सुदर्शन

मैं और हस्तकला (एस.यू.पी.डब्ल्यू.)(व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on August 29, 2009


बात उन दिनों की है जब मैं स्कूल में पढ़ा करता था। पढ़ा क्या करता था बस यूं ही जब घर बैठे-बैठे बोर हो जाता था तो स्कूल तक चला जाता था । वैसे स्कूल जाना मेरी मजबूरी भी थी और शौक भी । मजबूरी इसलिये क्योंकि हमारे खनादान में सभी पढ़े-लिखे थे इसलिये मुझे भी इस परंपरा को आगे घसीटना था । शौक इसलिये क्योंकि वहां चमचे इफरात में मिल जाते हैं । चमचे पालने के कारण यह शौक पालना पड़ा । शौकीन हूं इसलिये वैराइटीज़ में शौक पालता हूं । शौक तो बहुत से हैं जैसे सत्य बोलना । बजुर्गों ने कहा है सदा सत्य बोलो । मैं बजुर्गों (स्वर्गवासियों) का बड़ा ख्याल रखता हूं । आदत है । सत्य बोलना बड़ा मुश्किल काम है, ऐसा आमलोगों समझते हैं । मगर मैं ऐसा नहीं मानता । मेरे लिये तो सच बोलना बड़ा ही आसान काम है । बस थोड़ी सी प्रेक्टिस करनी पड़ती है । अब सत्य तो मेरी ज़बान पर ऐसे रहता है जैसे शायर के मुंह में शेर । आप कहोगे कि अभ्यास करने से तो कोई भी सत्यवादी हो सकाता है । मगर हुजूर फिर आप वो सारे कर्म कैसे करेंगे जिसके लिये आपको असत्य बोलना पड़ता है । मेरे फार्मूले पर अमल करिये और दोनो हाथों में लड्डू रखिये । बस अभ्यास क्या करना है कि सच बोलते समय अपनी हार्ट बीट्स और सांस पर नियंत्रण रखना है, चेहरे पर घबराने के भाव नहीं आने चाहिये, बिल्कुल रिलेक्स रहें और मुस्कुराते रहें । फिर बगैर सीरियस हुये वह बात जिसे आप छिपाना चाहिते हैं मज़ाक बना कर सबके सामने कह दीजिये । इससे सुनने वाले पर मनोविज्ञानिक दबाव पड़ता है और वह उस बात को मानने से इंकार कर देता है । आप पर झूठ बोलने का पाप भी नहीं चढ़ेगा, दिमाग तरोताजा रहेगा कि आपने कुछ छिपाया नहीं । लाख रूपये की बात आपको बतायी इसलिये आप मेरे लाख रूपये के देनदार हुये जिसे मैंने माफ कर दिया । जाइये ऐश कीजिये, आप भी क्या याद करेंगे कि किसी रईस से पाला पड़ा था ।

लीजिये बातों-बातों में असली बात तो करना ही भूल गया । हम स्कूल पढ़ने जाते थे । और सारे विषय तो मैं झेल जाता था मगर एक बड़ा ही डरावना विषय था हस्तकला (एस.यू.पी.डब्ल्यू.) का । हस्तकला (हाथ की सफाई)में मैं बहुत ही प्रवीण था मगर यहां उस टाईप की हस्तकला थी ही नहीं । सारा काम लड़कियों वाला था । फूल बनाना, वाल हैंगिंग, साबुन बनाना, कपड़े रंगना और न जाने क्या क्या जनाने वर्क थे । मेरा इन सब कामों में जरा भी इन्टरेस्ट नहीं था । मैडम को बहुत समझाया मगर विषय कम्पलसरी होने के कारण जूझना ही पड़ता था । ऐसे क्रान्तिकारी विचार मेरे चमचों के भी थे । सो हम लोगों ने टीचर द्वारा मंगाये गये सामानों को न लाने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास किया । कभी दर्जी की दुकान पर दौड़ो, कभी मोची के यहां हाजिरी भरो । पैसे लगते थे अलग । पैसों के मामले में मैं शुरू से ही बहुत जागरूक रहा हूं । अगर पैसे मेरे मनमाफिक नहीं खर्च हो रहे हों तो एक चवन्नी तक किसी को न दूं । फिर हस्तकला के लिये तो कभी नहीं । एक दिन सामान नहीं लाये, दो दिन नहीं लाये, हफ्ते भर नहीं लाये और क्लास में बैठे हम टीचर के सीने पर मूंग दलते रहे। सो उन्होंने हम असहयोग आंदोलनकारियों को क्लास के बाहर खड़ा करना शुरू कर दिया । आधी से ज्यादा क्लास बाहर ही रहती थी । जाड़े का मौसम था, सुनहरी, गुनगुनी धूप सेंकने में चोला मस्त हो जाता था ।

शिकायत प्रिंसिपल तक पहुंची । उन्होंने हमको याद फरमाया और उन सब दकियानूसी आइटमों का हिसाब मांगा जिसका हमें कुशलतापूर्वक निर्माण करना चाहिये थे । फिर वार्निंग देकर जमानत पर छोड़ दिया । ऐसी वार्निंग्स में सहेज कर रखता हूं, इसलिये कुछ जागरूक छात्राओं से जो कि धूप और बारिश से बचने के लिये छतरी भी खुद ही बना लेती थीं, एक- एक आइटम मांग कर प्रिंसपल कका को दिखा दिया और बाइज्ज़त बरी हुये ।

एक किस्सा याद आया । बात हाफ-इयर्ली एक्ज़ाम की थी । एक्ज़ाम में बांस की नाव बना कर दिखानी थी । घर से बना कर ला सकते थे, इत्ती छूट मेरे लिये काफी थी । मगर झंझट तमाम थी नाव बनाने में । पहले बांस के लिये यहां वहां दौड़ो, फिर उसे छिलवाओ । अपनी बचपन से ही ऐसे वाहियात काम करने में नानी स्वर्गवासी हो जाया करती थीं । कुछ नवाबी ब्रीड, कुछ ‘जो होगा, देखा जायेगा मौकाए वारदात पर’ वाली गंभीर सोच, सो नाव साली बन नहीं पायी । अपना पीरियड लंच के बाद था और दूसरे सेक्शन वालों का लंच से पहले । जाहिर है उलुकपुत्रों ने काफी मेहनत कर के बांस की नाव तैयार कर के टीचर को दिखाया होगा । अब तक तो सभी नावें टीचर के सामने कैट वॉक करके बरी भी हो गयी होंगी । सो मैं लपका उस क्लास की ओर । क्लास के लौंडे लंच में दूसरी क्लास की लड़कियों को घूरने के लिये छज्जे पर खड़े थे । मैं चुपचाप क्लास में घुसा और एक भली सी नाव छांट कर तड़ी हो लिया । क्लास में पहुंच कर देखा तो उस निषादराज ने नाव की तली पर अपना नाम मार्कर से लिख मारा था । तुरंत उस पर कागज की एक स्लिप चिपका कर उस पर अपना नाम सुंदर लिखावट में सजा दिया । थोड़ा उसके झंडे-वंडे का एंगल वेंगल तोड़ा-मरोड़ा और नाव तैयार कर दी ।

अपने पीरियड में मैडम सुस्त चाल से पधारीं, वजह शायद गोभी के परांठे रहे होंगे जो वे अक्सर टिफिन में लाया करती थीं । कुर्सी पर सुशोभित हुयीं और रोल नं0 से पुकार लगाने लगीं । मेरी तरह और भी यशस्वी, चिरंजीवी छात्र नाव बना कर नहीं लाये थे सो उनमें से अधिक्तर मुझसे एडवांस बुकिंग में व्यस्त थे । मैंने अपना नं0 आने पर दुल्हन सी सजी, नाजुक नाव टीचर के सामने धर दी । पहले तो उन्होंने मेरा चेहरा आश्चर्य से देखा मानो कह रही हों अरे कृष्ण मोहन मैं तो सोचती थी कि अब कि तो तुम्हारी भैंस गयी पानी में । खैर उन्होंने उलट पलट कर नाव बड़े गौर से देखी और फस्स क्लास नं0 देकर मुझे विदा किया । मेरे बाद उसी नाव से मेरे बगल वाले ने वैतरणी पार की । उसके बाद उसके आगे वालों ने, फिर उसके पीछे वाली सीट के पापियों ने । फिर दूसरी रो के आलसियों ने । फिर और दूसरे भाग्यशालियों ने इस बहती गंगा में अपने-अपने हाथ-मुंह धोकर आचमन किया । हर बार टीचर के सामने जाने से पहले नाव की ड़िजाइन में कुछ सुधार कर दिये जाते थे । मामूली फेर बदल । जैसे झंडा बदल देना या फिर झोपड़ी पर रंगीन कागज चिपका देना, सीढ़ी की जगह बदल देने । उस नाव से करीब 12 मुस्टंडों ने वैतरणी पार की । तेरहवां उसको घर ले गया था क्योंकि उसका रोल नं0 नहीं आ पाया था, वो उसके खिड़की-दरवाजे बदल कर कल दिखाता ।

हम निहायत खुश थे क्योंकि एक नाव बनाने में कुल 25 से 30 रूपये का खर्चा बैठ रहा था और जो हमने अपनी जेब से रूखसत नहीं होने दिया और यही प्रत्येक बालक का नेट प्रोफिट था जिसे हमने इतवार को पैलेस में माधुरी दीक्षित की पिक्चर देखने और तंदूर में मसाला डोसा भकोसने और चॉकलेटशेक सुरकने में इन्वेस्ट किया । सो मित्रों ये थी हमारे बचपन की सुनहरी यादों में से एक कहानी । कैसी लगी । झकास है न ।

6 Responses to “मैं और हस्तकला (एस.यू.पी.डब्ल्यू.)(व्यंग्य/कार्टून)”

  1. गिरिजेश राव said

    मुझे तो यह सीख बहुत जमी
    “. . .सच बोलते समय अपनी हार्ट बीट्स और सांस पर नियंत्रण रखना है, चेहरे पर घबराने के भाव नहीं आने चाहिये, बिल्कुल रिलेक्स रहें और मुस्कुराते रहें । फिर बगैर सीरियस हुये वह बात जिसे आप छिपाना चाहिते हैं मज़ाक बना कर सबके सामने कह दीजिये । इससे सुनने वाले पर मनोवैज्ञानिक दबाव पड़ता है और वह उस बात को मानने से इंकार कर देता है । आप पर झूठ बोलने का पाप भी नहीं चढ़ेगा, दिमाग तरोताजा रहेगा कि आपने कुछ छिपाया नहीं ।”

    देनदारी वाली बात से इत्तेफाक नहीं है क्यों कि ब्लॉगरी में मुफ्त का चलन है। मुफत में सलाह, प्रशंसा,वन्दना, गुरू चेलवाई, समर्थन और कमर्थन, गालियाँ और जूते, सहानुभूति, गोलबन्दी, वाट लगाना या लगवाना, दूसरे की न सुनते अपनी ही जोतते रहना, ग़लत लिख कर वर्तनी से लेकर व्याकरण तक के बारे में शिक्षा पाना, सेंटी हो जाना, दूसरों को सेंटी कर देना, बेनामी टिपियाना फिर उसका दूसरे बेनामी बन कर खंडन करना; फिर जूतम पैजार ….लम्बी लॉण्ड्री लिस्ट एकदम मुफ्त !

    आप की इस सलाह में ऐसा क्या है कि एक लाख का प्रिमियम लगाए बैठे हैं? ससुरा सच तो वैसे ही सदाकाली दलिद्दर है।

  2. हाथ की सफाई तो बहुत महीन कला है और इसकी दक्षता आजकल बहुत उम्र गुजारने के बाद तक लोग सीखते हैं। आप तो इण्स्टीट्यूट खोलने की सोचें!

  3. “क्लास में पहुंच कर देखा तो उस निषादराज ने नाव की तली पर अपना नाम मार्कर से लिख मारा था ।”

    बहुत ज़बरदस्त लिखा है. मैं ज्ञान चतुर्वेदी जी को धन्यवाद देता हूँ जिन्होंने आपसे कहा कि आप अब अपने नाम से लिखा करिए.

  4. (एस.यू.पी.डब्ल्यू.)? इसका फुलफॉर्म बता दो यार। मुझे कुछ सूझ नहीं रहा है।

    यह पूछते हुए मैने अपनी हार्ट बीट्स और सांस पर नियंत्रण रखने का पूरा प्रयास किया है, चेहरे पर घबराने के भाव नहीं आने दिये हैं, बिल्कुल रिलेक्स हूँ और मुस्कुरा रहा हूँ:) । फिर बगैर सीरियस हुये ही कह रहा हूँ। अब तो ठीक है न…?

  5. बहुत ज़बरद्स्त है!

  6. prem

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