सुदर्शन

दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचो पापड़ संग विस्की । (हास्य/व्यंग्य: होली)

Posted by K M Mishra on February 22, 2009

 

-बुरा न मानो होली है, हिक्क !

           

                      पड़ोसी के आंगन में खड़ा दशहरी खड़े-खड़े बौरा रहा है । बसंत आ रहा है । इस मौसम में प्रकृति से लेकर जीव-जन्तु तक सभी बौरा जाते हैं । नई-नई पत्तियाँ, रंग-बिरंगे फूल, बौराने के लिये प्रेरित करते हैं । नायिका को जो विरह वेदन वर्षा ऋतु में सताने लगती है उसकी नींव मार्च-अप्रेल में ही पड़ती है । बसंत में बौराया हुआ नायक नायिका से मिलता है । शायद होली पर । होली के दिन हिंदुस्तान में सभी बौरा जाते हैं । रंग बिरंगे हो कर, पी कर, मस्तीयाये बौराये गलियों में घूम रहे हैं । हालांकि अधिक न बौरा जायें इस लिये प्रशासन पुलीस की भी व्यवस्था करती है । पर क्या कीजियेगा, मौसम ही बौराने का है । दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचों पापड़ संग विस्की । अपन तो सिर्फ मीठी लस्सी लेते हैं ।

 

मार्च अप्रेल का महीना, बसंत का महीना । पड़ोसी के आम के बौराने का महीना । इम्तिहान का महीना । इंकमटैक्स का महीना । गुझीया, पापड़ का महीना । अबीर, गुलाल का महीना । विस्की, रम का महीना और खड़े खड़े बौराने का महीना ।

 

वर्मा जी परेशान हैं । इंकमटैक्स रिटर्न भरनी है । होली सर पर है, खोआ मंहगा हो गया है । कैसे सब इंतिजाम होगा ? पत्नी साड़ी मांग रही है । बच्चों को कपड़े चाहिये । श्रीमती वर्मा परेशान हैं अभी तक आलू नहीं कटे । होली के लिये चिप्स, पापड़ लेट हो रहे हैं । छोटे वर्मा जी इम्तिहान को गाली दे रहे हैं । ऐन होली पर पड़ रहा है साला । किसी को भी नई कोंपले देखने की फुर्सत नहीं है । ऐ प्रकृति आंटी ! तेरा टेम गलत है । तू अपने बसंत का मौसम आगे पीछे शिफ्ट करले । किसी को भी रंग बिरंगे फूल देखने की फुर्सत नहीं है । रेडियो पर एक गाना आ रहा है । बागों में बहार है, कलियों पे निखार है ।थोड़ी देर में दूसरा गाना आ रहा है टाइम नहीं, मेरे पास टाइम नहीं ।

 

बौराना चरम पर पहुँचता है होली पर । साल भर प्लानिंग बनती है किसके साथ अब की बार बौराया जाये और कितना बौराया जाये कि पिटने और दिगंबरों वाली हालत में पहुँचने से बचे रहें । उन महिलाओं की लिस्ट बनती है जो मजे से गुलाल लगवाती हैं । उन दोस्तों की लिस्ट बनती है जिनके यहाँ मुफ्त की दारू लुटती है । उन चौराहों को याद किया जाता है जहाँ पिछले साल भंग पी कर साष्टांग हो गये थे । और उन दुश्मनों की भी लिस्ट बनती है जिनसे होली पर निपटना है । बड़ा रस है होली में, बस पुलीस वाले हस्तक्षेप न करें । ये कंबख्त कानून व्यवस्था हमेशा आड़े आ जाती है । बीजेपी वाले सही कहते है कि संविधान में संशोधन जरूरी है ।

 

होली की शाम दुश्मन भी गले लग जाते हैं । इन पंक्तियों को चरितार्थ करने के लिये जो भी रास्ते में मिलता है उससे गले लगा जाता है । रामू श्यामू के घर होली मिलने गया । श्यामू माधव के घर । माधव अपनी ससुराल । और ससुराल वाले घर पर नौकर को छोड़ कर होली मिलने निकले हैं । उस दिन 80 प्रतिशत लोग घर पर नहीं होंगे । इस लिये एक सप्ताह तक लगातार ढ़ूँढ- ढ़ूँढ कर गले लगा जाता है । कुछ लोगों को एक टीस रह जाती है, मित्र तो गले लगा पर भाभी जी ने सिर्फ नमस्ते की । ऐसी होली किस काम की । खैर ।

 

होली पर 40 प्रतिशत लोगों का पेट खराब रहता है । 25 प्रतिशत लोग पेट खराब न हो जाये इस लिये खाते ही नहीं है । 15 प्रतिशत को अपनी पाचन शक्ति पर भरोसा रहता है जो वाकई में सब कछ पचा लेते हैं । बाकि 20 प्रतिशत मंहगाई की वजह से सिर्फ दाल रोटी का ही इंतजाम कर पाते हैं । ये निजी कारणों से कही आ-जा भी नहीं पाते ।

 

होली का एक बड़ा मजेदार हिस्सा होता है होलिका दहन । इनका क्या है कि हर साल जलाई जाती हैं पर रावण की तरह हर साल आकर बैठ जाती है । जलाओ मुझे । ये दानों कभी नहीं जलते है, बिल्कुल भ्रष्टाचार और मंहगाई की तरह । नेता कहता है कि हमने मंहगाई और भ्रष्टाचार खत्म कर दिया है लेकिन अगले साल फिर वही मुश्किलें । असल में इन दोने के हर साल ज़िंदा होने का राज़ है चंदा । चंदा खाने वाले हर साल इनको जिंदा कर देते हैं । चंदा लेते जाते है और इनको बिना जलाये ही चले जाते हैं । इस लिये ये असुर कभी नहीं मरते ।

 

अब जरा मेरी होली पर भी गौर फरमाईये । जैसा कि विदित है कि मैं पतित पावनी माँ गंगा कि तरह स्वच्छ, निमर्ल और पवित्र हँ । इसलिये मेरा मनना है कि जैसे माँ गंगा स्नान नहीं करती हैं वैसे मुझे भी स्नान नहीं करना चाहिये । ये मेरी पवित्रता का अपमान होगा । पर जनसाधरण को कभी-कभी मुझ कस्तूरी मानव से एक भीनी-भीनी सुगंध आती मालूम पड़ती है, जो कि उनकी सिर्फ शंका मात्र है । अत: शंका निवारण के लिये मुझे स्नान नामक क्रिया को संपन्न करना पड़ता है जो कि एक नितांत कष्टप्रद प्रक्रिया है ।

 

होली से मुझे सख्त चिढ़ है । रंग तो लगवा लूँ पर छुड़येगा कौन ? इसलिये अगर मुहल्ले में या बगल के मुहल्ले में कोई गमी साल भर पहले भी हुयी हो तो ऐन होली के दिन उस मृत्यु लोभी की आत्मा मुझे चिकोटी काटने लगती है । खेलने वालों से हाथ जोड़ कर निवेदन करता हूं । भइया पड़ोस वाले भई साहब की डेथ हो गई है । हम नहीं खेलेंगे कभी कभी तो परिवार के बूढ़े बुजुर्ग स्वर्गवासी हो कर रक्षा कर जाते हैं । ईश्वर उन सब की आत्मा को ऊपर इत्र में नहलाये । ज्यादा हुआ तो गुलाल फुलाल का टीका बहुत है ।

 

बसंत आ रहा है । पड़ोसी का आम बौरा रहा है । इसकी एक डाल मेरे आंगन में भी आ जाती तो दशहरी का आनंद आ जाता । मैं आम का बौरान और दुनिया का बौरान देखता हूं तो सोचता हँ, चलो कुछ दिन बौरा लिया तो क्या बुरा किया । अभी संसद के शीत अधिवेशन में बौराये हुये सांसदों को देख रहा था । अगर संविधान उन्हें बौराने का हक दे सकता है तो पब्लिक को क्यों नहीं ।

 

 

3 Responses to “दारू सुलभ, आलू सस्ती । खींचो पापड़ संग विस्की । (हास्य/व्यंग्य: होली)”

  1. Hilma said

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    Reblogged this on सुदर्शन.

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