सुदर्शन

(जग बौराना) – हाथी के पांव में सभी का पांव । (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on September 13, 2009

_____________________________________लेखक – नरेश मिश्र

मायावती की माया, कहीं धूप कहीं छाया । पत्थरों का हाथी अदालत को नहीं भाया । उसे नजर आया की ये हाथी तो प्रदूषण बढ़ा रहे हैं । देर आयद दुरूस्त आयद । पता चल गया कि प्रदूषण बढ़ रहा है । कंक्रीट के जंगलों का प्रदूषण तो अब नजर आया । असली प्रदूषण अब भी नज़र से दूर है । सियासी सिपहसालारों को प्रदूषण फैलाने में महारत हासिल है । मायावती के प्रदूषण का नुस्खा हम बताते हैं । वे दवा के नाम पर जहर का मिश्रण तैयार कर समाज को पिला रही हैं । नुस्खा नोट कीजिये – दलित वोट बैंक 100 ग्राम, अल्पसंख्यक वोट 25 ग्राम, ब्राह्मण का परोसा 25 ग्राम, पिछड़ों का चारा 10 ग्राम । इसे बहुजन समाज के काढ़े में पका कर सार्वजनिक समाज का शहद मिलाइये । इस मीठे मिक्स्चर की डोज़ समाज को पिलाइये । वोट मायावती की झोली में, लड्डू विधायकों के दोनों हाथों में और वोटर का सिर खौलती कड़ाही में ।

जनता तो नादान है । वह कह रही है कि जितने सौ करोड़ पत्थर के हाथियों, अंबेडकर और मान्यवर कांशीराम की मूर्तियों पर खर्च कर दिये गये उससे हजारों गरीब दलितों की जिंदगी में बहार लायी जा सकती थी । बुत बोलते नहीं । किताबें बोलती हैं । और कुछ नहीं तो करोड़ों बच्चे पढ़ते तो उन्हें कम से कम इतना तो मालूम होता कि बाबा साहेब कौन थे और उनका विचार चिंतन क्या था ।

दरअसल पढ़ाई लिखाई से कुछ हासिल नहीं होता । गोसाईं बाबा कह गये हैं – सब से भले वे मूढ़, जिन्हें ने व्यापे जगत गति । ज्ञानी से मूर्ख अच्छा होता है क्योंकि वह समाज के बारे में कोई फिक्र नहीं करता । दलित अगर सचमुच पढ़ लिख गये तो वो मायावती के हाथ से निकल जायेंगे, इसीलिये मायावती चाहती हैं कि दलित सिर्फ हाथी का निशान याद रखें, इससे ज्यादा कुछ जानना बसपा के हित में नहीं है ।

बसपा का हाथी दरअस्ल सफेद हाथी है । वह खाता तो बहुत है लेकिन बोझा नहीं ढ़ो सकता । मायावती भी जन्मदिन पर सैंकड़ों करोड़ का चंदा खाती हैं लेकिन प्रदेश का बोझ नहीं ढ़ो सकती । दुनिया जानती है कि हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और होते हैं । मायावती का हाथी अपने लंबे दांत से विरोधी दलों को डराता है लेकिन खाने के दांत तो सिर्फ और सिर्फ मायावती के पास हैं । वे डट कर खाती हैं और अपने चमचों को खिलाती हैं । खाओ और खाने दो का सिध्दांत ही बसपा की कामयाबी का मूल मंत्र है ।

सुप्रीम कोर्ट में यू.पी. सरकार के काबिल अधिवक्ता और मायावती के थिंक टैंक सतीश चन्द्र मिश्र ने फरमाया कि कांग्रेस तो दिल्ली में दिवंगत प्रधानमंत्रियों का स्मारक बड़ी तादाद में बनवा रही है । वह इन्हीं प्रधानमंत्रियों के नाम पर दर्जनों योजनायें चला रही है । उसे क्यों नहीं मना किया जाता । हमारा निवेदन है कि कांग्रेस और बसपा एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । एक की पार्टी ने दिल्ली को समाधिस्थल बनाया तो दूसरी ने यू.पी. को हाथियों से पाट दिया । अब ये हाथी गाजियाबाद तक पहुंच गये हैं । सुप्रीम कोर्ट को डर है कि वे दिल्ली पर कहीं धावा न बोल दें । लेकिन यहां तो जिसका राज उसकी दुहाई का सिध्दांत लागू होता है । दो गलतियां जोड़ने से एक सही नतीजा निकलता हो तो यह दलील कारगर कही जा सकती है । हमारे खयाल से कुरूक्षेत्र में लड़ने वाली अट्ठारह अक्षौहणी सेना और उसके महारथी ज्यादा समझदार थे । वे आपस में कट मरे लेकिन उन्होंने अपने स्मारक के लिये एक अंगुल जमीन भी कब्जाना जरूरी नहीं समझा । वे आग की सेज पर सो कर लपटों की सीढ़ियो से स्वर्ग चले गये । अगर वे स्मारक बनवाते तो कुरूक्षेत्र का नाम सामाधिस्थल होता । दिल्ली की किस्मत ऐसी नहीं है इसलिये वह समाधिपुरम बनने पर उतारू है ।

अब रही बात मायावती के दलित विकास की सो वह तो तभी हो गया जब एक दलित की बेटी ने हीरों का हार और सोने का मुकुट पहन लिया । एक दलित बेटी ने सोने का मुकुट पहना तो उसी में सभी दलितों का उध्दार हो गया । कहते हैं हाथी के पांव में सभी का पांव । बहन मायावती के हाथियों के पांव की कूवत से कांग्रेस सकपका गयी है ।

कांग्रेस की बारी आती है तो वो रायबरेली में कोच फैक्ट्री और अमेठी में तेल रिफाइनरी लगाती है । मायावती की बारी आती है तो वो पत्थर के हाथी और बाबा साहेब, मा0 कांशीराम, छत्रपति साहूजी महाराज की मूर्तियां लगवाती है । दोनो एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं । दोनो के अपने सियासी नुस्खे हैं । वे दवा के नाम पर जहर बांट रहे हैं । प्रदूषण तो फैलना ही है।

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हाथी के पांव मं सभी का पांव । हा, हा, हा । आउच, आह! हाय! मार डाला!

9 Responses to “(जग बौराना) – हाथी के पांव में सभी का पांव । (व्यंग्य/कार्टून)”

  1. वाह जी क्या सही रिपोर्ट तैयार की हैमाया ने अपनी माया का जाल ही ऐसे बिछा रखा है कि गरीब उसमे फंसता ही चला जा रहा है आभार

  2. रोचक व्यंग्य . आनंद आ गया मिश्र जी

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