सुदर्शन

सिविल लाइंस के हनुमानजी

Posted by K M Mishra on January 11, 2009




मित्रों, सबसे पहले तो मैं उस लाल लंगोट वाले से क्षमाप्रार्थी हूॅं । सच्ची मैं कोई रिस्क उठाना नहीं चाहता हॅंू । पता नहीं बजरंगी कब मुझ पर नजर टेढ़ी कर दें और तुलसीदासजी को लंकाकाण्ड में एक प्रसंग मुझ इक्कीसवीं सदी के निशाचर के उद्धार का भी जोड़ने पड़े । इससे हो सकता है कि गीता प्रेस की रामचरितमानस पचास ग्राम और भारी हो जायेगी और भक्तों को दस रूपये और ज्यादा इस मंहगाई के जमाने में हल्के करने पड़ेंगे । हलांकि मैं भी इतिहास के पन्नों मंे और राक्षस जाति की परंपरा के निर्वाह के कारण अमर हो जाऊंगा लेकिन प्राणों से मुझे उतना ही मोह है जितना हर भारतीय का मौलिक और संवैधानिक अधिकार होता हेै । फिर अपन तो कबीर के मरने के बाद से ही कह रहे हेैं ”हम मरिहे, जग मरिहे । जग मरिहे, हम कभऊ न मरब । “
तो पवनसुत हमका माफ करिदो, हम त जउन है आपहि की नकवा के नीचे की पराबलम डिसकसिया रहे हैं । मित्रों, जैसा कि शीर्षक है, हमारे शहर के सिविल लाइंस में एक हनुमानजी का मंदिर है । सिविल लाइंस जैसा कि ज्यादातर शहरों में होता है । जो सबसे अच्छा मुहल्ला होता है, सड़कें ज्यादा चिकनी होती है, जहाॅं चाट पकौड़ी के ठेले अधिक मात्रा में पाये जाते हैं, शरीफ से दिखने वाले लोग अपनी अपनी फैेमिली के साथ शाम को टहलका मारते हैं और नौजवान युवक युवतियों की तरफ और युवतियां युवकों की तरफ परस्पर आकर्शित होते हैं, वही स्थान घोशित रूप से शहर का सिविल लाइंस होता है । इस इलाके में प्रवेश करते ही रिक्शेवाला भी शरीफ बन जाता है । थैंक्यू, वैलकम, ग्लैड टू मीट यू जैसे मंत्रों का जिव्हा उच्चारण अपने आप ही शुरू कर देती है । सिविलाइज्ड होनेे की होड़ है ।
आखिर ऐसे वातावरण में रामभक्त कब तक दकियानूसी संस्कारों को ढ़ोते रहेंगे । वक्त के साथ संजीवनी वाहक को भी सिविलाइज्ड होना पड़ेगा । अखिर सभ्यता युगों से पहने हुये एक लाल लंगोट का तो नाम नहीं है । बिचारे अंजनि पुत्र शर्म से हरे, नीले हो जाते होंगे (सिंदूर तो वे लपेटे ही रहते हैं) जब कोई कन्या टाइट जींस या मिनी स्कर्ट में अपने बाॅय फ्रेंड के साथ आशीर्वाद मांगने आती होगी । मन ही मन कहती होगी ”हे पहलवान हनुमान, मेरे राम तो डेढ़ पसली के हैं अतः मंदिर के बाहर घूमता कोई रावण पुत्र मुझे छेड़़ दे तो देख लीजियेगा “। लज्जा से गड़े हनुमान जी अपनी आॅंख मूंद लेते होंगे, सोचते होंगे कि माता सीता के देश मंे सूपनखायें खुले आम पैदा हो रही हैं ।
हर शाम को ज्यादातर मंगलवार और शनिवार को वातावरण आनंदमय, स्वर्गमय या यूं कहिये नारीमय रहता है । मंगल की शाम सिंदूरी होती है (हनुमानजी का कलर) और शनिवार को सेटरडे इवनिंग की रूमानियत रहती हेै । सौन्दर्य प्रेमी बडे़ चाव से हनुमानजी का दर्शन करने आते हैं और घंटों नयनों को शांति देनी वाली रूप राशियों को निहारते रहते हैं । मंगल मंगल जन्म सफल । कुछ भक्तगण अपवाद हैं जिनकी वजह से हनुमानज टिके हुये हैं नहीं तो पहाड़ उठाने वाले अपनी रक्षा के लिये मंदिर उठा कर भरद्वाज आश्राम के बगल में सेटल हो जाते ।
बैडलक बजरंगबली तुम जिंदगी भर ब्रह्मचारी रह कर कौन सा तीर मार लिये । मैं ऐसी दर्जानों शादियों जानता हॅंू जो तुम्हारे मंदिर मे ही तय हुयी थी । लड़की दिखानी होती है तो सिविलालाइंस के हनुमान मंदिर मंे मंगलवार को शाम छः बजे टाइम फिक्स है । लड्डू खरीदे जाते हैं, दोनों परिवार हनुमान जी का दर्शन करते हैं । फिर एक शांत जगह पर दोनो परिवार बैठ जाते हैं । आधे घंटे की मधुर वार्तालाप के बाद लड़के की माॅं अन्तिम प्रश्न पूछती है ”बेटी हनुमान चलीसा आती है?“ बिटिया चालीसा की कुछ लाइनें सुनाती है और फिर रिश्ता पक्का । बोलो हनुमानजी की जय । सबका लड्डुओं से मुंह मीठा करवाया जाता है । अबकी बार दोनों भावी संबंधी अकेले हनुमानजी का दर्शन करने जाते हैं, जहाॅं पर लेन देन की बातें शुरू होती है । बजरंगी सिर्फ एक मूक दृष्टा हैं । आशीर्वाद तो जो आता है वहीं छीन कर ले जाता है । ढ़ाई सौ ग्राम मोतीचूर और चार पत्ती तुलसी में बजरंगी सदैव अवलेबल रहते हैं । स्टाॅक कभी खत्म नहीं होता है ।
लेकिन केसरी नंदन कभी कभी आर्टिफिशियल भक्तों के सरप्राइज टेस्ट भी लेते हैं । जैसे कि चार नवयुवक भक्त सूमों से उतरते हैं । एक मीठी नजर लेडीज भक्तों पर डाल कर आधा किलो मोतीचूर खरीदते हैं । फिर जूते उतारकर खरामे खरामे दायें बायें का ट्रेफिक देखते हुये मूर्ति तक पहुंचते हैं । जिधर महिलायें अधिक होती हैं (अक्सर युवतियाॅं) उसी तरफ पहुॅंच कर दर्शन करते हैं । काफी देर तक नैन कृतार्थ होते हैं और जब संदिग्ध हो जाते हैं तो फिर टैªफिक देखते हुये पइयाॅं पइयाॅं बाहर चले आते हैं । गाड़ी में बैठते हैं और एक चैराहा बाद ही किसी बार में एन्ट्री होती है । तीन-चार पैगों का रसपान होता है । इसी बीच बिना किसी काॅल के कुछ गर्लें कुछ मेंजों से उठ कर उनके समीप होती हैं । रेट मिनटों में फिक्स होते हैं और अबकि एन्ट्री किसी पास के होटल के कमरों में होती है । वो आधा किलो मोतीचूर तो बार के काउंटर पर ही छूट गया होता है । आखिर महावीर को चढ़ाया गया लड्डू इतना तो ब्रह्मचारी है ही कि वो उन कमरो के भीतर न प्रविष्ट हो । काउंटर पर शराब बांटने वाला उन लड्डूओं को सिर टिका कर मन ही मन हनुमानजी की जय बोलता है ।
सिविल लाइंस के कान्वेंटों में पढ़ने वाले लड़के जब मंदिर के सामने से गुजरते हैं तो ”हाय हनु“ का उदघोष करते हैं । हनुमान जी भी बिचारे हेलाआए के रह जाते होंगे । पहले मंै भी सीनियर्स की देखा देखी हाय-हुई कर देता था । मगर बाद में वानर प्रभू के प्रति श्रद्धा उत्पन्न होने पर (हनुमान जी छात्रों को पास कराने के लिये सबसे उपयुक्त देवता हैं) साष्टांग करने लगा ।
फिलहाल तो सिविल लाइंस का हनुमान मंदिर सिर्फ एक पिकनिक स्पाॅट रह गया है । भक्ति भावना तो उस क्षेत्र में घुसते ही कबूतर की तरह पंख फड़फड़ा कर उड़ जाती है पर हनुमान जी के असली भक्त जानते हैं कि सिविल लाइंस के हनुमान जी तो ब्रांच आफिस हैं हेड आफिस तो संगम किनारे किले के बगल में है । मजाल है उस मंदिर के पास आपके विचार दूषित हो जायंे । आनंद, प्रेम और भक्ति की वर्शा होती रहती है । क्या मातायें क्या बहनें सभी भीड़ में एक साथ आरती गाते हैं और जब नगाड़ा बजना शुरू होता है तो शरीर में शक्ति का संचार हो जाता है । रोम रोम रोमांचित, जिव्हा थरथराने लगती है । आॅंखें अपलक अपने ईष्ट को निहारती जाती हैं । एक स्वर में सभी हनुमान चालीसा का पाठ करते हैं । महावीर का श्रंगार तो देखते ही बनता है । दस फुट लंबी मूर्ति गेंदे के फूल और तुलसी की माला से पूरी तरह ढ़की रहती है । चाॅंदी के आभूशण पहने बजरंगबली के वे दो विशाल नेत्र ऐसे शोभा देते हैं मानों एक साथ दो दिनकरों का उदय हुआ हो । चाहे जितना ही सूखा पड़ा हो माॅं गंगा हर साल बजरंगबली को नहलाने आती हैं । बरसात में उन दिनों सिर्फ मंदिर की पताका दिखती है और भक्तगण उसी को प्रणाम करते हैं ।
सिविल लाइंस के हनुमानजी तो उदारीकरण वाली व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करते हैं । फैशन परस्तों की सहूलियत के लिये एक मंदिर है । चलो एक भगवान हम भी पाल लें । सिविल लाइंस की शाम में हनुमान दर्शन, डोसा, छोला-भटूरा, पेप्सी और टाइट जींस वाली लड़कियाॅं । मंगल मंगल जन्म सफल ।

3 Responses to “सिविल लाइंस के हनुमानजी”

  1. tripathito said

    अच्छा प्रयास! सिविल लाइन्स के हनुमानजी स्मार्ट लोगों के और संगम वाले बड़े हनुमानजी पारम्परिक भक्तजनों के आराध्य हैं। जब सैर-सपाटा और आउटिंग का मूड हो तो सिविल लाइन्स और जब कोई जरूरी मनौती हो तो संगम की ओर का रुख किया जाता है।🙂

  2. kaotuka said

    रचना अच्छी है इलाहाबाद की याद आ गयी. कुछ बार गया हूँ पर इतनी शराफत से नही.

    कलयुग में तो राम ही बचाए हनुमान को.

  3. neeshoo said

    हम भी घूमियाई आये हैं भाई ।आज याद आते हैं हनुमान जी और वो मस्ती ।

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