रिश्तों का इतिहास आधुनिक युग की देन तो नहीं है । आदिम जमाने से आदमजाद यह हरकत करता आया है । धर्मों ने इसे नैतिकता के दायरे से बाहर कर दिया लेकिन पोप, पण्डित, मुल्ला, मौलवी और रब्बीयों की पाबंदी में ज्यादा दम नहीं था । वे खुद भी सेक्स के इस रंगोबू का मजा लेने से नहीं चूकते थे । धर्म का समलैंगिकता के खिलाफ फतवा भी कायम रहेगा और समलैंगिकता भी वजूद में रहेगी । दोनो के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता । हमें हर कीमत पर विकसित राष्ट्रों की बराबरी करना है । समलैंगिकता को कानूनी छूट देकर हमने इसी दिशा में एक ठोस कदम उठाया है । अब धर्म धुरंधरों के धमाकेदार बयानों से आसमान नहीं फट पड़ेगा ।

साधो, हमारी जवानी के दिनों में अंताक्षरी की प्रतियोगिता में शामिल होने वाले मुकाबला इस कविता से शुरू करते थे–समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम । अब समय बिताने के लिए राजनैतिक, विधिक, सामाजिक दायरे में कुछ तो करना ही पड़ेगा । पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ गये । मंहगाई सुरसा के मुंह से प्रेरणा ले रही है । मंदी की मार ने कमर तोड़ दी है । बेरोजगारी माउंट एवरेस्ट पर झंडा लहरा रही है । भारी जनादेश हासिल करने वाली सरकार इन बीमारियों का कोई कारगर इलाज नहीं तलाश सकती । उसे वोटरों का ध्यान किसी ऐसे मुद्दे की ओर आकर्षित करना है जिससे देशवासी कुछ दिनों के लिए तो भूख और बेरोजगारी को भुला कर इस बहस में उलझ जायें । समलैंगिकता से बढ़िया कारगर मुद्दा कुछ और हो नहीं सकता ।  विकसित दुनिया सेक्स के पीछे दीवानी है । वियेग्रा का इजाद हो चुका है । 80 वर्ष की उम्र वालों को भी जापानी और मद्रासी तेल 16 बरस की उम्र का जायका दिलाने का दावा करते हैं । समलैंगिकता की बहस से सेक्स की एक और तंग गली अब नेशनल हाइवे बन जायेगी ।

साधो, अब तो मान लो कि हम विकसित राष्ट्रों से एक कदम भी पीछे नहीं है । न मानो तो माला और सुमिरनी फेरो । हमारे बाप का क्या जाता है ।

– नरेश मिश्र

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रिश्वतखोरी चालू है । (हास्य,व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on April 23, 2009

                                                                            – नरेश मिश्र

 साधो, चुनाव का मौसम है । इस मौसम में सियासी पार्टियों से जो चाहो मांग लो । ऐसा मौका पांच साल में सिर्फ एक बार आता है । इस महापर्व पर नेताओं के चरण चूमने वाला वोटर उनसे चरण धुलवाता है। भक्त और भगवान की कुर्सी बदल का यह खेल बेहद दिलचस्प होता है ।

 

अब कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में गरीबों को तीन रूपये किलो गेहूं और महिलाओं को नौकरियों में तीस फीसदी आरक्षण देने का लालीपाप दिखाया है । संसद ओर विधान सभाओं में महिलाओं को तैंतीस फीसदी आरक्षण देने का वायदा बासी हो गया । वह इस हद तक बुस गया है कि अब कुत्ते भी उसे सूंघ कर भाग खड़े होते हैं ।

 

कांग्रेस ने इस संसदीय चुनाव में महिलाओं को कितने फीसदी टिकट दिये हैं, यह सवाल  पूछना गुस्ताखी होगी । कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने व्यवस्थापिका में महिलाओं को वाजिब आरक्षण क्यों नहीं दिया, इस सवाल को उठाना वाजिब नहीं है । सभी पार्टियां जानती हैं कि चुनाव में महिलाएं बाहुबलियों और माफियाओं से पार नहीं पा सकतीं । चुनाव में टिकट देने का सिर्फ एक मकसद चुनाव जीतना होता है । चुनाव जीतने के बाद संसद और विधान सभाओं में दाखिल माफिया और बाहुबली जिस तरह हंगामा खेज माहौल बनाते हैं, उसके लिए महिलाएं माफिक साबित नहीं होतीं ।

 

फिलहाल नौकरी मे महिलाओं को तीस फीसदी आरक्षण देने का चारा मुफीद है । उम्मीद है कि इस चारे में चिड़िया फंस जायेगी और कांग्रेस की पौ बारह हो जायेगी ।

 

वैसे भी रिश्वतखोरी अपने लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ और सबसे मान्य सिध्दांत है । चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद भी सियासी पार्टियां रिश्वत का चारा फेंक ही सकती हैं । इसके लिए उन पर कोई रोक नहीं लगायी जा सकती । यह बात दीगर है कि तीन रूपये किलो गेहूं कोटेदार काले बाजार में बेंच देंगे और गरीब के हाथ सिर्फ कांग्रेस का हाथ ही आयेगा । महिलाओं के तीस फीसदी आरक्षण का विधेयक भी ठंडे गोदाम में चला जायेगा । महिलाओं में आरक्षण की मांग      उठना तय है । सर्व सम्मति का ब्रेक इस्तेमाल कर इस विधेयक की गाड़ी को आसानी से रोका जा सकता है और पटरी से उतरा जा सकता है ।

 

रिश्वखोरी हमारे देश का सर्वमान्य धर्म है । यही एक मात्र ऐसा धर्म है जिसका पालन देशवासी बड़ी निष्ठा से करते हैं । गरीब, मजदूर, किसान, लेखपाल से लगाकर कलक्टर, कमिश्नर, सांसद, विधायक और मंत्री तक इस धर्म के पालन पर एकमत हैं । वे अपने धर्मों को लेकर आपस में चाहे जितना सिर फुटौवल करें, लेकिन रिश्वत धर्म निभाने में सभी एकमत हैं ।

 

हमारे देश की एकता और अखण्डता का सबसे बड़ा सबूत है रिश्वतखोरी । कश्मीर से कन्याकुमारी और असम से गुजरात तक हमें रिश्वतखोरी के मजबूत धागे ने ही एकमत होने पर विवश किया है । पुराने जमाने के ऋ़षियों ने कहा था कि सोने के ढक्कन से सत्य के कलश का मुंह ढक दिया गया है । इसका मतलब है कि पुराने जमाने में भी सचाई पर रिश्वत का जोर चलता था । अगर वह इक्कीसवीं सदी में भी चल रहा है तो हमें सियापा क्यों करना चाहिए ।

 

साधो, जैसे बकरे को हलाल करने से पहले उसे खिला-पिलाकर मोटा किया जाता है । वैसे ही चुनाव के वक्त रिश्वत का चारा खिलाकर वोटर बकरे को मोटा किया जाता है । कटना तो बकरे की किस्मत में लिखा है, इसलिए उसे ज़ायकेदार चारा खाने से परहेज नहीं करना चाहिए ।

 

 

=>महिलाओं के लिए नौकरी में तीस फीसदी आरक्षण, हुंह ! सोनिया गांधी, शीला दीक्षित और अंबिका सोनी । कांग्रेस ने इन तीनों को तीस फीसदी आरक्षण तो पहले से ही दे रखा है, दूसरी तमाम महिलाओं को आरक्षण की क्या जरूरत है ।

 

 

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बच के रहना रे बाबा । (हास्य-व्यंग्य)

Posted by K M Mishra on April 12, 2009

                                                            – नरेश मिश्र

 

साधो, एक बहुत पुरानी तुकबंदी पेशेखिदमत है । मुलाहजा फरमाओ –

 

कहा- हम चीन जायेंगे ।

कहा- तुम चीन को जाओ मगर जापान का डर है ।

कहा- जापान तो होगा ।

कहा- हम ऊंट पर चढ लें ।

कहा- तुम ऊंट पर चढ लो मगर कोहान का डर होगा ।

कहा- कोहान तो होगा ।

 

शायर की इसी तर्ज पर हमने तुकबंदी कुछ इस तरह से मिलायी है –

 

कहा- संसद चले जायें ।

कहा- संसद चले जाओ मगर आतंक का डर है ।

कहा- आतंक तो होगा ।

 

साधो, ताजा तरीन खबर ये है कि चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों पर दहशतगर्द हमले का खतरा मंडरा रहा है । यह खतरा सेकुलर उम्मदीवारों पर कम भाजपाइयों पर ज्यादा है । इस आशंका के जरिए कम से कम यह खुलासा तो हो गया कि दहशतगर्द किसे अपना भाई मानते हैं और किसे दुश्मन समझते हैं । कौन राष्ट्रवादी है और कौन कट्टर मजहबी ताकतों के सामने झुकने को तैयार है ।

 

खबर मिली है कि लगभग बीस फिदायीन सांप तो रेंग कर हमारे मुल्क के अंदर दाखिल हो गये हैं । इनमें सात नागिने हैं । हमें नागिनों के जहर से डर नहीं लगता । शायर ने फरमाया था कि मौत भी इसलिए गवारा है कि मौत आता नहीं, आती है । हम जइफी के दिनों में भी मादानस्ल पर फिदा होने को तैयार हैं । मौत का एक दिन मुकर्रर है, नींद क्यूं रात भर नहीं आती । हमारी मौत अगर किसी मादा फिदायीन के हाथों हुई तो खुद को हम धन्य समझेंगे । बड़े-बड़े राक्षसों को देवियों ने मार गिराया था और उन्हें मुक्ति मिल गई थी । हमारी मौत हुई तो सरकारी खाते में वह मय शहादत के बतौर दर्ज  नहीं होगी । इस मुल्क में आतंकवाद के शिकार निहत्थे नागरिकों को शहीद नहीं, दया का पात्र समझा जाता है । उनकी मौत अगर साबित हो जाये तो वारिसान को कुछ न कुद मुआवजा मिल जाता है । मरने वाला वजनदार हुआ तो पेट्रोल पम्प, जमीन का टुकड़ा या उत्तराधिकारी को नौकरी भी मिल सकती है । दहशतगर्द हमलावरों को सिर्फ निंदा या कठोर चेतावनी मिलती है । दहशतगर्द इस निंदा या चेतावनी पर हंसते हैं और कहते हैं माईफुट

 

अब लोकतंत्र की यह रवायत बुस गई है । इसमें फंफूद लग गई है । लेकिन हमारी सरकार को इसकी बदबू विचलित नहीं करती है ।

 

तो भाजपा नेताओं और प्रत्याशियों की गर्दन पर तलवार लटकी है, उन्हें सुरक्षित करने का प्रयास तो सरकार को करना ही चाहिए । लोकतंत्र के इस तकाजे की अनसुनी करने वाली सरकार को कोर्ट फटकार भी लगा सकती है ।

 

अब सरकार को हमारा सुझाव मानना चाहिए । सभी भाजपा प्रत्याशियों को एक मुश्त कैद करके जेल में बंद कर दीजिए । न वे बाहर निकलेंगे, न उनकी जान को खतरा होगा । वरूण गांधी के साथ यही प्रयोग हुआ है । और यह सफल भी रहा है । जेल में रह कर भाजपा प्रत्याशी अपनी बात वीडियो कांफ्रेसिंग से कह सकते हैं । हर जेल में एक स्टूडियो बनाना चाहिए । हांलाकि किराये का श्रोता बन कर भी कोई फिदाईन जेल में दाखिल हो सकता है । यह रास्ता फूल प्रूफ तो नहीं, लेकिन अपेक्षाकृत सुरक्षित है । वैसे मौत को कोई रोक नहीं सकता है । मलिकुल मौत की डिग्री होती है तो कोई अपील दलील काम नहीं करती है ।

 

इन दिनों राहुल बाबा बड़े जोश में हैं । आडवाणी जी से पूछते हैं संसद पर आतंकवादी हमला हुआ तो   क्या किया । इंण्डियन एयर लाइंस विमान को कंधार ले  जाया गया तो क्या किया । राहुल बाबा अभी बच्चे हैं । नादानी में अपने चचरे भाई वरूण की तरह बेसुरे हो जाते हैं । इन्हें कौन समझाये कि आडवणी जी ने अपने शासन काल में कुछ नहीं किया तो जनता ने दण्ड स्वरूप उन्हें कुर्सी से बेदखल कर दिया । अब आपकी बारी है । आप बताएं कि आपकी पार्टी को भी कुर्सी से बेदखल क्यूं न कर दिया जाये । मुर्दे के सिर से जितनी बार कफन हटाइएगा उतनी बार रूलाई आयेगी । इस रूलाई के दौरान आपके घड़ियाली आंसू तो थम जायेंगे लेकिन मुर्दे की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ेगा ।

 

बहर कैफ, हमने फैसला कर लिया है कि हम ही सेकुलर ढोंग रचाएंगे । इस मुल्क में अपनी जान बचाने और जनता की आंखों में धूल झोंकने का इससे उम्दा तरीक और कुछ नहीं हो सकता है ।

 

 


=>माई बाप! क्यों हमारे फंडामेन्टल राइट को लात मार रहे हैं । हफ्ते भर के लिए बाहर जाने दें । चुनाव सिर पर है । धंधे का टाइम आ पहुंचा है । बाल बच्चों के लिए हम भी दो रोटी का जुगाड़ कर लें ।

 

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एक नगाड़ा ना मढै सौ चूहे की चाम (हास्य,व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on April 10, 2009

नरेश मिश्र

 

साधो, लोकतंत्र का नगाड़ा इस कदर बेरहमी से बजाया जाता है कि हर पांचवे साल उसका चमड़ा बदलने की जरूरत पड़ती है । कभी-कभी तो पांच साल से पहले ही उसे बदलना मजबूरी हो जाता है । लोकतंत्र की भाषा में इसे मध्यावधि चुनाव कहते हैं । नगाड़ा बजाने वाले इस कदर बेदर्द, नाशुक्रे, चालबाज और मौका परस्त होते हैं कि उन्हें सरकारी खजाने पर रहम नहीं आता । उन्हें अच्छी तरह मालूम है कि इस नगाड़े का चमड़ा बदलने में कई अरब रूपयों का खर्च आता है ।

 

बहर कैफ, संविधान में चमड़ा बदलने का उल्लेख है । उसके मुताबिक पंद्रहवीं लोकसभा के दौरान नगाड़े का चमड़ा बदलने की तैयारी चल रही है।

 

अब सियासत के जंगल में शेरों का तो सफाया हो गया । हिरन, बारहसिंघे और जंगली भैंसे भी कहीं   नजर  नहीं आते । पण्डित नेहरू से अटल बिहारी युग तक सियासत के जंगल में गाहे-बगाहे शेर दिख जाते थे । कुछ मौका परस्त रंगे सियार भी इस दौरान लोकतंत्र के जंगल के राजा बन बैठे । देवगौड़ा जैसे कुछ   सियारों   की बन  आयी । लेकिन कांग्रेस का यह खेल ज्यादा दिन नहीं चल  पाया । चन्द्रशेखर और चरण सिंह जानते थे कि उनकी सरकार अकाल मृत्यु का ग्रास बनेगी फिर भी उन्हें राजनीति की मायानगरी से दूर  रहने की   प्रेरणा नहीं मिली । शातिर सियासतबाज वी. पी. सिंह ने तो अपनी भोली भाली चितवन और भूदानी छवि से जनता की आंखों में ऐसी धूल झोंकी कि आज तक वह दीदे मल-मल कर बार-बार अपना सिर धुन रही है ।

 

साधो, अब पन्द्रहवीं लोकसभा के दौरान नगाड़े का चमड़ा बदलने की प्रक्रिया चल रही है तो सियासत के जंगल में ऐसे कद्दावर जानवर की तलाश जारी है, जिसका चमड़ा इस्तेमाल किया जा सके । यह तलाश यकीनन नाकाम रहेगी । सियासत के जंगल में अब कद्दावर जानवर तो गायब हो गये हैं । सिर्फ चूहे बच रहे हैं जो अपनी बिल से बिल-बिलाकर बड़ी तादाद में ताल ठोंकते हुए बाहर निकल आये हैं । उनका दावा है कि वे गुट बना कर अपनी चमड़ी का दान करेंगे । इस चमड़ी को सिल कर लोकतंत्र के विशाल नगाड़े को मढने में कोई दिक्कत पेश नहीं आयेगी ।

 

चूहों के गठबन्धन का जायजा लेना दिलचस्प होगा । बिहार और यूपी में लालू, पासवान, मुलायम कोआपरेटिव लिमिटेड हैं । तमिलनाडु में जया, चन्द्रबाबू नायडू, वाइको और माक्र्सवादियों की छोटी सी थैली है । यह थेली बड़े ज़ोर से खनखना रही है । इसकी आवाज सुनकार काहवत याद आती है कि थोथा चना बाजे घना । महाराष्ट्र का हाल बेहाल है । छत्रपति शिवाजी की विरासत पर दलाल काबिज होना चाहते हैं । झारखण्ड में दल बदलू सियासत के गुरूजी है । इनका दावा है कि ये ढाई चावल की ऐसी खिचड़ी पकायेंगे, जिससे देश का पेट भर जायेगा । बिहार के सबसे चालाक चूहे का नाम रामविलास पासवान है । इनका दावा है कि सियासत की कौड़ी चाहे चित पड़े या पट, बाजी तो इन्ही के हाथ रहेगी । सियासत का ऐसा कामयाब जुआड़ी इससे पहले देश में पैदा नहीं हुआ ।

 

यूपी में मायावती बहन जी हैं । इन्होंने सारे देश में अपने प्रत्याशी खड़े कर रखे हैं । इनकी माया देख कर मुलायम के होश गुम हो गये हैं और सोनियाजी की  नींद  हराम है । नरेन्द्र मोदी और शरद पवार जैसे कूटनीति कुशल भी सोच रहे हैं कि मायावती उन्हें कितने फीसदी वोट काट कर चोट पहुंचायेगी ।

 

बहर कैफ, चूहों की चमड़ी का योगदान अभी जारी है । सबसे कामयाब चूहा कौन साबित होगा, इसका खुलासा तो मतगणना से पहले करना मुमकिन नहीं । सभी चूहों का दावा है कि वे सरकार बनाने में अहम भूमिका निभायेंगे । अपने बलबूते कोई पार्टी सरकार बनाने के बारे में सोचने की हिमाकत नहीं कर सकती । सभी चूहे मानते हैं कि उनके दांत ज्यादा पैने हैं, इसलिए वे ज्यादा कामयाबी के साथ काटने की क्रिया कर सकते हैं ।

 

साधो, उम्मीद करो कि लोकतंत्र का नगाड़ा इन चूहों की चमड़ी से मढ जायेगा । वह बजेगा या नहीं ? उसका सुर कैसा लिकलेगा ? इस  बारे  में  अभी से सोचना बेमानी है ।

=> लालू भइया! कांग्रेस को तो हमने अपनी गिरफ्त में ले लिया है । सरकार भी अब अपनी ही बनेगी ।


            
=> अरे मुलायम सिंह जी, मंत्रालयों की चूहाबांट में पासवान और शरद पवार को मत भूल जाइयेगा । हमें मिलजुल कर देश को कुतरना है ।

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