सुदर्शन

नारी मुक्ति का जमाना है (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on March 11, 2010

अतंर्राष्ट्रीय महिला दिवस और राज्य सभा में महिला आरक्षण बिल के पास होने के अवसर पर प्रस्तुत है व्यंग्य: नारी मुक्ति का जमाना है ।

मित्रों, सुन कर दिल रो पड़ा कि हमारे चिरंजीवी मुख्यमुंत्री ने ब्यूटी कांटेस्टों पर रोक लगा दी है । आई.पी.सी. पर हाथ रख कर सच्ची बोल रहा हँ, दिल रो पड़ा । हाय! ये भी कोई टाईम है ऐसे फतवे निकालने का । अभी मेरी उम्र ही क्या है ? आखिर टी.वी. पर कब तक चोरी से फैशन टी.वी. देखते रहेंगे । अपने शहर में भी तो ऐसी सार्वजनिक व्यवस्था होनी चाहिये । मुख्यमंत्री जी आह लगेगी युवाओं की, एक एक वोट के लिये तरस जाओगे ।
नारी सही मायने में आज मुक्त हुई है और इत्ती ज्यादा मुक्त हुई है कि हम पुरूषों को अपनी स्वतंत्रता पर शर्म आती है । औकात है तो एक हाफ से भी हाफ पैंट और एक चौथाई बनियान में शहर का आधा चक्कर लगा के दिखाईये । शर्मा आंटी की याद आती है न । पर आज की वीरांगनायें ऐसे छोटे मोटे कामों के लिये सहर्ष प्रस्तुत रहती हैं । इतने कम कपड़ों में अगर कोई मर्द बाहर निकले तो एक घंटे में उसे इतनी भीख मिलेगी कि साल भर के कपड़े सिलवाले और कोई गजगामनी निकले तो (हाय बजरंगबली! कैसा दिव्य दृश्य होगा) आधे शहर की ट्रैफिक उसी दिशा में सरपट भागे । नारी मुक्त हो रही है । शुरूआत कपड़ों से की है । आइडिया बुरा नहीं है । मर्द भी देख कर कम से कम शराफत से तो मुक्ति पा ही लेंगे । ऐसी हसीन बालाओं को सड़क पर पैदल चलता देख कर मन पृथ्वीराज चौहान बनने को करता है पर पंद्रह साल पुरानी टुटही सायकिल आड़े आ जाती है । साली का कुत्ता ऐन वक्त पर फेल हो जाता है ।
हजारों साल से नारी को बंधन में रखा गया । उनको पूरे कपड़े पहनने पर विवश किया गया और उनके बाहर निकलने पर भी सख्त मनाही रहती थी । स्कूल-फिस्कूल लड़कियों के बिगड़ने की जगह मानी जाती थी और लड़कों को तो बिगड़ने का मौलिक अधिकार प्राप्त होता है । ऐसी आम जनधारणा है कि स्कूल कॉलेजों में पढ़ाई होती है । लेकिन ये तो हम ही जानते हैं कि पहल बार सिगरेट सुनील के बैग से निकाल कर पी थी और पांड़े सर की कोट की जेब से पैसे उड़ाकर ‘डाकू हसीना’ का मेटिनी शो पीटा गया था । संगत । संतो की संगत से ऐसी यौगिक स्थितियाँ अपने आप आती रहती हैं ।

इस्लाम ने स्त्रियों पर लगाम कसने की काफी कोशिशें की हैं ओर वह काफी मात्रा में सफल भी रहा है । हिंदुओं में भी लड़कियों, बहुओं को घर की इज्जत समझा जाता है । ज़ाहिर है, इज्ज़त ढ़की तोपी रहे तभी खैर है । पर पश्चिम वाले इस मामले में काफी फारवर्ड हैं । असल में उनके यहाँ जो पहली क्रांति हुई वह थी कृषी क्र्रांति । इसलिये उन्होंने पहले तो भर पेट खाना खाया । फिर उनके यहाँ हुई औद्योगिक क्रांति तो कपड़े वगैरह की मिलें लग गईं । पर तब तक उन्हें इतनी ठंडी में भी खासकर महिलाओं को कम कपड़े की आदत पड़ चुकी थी । बस यहीं से नारी मुक्ति की स्वर्णगाथा की शुरूआत हुई । जब अंग्रेजी फिल्मों में समुद्र किनारे सनबाथ लेती युवतियों को देखता हूं तो ब्रह्मा को खरी खोटी सुनाने का मन करता है । बहुत बड़ा घटिया मजाक किया है उसने मुझे भारत में पैदा कर के । ब्रह्माजी इसके लिये मैं आपको कभी क्षमा नहीं करूंगा । वैसे अब लगता है कि ब्रह्मा को अपनी गलती का एहसास हो रहा है, इस लिये उन्होंने भारत और यूरोप में महिलाओं के स्तर पर काफी समानतायें ला दी हैं । नाऊ आई एम फीलिंग हैप्पी । सड़क पर टाईट जींस और मिनी स्कर्ट में आती जाती लड़कियाँ देख कर लगता है कि अब भारत को एक विकसित राष्ट्र बनने में ज्यादा देर नहीं लगेगी । जो सहूलतें अभी तक फ्रांस में थी अब मेरे इलाहाबाद में भी कुछ सालों में मिलने लगेंगी । नो डाउट दिल्ली, चंडीगढ, मुंबई, बैंगलोर में अब ये सब सुविधायें मिलने लगी हैं । अब हमारा लिविंग स्टैंडर्ड बढ गया है । पहले लड़कियाँ उठानी पड़ती थीं अब वे खुद ही चल कर घर तक या होटल तक आ जाती हैं । पहले लूट खसोट होती थी अब वे अपने दाम वसूलने लगीं है । मार्केट ग्लोबल हो गया है और यही वसुधैव कुटुंबमकम है ।
bettyboop

उदारीकरण और बाजारीकरण ने भले ही हमें नये नये प्रोडक्ट सस्ते दाम पर उपलब्ध करा दिये है पर साथ ही इसने उपलब्ध करा दी है विदेशी संस्कृति । विदेशी चैनलों के आगमन से और धीरे धीरे भारत में ही लगभग दौ सौ चैनलों के शुरू होने जाने से मीडिया का बाजार बढ़ा । चैनल शुरू हुये तो नये नये विज्ञापन शुरू हुये, नये नये धारावाहिक शुरू हुये । बाजार बढा, नये क्षेत्र खुले, तो नये तरीके भी इज़ाद किये गये । बहुत से मार्केटिंग के तरीके विदेशों से आयात किये गये । विदेशों में सफल धारावाहिकों का हिंदी संस्करण तैयार किया गया । अनैतिकता, व्यभिचार और विवाहेतर सम्बन्ध धारावाहिकों के लिये हिट फार्मूले मान लिये गये । इन धारावाहिकों को फैमिली ड्रामाज़ का नाम दिया गया और वो अपनी टीआरपी रेटिंग की सीढ़ियाँ भी चढ़ते गये । मार्केटिंग का नया फार्मूला नारी देह हो गया । विज्ञापन चाहे शेविंग क्रीम का हो या फिर फ्रैंची चढ्ढी का खूबसूरत लड़की का कम कपड़ों मे होना जरूरी हो गया । कारें, ए.सी, बड़े होटलों में डिनर और लंच सस्ते हो गये पर शर्म, हया, तमीज, संस्कार, नैतिकता, मंहगे होते चले जा रहे हैं । अब इन मूल्यों को कोई खरीदने वाला नहीं रहा क्योंकि अगर विदेशी कंपनी में एक लाख रूपये महीने की पगार पानी है तो इन मूल्यों को या तो ताक पर रख दीजिये या फिर कबाड़ में बेच दीजिये । एक नई संस्कृति का विकास हो रहा है इंडो-अमेरिकन संस्कृति । जो सिर्फ दैहिक सुखों मे ही विश्वास करती है । माई गॉड! अभी हमें आजादी मिले मुश्किल से 62 साल ही हुये हैं, आज भी 30 प्रतिशत भारतीय दो वक्त की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पाता है, उड़ीसा, आंध्रा, महाराष्ट्र, में हर साला हजारों किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बच्चे बेचे जा रहे हैं, लड़कियों को वैश्यावृत्ति में ढकेला जा रहा है, हर पांचवे बच्चे को शिक्षा नहीं मिल रही है, गांवो में बिजली, सड़क, पानी नहीं है, इन्फ्रास्ट्रक्चर के नाम पर भ्रष्टाचार फैल रहा है, राजनीति का माफियाकरण और गुंडाकरण हो गया है, पुलिस-गुंडो-नेताओं में फर्क करना मुश्किल हो गया है और ये ऐयाशी ! बलिहारी जाऊं ऐसी अदा पर । मल्लिका, रियेली, आई एम ग्रेट फैन आफ यू ।
नारी मुक्त हो गई । हजारों साल से हमने उसको बांध कर रखा था । आज मीडिया ने उसे मुक्त कर दिया । चाहे प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रानिक मीडिया संविधान का अनुच्छेद 19(1)(अ) उसके लिये लक्ष्मण रेखा की सुविधा उपलब्ध करता है । आज तक ऐसी कोई सरकारी संस्था नहीं बनी जो कि इन गैर सरकारी चैनलों और समाचार पत्र और पत्रिकओं को सेंसर कर सके । जाहिर है पैसा सब को कमाना है और उसके लिये सबसे आसान तरीका है नंगी लड़कियाँ दिखाना और आज की वीरांगनायें भी तत्पर हैं बदन दिखाने के लिये । आफ्टर आल पैसे जो मिलते हैं । शरीर एक सीढी है नये कान्टे्रक्ट लेने के लिये और प्रोमोशन झटकने के लिये । आज हसीनाओं को अपनी कीमत पता चल गई है, ब्रोकर्स आर नॉट एलाउड ।

मेरे एक जिगरी मित्र हैं । उन्हें प्रीती जिंटा वनीला आइसक्रीम का मजा देती हैं तो रानी मुखर्जी चॉकलेट आइसक्रीम का । ऐश्वर्या बटरस्कॉच का तो बिपाशा ब्लैककरंट का मजा देती हैं । हर हिरोइन में वो कोई न कोई फ्लेवर ढूंढ ही लेता है । उसके इस विचार से मैं किलो में नहीं तो सौ दो सौ ग्राम तो सहमत हूं ही । आखिर क्यूं हमें सुंदर लड़कियाँ वनीला आइसक्रीम और गुलाब जामुन जैसी लग रही हैं । क्यूंकि मीडिया उन्हें आइसक्रीम बना कर पेश कर रहा है । उनको आइसक्रीम बनने की कीमत मिलती है और समाज और देश के मर्दों की मानसिकता उन्हें आइसक्रीम या रसमलाई से ज्यादा मानने को तैयार नहीं हैं । नाउ अ डेज़ ब्यूटीफुल गर्ल्स नॉट कम्स अंडर ह्मूमन बींग । रिकाडर्स बताते हैं कि बलात्कार और यौन शोषण के आंकड़े हर साल तेजी से बढ रहे हैं । जब मैं अपने उस मित्र को उसकी जवान होती खूबसूरत बहन की याद दिलाता हँ कि वो भी किसी को टूटी फ्रूटी आइसक्रीम लग सकती है तो वह मुझको घूरने लगता है ।
मेरे शहर का सो काल्ड नं0 एक अखबार भारत का नं0 एक अखबार बनने के लिये फ्रंट पेज पर खोज खोज कर भाई के द्वारा बलात्कार, पिता के द्वारा बलात्कार, माँ के द्वारा बेची गई युवती, ससुर के बहू से संबन्ध जैसी खबरें चटपटी बना कर वैधानिक चेतावनी के साथ छापता है । वो बेचारा हर अपराध में अवैध सम्बन्धों की बू ढूंढता है । हर दिन उस अखबार के बीच के पन्नों में राष्ट्रीय और अर्न्राष्ट्रीय हॉट बेब्स की नग्न तसवीरें छपती हैं जो कि सफलता पाने के लिये शायद पूर्णत: नंगी होने के लिये भी तैयार रहती हैं । यह दैनिक हमारे शहर का सो काल्ड नं0 एक अखबार है और यह भूल जाता है कि वह हर दिन सवेरे न सिर्फ वयस्कों के द्वारा पढा जाता है बल्कि घर के छोटे बच्चों, लड़कियों, बहनों, कुलवधुओं द्वारा भी पढा जाता है । और उन्हें यह सीख देता है कि सफलता की गारंटी है नंगापन ।

मुझको लगता है कि 10-15 साल बाद भारतीय समाज को भी पश्चिमी समाज की तरह अवैध सम्बन्धों को मान्यता देनी पड़ेगी । बीवी, बहन और बेटी को घर से बाहर निकलते समय गर्भ निरोधकों की याद दिलानी पड़ेगी की सुष्मा बेठी मस्ती का पैकेट लिया की नहीं । क्या हम इस परिवर्तन के लिये तैयार हैं । अगर नहीं तो फिर उपाय क्या है ? आज से ठीक 10 साल पहले भारतीय समाज में व्यभिचार का यह स्टेटा नहीं था । आज इतना है तो 15 साल बाद कितना होगा, अनुमान लगा लीजिये । इतना तो सभी कर सकते हैं कि जिस तरह हमें अपनी माँ, बहन, बीवी और बेटी प्यारी लगती है और उनकी सुरक्षा के लिये हम चिंतित रहते हैं वैसे ही हमें दूसरे की माँ, बहन, बेटी और बीवी की सुरक्षा करनी चाहिये न कि वो हमें वनीला आइसक्रीम या रसमलाई की तरह दिखें ।

(मित्रों, यह व्यंग्य लिखा गया था जब उ0 प्र0 में राजनाथ जी की सरकार थी । नारी शरीर को हमेशा से ही एक उपभोग की वस्तु माना गया है । समाज की इस मनोदशा के लिये कौन जिम्मेदार है और यह स्थिति कब तक रहेगी, आपका क्या कहना है )

5 Responses to “नारी मुक्ति का जमाना है (व्यंग्य/कार्टून)”

  1. Keep functioning ,fantastic job!

  2. The newest Zune browser is surprisingly good, but not just like the iPod’s. It truly does work well, but just isn’t as fast as Safari, and it has a clunkier interface. If you occasionally plan on when using the internet browser that’s not a concern, however , if you’re planning to browse the web alot through your PMP then your iPod’s larger screen and better browser might be important.

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