Archive for the ‘राष्ट्रीय’ Category
Posted by K M Mishra on जुलाई 28, 2009

=>सर जी! एक मशवरा है । या तो पूरी पाक नेवी को सिन्धु या दूसरी नदियों में ट्रान्सफर कर दीजिये या फिर मेरा तबादला कराची से रावलपिंडी कर दीजिये क्योंकि भारतीय नौसेना में आई.एन.एस. अरिहंत और चक्र के आ जाने के बाद अब अपनी नेवी का तो खुदा ही मालिक है ।

मित्रों, 26 जुलाई को आई.एन.एस. अरिहंत का विशाखापत्तनम में जलावतरण हुआ और 27 जुलाई को पाकिस्तान के रक्षा मंत्री के चिंचियाने की आवाज़ सुनाई दी । ”अच्छा नईं कर्र रएं हैं ये आप लोग । कमज़ोर को मारने के लिए इत्ते वड्डे-वड्डे हैवी हथियारां बना रएं हैं । ठीक बात नईं हैं ये । पहले अवाक्स रडार और अब न्यूक्लियर सबमरीन । हम लोग तो पहले से ही तालिबान और अल-कायदा की दी हुई मौत मर रहे हैं । आप लोग क्यूं फालतू में परेशान हो रएं हैं । अब क्या छोरे के टेंटुए पर लात ही धर देंगे । हैं । अपनी तो चङ्ढी-बनयान तक सब गिरवी रखी है वाशिंगटन में । इत्ता पैसा कआं से लायेंगे अम लोग । बोलो ।”
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री का कहना है ”भारत का यह कदम समुद्री क्षेत्र की सुरक्षा में खतरा पैदा कर सकता है ।” भले मानुस लगता है तुमने हमारे शाकाहारी प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह का बयान नहीं पढ़ा है । मनमोहनसिंह जी का कहना है ”हम कोई आक्रामक कदम नहीं उठा रहे है और नहीं किसी को धमकाने के लिये यह कर रहे हैं ।” इसीलिये हमने न्यूक्लियर पनडुब्बी का नाम भी बहुत ही सात्विक और अहिंसा की पूजा करने वाले जैन तीर्थंकरों के नाम पर रखा है । हालांकि कुछ जैन मुनियों को इस नाम पर आपत्ति है लेकिन हम ठहरे अहिंसा के पुजारी । शांति के समय बापू को याद करते हैं और युध्द के समय उनकी लाठी उधार ले लेते हैं । डरने की कोई बात नहीं है । आप हमारे घटिया पड़ोसी हैं और इंशाल्लाह आपके घटियापन में कभी कोई कमी भी न आयेगी लेकिन ये न्यूक्लियर पनडुब्बी आपकी भी रक्षा करेगी । बूझिये कैसे ? अरे भइया ! हर बार लड़ाई तो तुम ही शुरू करते हो और बाद में पिट पिटा कर घर पोलो ले लेते हो । अब इन बेजोड़ हथियारों के खौफ से तुम युध्द शुरू ही नहीं करोगे । इसमे फायदा किसका है । ज़ाहिर है तुम्हारा ही है । लात खाने से बचे रहोगे । अब देखो न, तुम्हारी इज्ज़त आबरू सुरक्षित रहे इसके लिए हमें क्या क्या करम नहीं करने पड़ते ।

पिरायेगी तो है ही पड़ोसी की मित्रों क्योंकि आई.एन.एस. अरिहंत है काला ब्रह्मास्त्र । एक लगभग अदृश्य पनडुब्बी । जिसे ट्रेस कर पाना पाकिस्तान और चीन के लिए निहायत मुश्किल काम है । 110 मीटर लंबी, काले रबर से कोटिंग की हुयी, 6000 टन की ये पहली स्वेदेशी न्यूक्लियर सबमरीन भारत के लिए पोखरन परमाणु परीक्षण से भी बड़ी उपलब्धि है । आज पूरे विश्व में चार दर्जन से भी ज्यादा देश परमाणु ऊर्जा का दोहन कर रहे हैं । बीसियों देशों के पास परमाणु हथियार हैं । उत्तरी कोरिया और इरान बमबाज बनने के लिए धरती आसमान एक किये हुये हैं । लेकिन न्यूक्लियर सबमरीन सबके बस की बात नहीं है । हम दुनिया के ऐसे छठे देश हैं जिसके पास न्यूक्लियर सबमरीन है । ये एक बहुत बड़ी उपलब्धि है ।

आई.एन.एस. अरिहंत में भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर द्वारा बनाया गया स्वेदेशी ‘प्रेशराइज्ड़ वाटर रियेक्टर’ लगाया गया है जो कि पनडुब्बी को 82 मेगावॉट बिजली की ताकत देता है । एक बार ईंधन लेने के बाद आई.एन.एस. अरिहंत को दसियों-बीसियों साल तक दुबारा ईंधन की जरूरत नहीं पड़ेगी । दूसरी आम डीज़ल पनडुब्बियों की तरह इसको हर रोज सतह पर आकर कार्बन-डाई-आक्साइड निकालने की जरूरत भी नहीं पड़ती है जिसकी वजह से इसको ट्रेस कर पाना बहुत मुश्किल हो जाता है । अबाध ऊर्जा मिलने के कारण इसकी गति भी 25 से 30 नॉटिकल माइल की होगी । फिलहाल इसमें अत्याधुनिक तारपीडो और स्वदेश निर्मित पानी के अंदर से ही 700 कि.मी. तक मार करने वाली एस.एल.बी.एम. के-15 सागरिका मिसाइल लगेगी और बाद में इसमें 500 से 800 कि.मी. तक मार करने वाली क्रूज मिसाइल भी लगा सकते हैं । भारत 3500 कि.मी. तक मार करने वाली एस.एल.बी.एम. के-5 के विकास में लगा हुआ है जो कि आई.एन.एस. अरिहंत और इसके जैसी दूसरी स्वदेशी न्यूक्यिर सबमरीन में लगाई जायेंगी । केन्द्रीय मन्त्रीयमण्डल ने पांच और न्यूक्लियर सबमरीन तैयार करने की अनुमति दे दी है ।
और इसके साथ ही मित्रों इसी सितंबर-अक्टूबर में हमें रूस से आकुला-2 श्रेणी की ”के-152 नेरपा” न्यूक्लियर सबमरीन दस साल के लिये लीज़ पर मिलने जा रही है । 12000 टन वजनी इस न्यूक्लियर सबमरीन का भारतीय नाम है आई.एन.एस. चक्र । फिलहाल इस पर कौन कौन से हथियार लगाये जायेंगे इसके बारे में सरकार अभी कुछ नहीं कह रही है लेकिन उम्मीद यही है कि आई.एन.एस. चक्र आम तौर पर लगने वाली 2500 से 5000 कि.मी. तक मार करने वाली ब्लास्टिक मिसाइलों और 500 से 800 कि.मी. तक मार करने वाली क्रूज़ मिसाइलों से लैस होगी ।
हमारे लिये हिंद महासागर आर्थिक और रणनीतिक रूप से निहायत ही महत्वपूर्ण है । हिंद महासगर की एकमात्र सबसे बड़ी नौसेना भारतीय नौसेना है लेकिन पिछले कुछ सालों से चीन हिंद महासागर मे घुसपैठ करने की कोशिश कर रहा है । चीन हिंदमहासागर में हमें चुनौती देने की कोशिश कर रहा है । हिंदमहासागर में शांति बनाये रखने और अपनी सुरक्षा को पुख्ता बनाने के लिए 2016 तक हमें तीन एयरक्राफ्ट कैरियर और 6 से 10 न्यूक्लियर सबमरीन की जरूरत पड़ेगी । विध्वंसक पोत और डीज़ल चालित पनडुब्बियों की संख्या में भी वृध्दि की तत्काल जरूरत है । पाकिस्तान हमारे लिये कभी चुनौती नहीं रहा लेकिन आज हमारे सामने चुनौतियां क्षेत्रीय कम वैश्विक ज्यादा हैं और इनके लिये जल्दी ही कमर कसने की जरूरत है ।

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Posted by K M Mishra on जुलाई 27, 2009


कारगिल युध्द . भाग -2
71 के बाद 99 (28 साल का अंतर) एक पूरी पीढ़ी के उग आने का समय । एक पूरी पीढ़ी पैदा होकर जवान हो गई, पाकिस्तान में भी, हिंदुस्तान में भी । युध्द पढ़ा था किताबों में, सुना था बुजुर्गों से, और देखा था टी.वी. पर युध्द आधारित कार्यक्रमों में । कारगिल: हमारी ताज़ी दोस्ती का प्रतीक (लाहौर यात्रा), 28 साल के लम्बे अन्तराल के बाद तूफान का प्रतीक, 50 साल से सुलगती राख में एक चिंगारी का प्रतीक । यह चिंगारी अचानक हवा पाकर शोला हुई, भभकी और हमारे 400 जवानों के खून से अपनी प्यास बुझा कर ठंडी हो गई । कारगिल नई पीढ़ी के लिये एक नया अनुभव था ।
इन दो महीनों में देश में राष्ट्रप्रेम का भीषण ज्वार आया । वीर सैनिकों को रक्तदान के लिये इतनी भीड़ जुटी की इतना खून कैसे, कहाँ सुरक्षित रखें एक प्रश्न था । ज़ज्बा सिर्फ एक कि हमारा लहू उस लहू से मिल जाये जो हिमालय पर काम आया । अरबों रूपये शहीदों के परिवारों के लिये दान दे दिये गये । सहारा परिवार ने 300 सैनिकों के परिवार की जिम्मेदारी अपने ऊपर ली । सारा देश आज सैनिकों के साथ है ।
सरहद के उस पार से गलतफहमियों और सरकारी अफवाहों ने कारगिल पचड़ा शुरू किया । पाकिस्तान और उसकी सेना को यह गलतफहमी है कि किराये के बम और मिसाइलों से वह भारत को फतह कर लेगा । 28 साल में वहां के बूढ़ों की याद्दाश्त कमज़ोर पड़ गई और उनके बच्चों ने गलतफहमियां पाल ली कि अब तो इंडिया गया समझो । नादान पड़ोसी । हिंदुस्तान कोई अफ्गानिस्तान नहीं है । एक अरब में से 1 प्रतिशत भारतीय भी खड़ा हो गया तो पाकिस्तान नक्शे में ढ़ूढ़ते रह जाओगे । ”अरे यहीं कहीं तो था इंडिया और इरान के बीच में । कहाँ गया ?”
उनको पड़ी है कि एक युध्द में कश्मीर झपट लेंगे । हम राह देख रहे हैं कि बंग्लादेश हो गया, अब पाकिस्तान भी निपटा दें । कारगिल को युध्द नहीं कहा जा सकता है । लगभग 100 किमी. के अखाड़े में डंड बैठक हो गई । पाकिस्तान को अक्ल आ गई कि अपनी औकात पंजा लड़ाने की भी नहीं है अगर कुश्ती हुयी तो एक भी हड्डी साबूत नहीं बचेगी । अमेरिका से चंदा मांगकर जैसे तैसे रोटी चलती है । इंडिया ने ठोंक दिया तो अस्पताल का बिल भी वल्ड बैंक खाते में जोड़ लेगा । ( या फिर कफ़न का खर्चा ) ।
नवाज शरीफ चीन गये । चीन ने कहा ‘अच्छे बच्चे लड़ाई नहीं करते । चलो इंडिया को सॉरी बोलो और कारगिल खाली करो ।’ नवाज नहीं माने । अमेरिका गये । क्लिंटन ने समझाया ‘शांति से रहना सीखो, नहीं तो पॉकिटमनी भी बंद कर दूँगा ।’ बिचारे शरीफ सोचे इंग्लैंड से भी बात कर ली जाये । उसने भी कह दिया ‘ 50 साल के बच्चे अब तो बड़े बन जाओ । ये लड़ना झगड़ना कब छोड़ोगे ? बच्चों कि लड़ाई में बड़े नहीं पड़ते । चलो कारगिल वापस करो ।’ शरीफ शराफत से पाकिस्तान लौट आये । डर भी लग रहा था कि कहीं सरहद पर हिंदुस्तान की तरफ मुँह की हुई तोपें अगर इस्लामाबाद की ओर मुड़ गईं तो उनकी खटिया खड़ी और तख्ता पलट जायेगा ।
शरीफ ने घुसपैठियों से अपील की ”मुज़ाहिद भाइयों, अब वापस आ जाओ । इंडिया डर गया है । इस्लाम कहता है कि डरे हुये को सताना गलत है । वापस आ जाओ (अगर जिंदा हो तो, लाशें हमारे किसी काम की नहीं) क्योंकि हमारा मकसद पूरा हो गया है (लात खाये बहुत साल हो गये थे, बल भर खा लिया है ) वापस आ जाओ क्योंकि अब तुमको देने के लिये राशन और गोलियां खत्म हो गई हैं और हमारी जेब भी खाली हो गई है । हमको मालूम है कि तुम बहुत बहादुरी से लड़ रहे हो पर किसी गरीब मजलूम पर जुल्म नहीं ढ़ाना चाहिये । इंडिया को सबक मिल गया है । कश्मीर मुद्दे का अन्तर्राष्ट्रीय करण हो गया है (कोई भी देश पाकिस्तान के साथ नहीं है । कश्मीर इंडिया के ही पास रहेगा ) वापस चले आओ नहीं तो इंडियन आर्मी पाकिस्तान में घुस आयेगी और हम लोगों को इरान, अफ्गानिस्तान में शरणार्थी बन कर रहना पड़ेगा
कारगिल से घुसपैठियों ने जवाब दिया । ”कमीने शरीफ, तुमने हमको धोखा दिया । हमारे पास खाने को कुछ नहीं है । गोली और गोले खा कर हमारे काफी साथी मारे गये । तुमने कहा था भारतीय कमजोर होते हैं पर वो तो हमारे बाप निकले । एक बार यहाँ से निकल भागें तो तुमको भी देख लेंगें ।” तभी वहाँ एक गोला गिरा ”बड़ाम” । ”अब क्या देखेंगे, खेल ही खत्म हो गया । आह…… मरा….रे.. ।”
युध्द खत्म हो चुका है और अब उनकी बारी है जो युध्द कभी नहीं लड़ सकते पर काठ की तलवारें लहराने में माहिर हैं । ये हैं हमारे आदरणीय नेतागण और बुध्दजीवी का लेबल चिपकाये हुये तमाम बुध्दिजीवी । कारगिल को चुनावी मुद्दा नहीं बनाया जायेगा पर हम देखेंगे कि कारगिल का बारूद तेरहवीं लोकसभा में काम आयेगा । पिछली 18 जुलाई रविवार को रात्रि मे एक कार्यक्रम मुंबई के फिल्मी कलाकारों ने शहीद जवानों को समर्पित किया ‘ऐ वतन तेरे लिये’ । शहीदों की आत्माओं की शांति के लिये तथा उनके दु:खी परिवारों को ढ़ाँढ़स बंधाने के लिये ‘प्यार तो होना ही था’, ‘लवेरिया हुआ’, ‘पहला नशा पहला खुमार’ आदि गाने सुनाये जा रहे थे । बीच बीच में बालीवुड के कलाकार आकर श्रध्दांजलियां दे रहे थे ।
राष्ट्रीय पुरूस्कार से सम्मानित जावेद अख्तर और उनकी पत्नी शबाना आज़मी ने अपने विशाल ज्ञान का परिचय दिया और जोश में भारत की आबादी को ‘साढ़े नौ सौ करोड़’ बताया । कारगिल के शहीद आपका आरकेस्ट्रा सुनने के लिये शहीद नहीं हुये हैं । माना शहादत पर आंसू नहीं बहाये जाते पर मुजरा भी नहीं किया जाता है ।

(ये व्यंग्य अगस्त 1999 में इलाहाबाद से प्रकाशित हुआ था ।)
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Posted by K M Mishra on जुलाई 25, 2009


मित्रों यह व्यंग्य मैंने आज से दस साल पहले तब लिखा था जब भारत- पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध चल रहा था । जुलाई में कारगिल युद्ध को दस साल पूरे हो गये हैं । ये व्यंग्य समर्पित है कारगिल के शहीदों को । उम्मीद है आपको पसंद आयेगा ।
मई के महीने में दो सिरीज एक साथ शुरू हुयी । एक क्रिकेट वर्ल्डकप सीरिज दूसरी कारगिल सिरीज । इंडियन क्रिकेट टीम को शुभकामनायें मल्टीनेशनल मिलीं । होंडा वालों ने बलायें लीं, इधर अफ्रीका ने बोहनी बुरी कर दी । एल. जी. वालों की दुआयें लगी जिम्बाब्वे ने धो दिया । विल्स का आशीर्वाद मिला आस्ट्रेलिया ने पटरा कर दिया । वर्ल्डकप जीतने के लिये पेप्सी नहीं लस्सी पीनी चाहिये । आ हा ।
इधर कारगिल सिरीज में कोई मल्टीनेशनल स्पॉन्सर नहीं था । भारतीय सेना ने पाकिस्तानियों की मिट्टी पलीद कर दी । ऐसे मामलों में सिर्फ हम भारतीयों की दुआयें ही बहुत हैं । स्वदेशी का जमाना है । नवाज भाई अपने घर का कचड़ा इधर मत डाला करो । कश्मीर कोई हज करने की जगह नहीं है कि भई गंगा नहाने गये थे वहीं मर गये तो स्वर्ग पक्का । तुम्हारे यहाँ जनसंख्या ज्यादा हो गई हो तो सल्फास पर सब्सिडी दे दो । उँही खाये खाये मरा करें । फालतू में हमारी गोलियों का क्यों नुकसान करवाते हो । अटल जी की बस यात्रा के बस में नहीं है कि तुमको समझा सकें । तुमको समझाने के लिये तो सुखोई, मिराज ले कर आना पड़ेगा । लातों के भूत बातों से नहीं मानते हैं ।
इमरान खान भी बुध्दिमानी की बात कर लेते हैं । बबुआ कहत रहा कश्मीर समस्या सरहद पर नहीं पिच पर सुलझानी चाहिये । मैनचेस्टर में भारतीय टीम ने अकरम पहलवान का नाड़ा ढ़ीला कर दिया । इमरान म्याँ अब कश्मीर कश्मीर मति चिल्लइयो ।
हमारे अमन पसंद पड़ोसी पाकिस्तानियों का इतिहास कुछ कमजोर है । गरीब देश है, वहाँ कि कौम पढ़-लिख नहीं पाती है । कह रहे थे नियंत्रण रेखा ठीक से निर्धारित नहीं है । जो कि शिमला समझौते में बकायदा बतायी गयी है । कोई बात नहीं । 71 के बाद से कोई क्लास नहीं ली है न । अब की जायेंगे तो नियंत्रण रेखा ईरान के बार्डर से नाप आयेंगे । अटल जी गलत कहते हैं कि पड़ोसी बदले नहीं जाते हैं । हमारा नया पड़ोसी ईरान होगा और इस्लामाबाद पर तिरंगा लहरायेगा ।
हमारे जासूसों ने पाकिस्तान के चीफ ऑफ जनरल स्टाफ मुहम्म्द अजीज और सेनाध्यक्ष मुशर्रफ के बीच टेलीफोन पर हुयी बातचीत टेप कर ली थी । उसके बाद हमारे जासूसों ने नवाज शरीफ और सरताज अजीज की भी टेलीफोन पर हुयी एक महत्वपूर्ण बातचीत को टेप कर लियाद्व पर उस बातचीत को गुप्त रखा गया । वह महत्वपूर्ण बातचीत यहाँ पर दी जा रही है ।
शरीफ : हेलो, सरताज अजीज । मैं शरीफ बोल रहा हँ । पैकिंग हो गई ।
अजीज : क्या शरीफ मियां, मैं ही मिला था भारत भेजने को । जब से सुना है दस्त शुरू हो गये हैं । आप तो मेरा मेडिकल सर्टिफिकेट ले लो । मैं कहीं नहीं जाऊंगा ।
शरीफ : क्या बकवास कर रहे हो । अमेरिका से चार बार फोन आ चुका है । अन्तर्राष्ट्रीय दबाव पड़ रहा है बातचीत के लिये । तुम्हारा नाम पक्का हो चुका है । तुम्ही जा रहे हो ।
अजीज : मैं नहीं जाऊंगा । नहीं जाऊंगा । मैं इस्तीफा देता हूँ । मेरे बड़े बड़े बच्चे हैं । मुझे कुछ हो गया तो वो बेचारे तो भूखों मर जायेंगे और क्या जरूरत थी मुझसे पहले वो छ: सैनिकों की लाशें भेजने की । अगर उन्होंने मेरे नाक कान उखाड़ लिये तो मैं सुनूंगा कैसे और सांस कैसे लूंगा ।
शरीफ : वो लाश मैने नहीं भिजवाईं थीं । वो तो कम्बख्त जनरल के बच्चे ने भेज दी । चला जा मेरे सर के ताज । चला जा यार, तेरे हाथ जोड़ रहा हँ । चला जा भाई वरना ये जनरलवा मुझ को ही ठेल देगा ।
अजीज : मैं किसी कीमत पर नहीं जाऊंगा ।
शरीफ : नहीं जाओगे तो तुमको भारत में पाकिस्तान का राजदूत बना दूंगा । अजीज : अच्छा धमकी देते हो तो चला जाता हँ पर सुबह जाऊंगा और शाम को वापस भाग आउंगा । रूकुंगा एक दिन भी नहीं ।
शरीफ : अरे यार तू जा तो, तेरे को रिटर्न टिकट फ्री दे रहा हँ ।
अजीज : जा तो रहा हँ पर बात क्या करूंगा ?
शरीफ : बात वात कुछ नहीं करनी है । तुम जाना और सुबह 2-3 घंटे गुसलखाने में ही लगा देना । बैठक में देरी से पहुँचना । फिर जब बातचीत शुरू हो तो मौसम की बात करना । जसवंत का हाल चाल पूछना । अगर वह घुसपैठ की बात करे तो कहना कश्मीर में आज कल मौसम बहुत सुहावना है इसलिये कुछ लोग बिना पासपोर्ट के घूमने चले गये होंगे । टूरिस्ट वगैरह हैं । घूम टहल कर वापस आ जायेंगे ।
अजीज : अगर वह नियंत्रण रेखा के बारे में पूछे तो क्या जवाब दूंगा ।
शरीफ : कह देना शिमला समझौते वाली फाइल कहीं खो गई है, जिसमें नियंत्रण रेखा की स्थिति बताई गई है । इसलिये हम अपनी टीमें भेज कर पुरानी नियंत्रण रेखा को ढूंढ़ रहे हैं ।
अजीज : वो जसवंत बोलेगा कि वो भी अपनी सेना लगा कर हमारी मदद कर रहा है । तब ? और उन छ: सैनिकों की लाश के बारे में पूछेगा तो क्या जवाब दूंगा ।
शरीफ : अमां तुम बोलते बहुत हो । अगर वो ये सब पूछने लगे तो तुम दस्त का बहाना कर के बैठक जल्दी खत्म कर देना ।
पाकिस्तान सरकार को दस्त आने शुरू हो गये होंगे क्योंकि उसके बॉस अमेरिका और चीन भी हाथ झटक कर खड़े हो गये हैं इधर हमारे जवान उसके सिर पर चढ़ते जा रहे हैं । पाकिस्तान तो उधार की रोटी खाता है । सीमा पर पटाखे छोड़ने के लिये शरीफ और पाकिस्तानी सेना को पूरा पाकिस्तान गिरवी रखना पड़ेगा । ऐसी दिवाली उनका दिवाला जल्दी ही निकाल देगी । भगवान न करे कि पाकिस्तान चौथा युध्द घोषित कर दे । पर अगर अबकि युध्द हुआ तो या तो बंग्लादेश की पूरी एक श्रंखला बना देंगे या फिर बावन साल पहले नेहरू द्वारा की हुयी गलती को ही सुधार देंगे । कम्बख्त पाकिस्तान भारत का अभिन्न अंग है । और अंत में सलाम है उन सब शहीदों की वीरता को जिनका आज प्रत्येक भारतीय ऋणी है ।
शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले ।
वतन पर मरने वालों को यही आखिरी निशां होगा ।


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Posted by K M Mishra on जुलाई 24, 2009

=>क्या बतायें दिन में चार बार ये मशीन हैंग कर जाती है । मैं तो यहां आने से पहले हथौड़ी और प्लास घर से ले कर चलता हूं । जहां मशीन फंसी दो हथौड़ी नीचे कस कर जमा दी और नोट प्लास लगाकर खींच लिये ।
कल बचपन के लंगोटिया मित्र (अब इस कहावत को बदल कर कच्छा मित्र या अंडरवियर फै्रण्ड कर देना चाहिए, क्योंकि लंगोट अब सिर्फ हनुमानजी के मंदिर में ही दिखती है, लोग जॉकी या फै्रन्ची से काम चला लेते हैं और बरसात के उमस भरे दिनों में तो दाद-खाज- खुजली के डर से कछ महापुरूष तो वो भी नहीं पहनते ।) चन्द्रनिधि जी दिल्ली से इलाहाबाद पधारे । पुराने मित्र के दर्शन से मन मुदित, प्रफुल्लित हुआ । मेहमान भगवान समान होता है, इसलिए भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ प्रसाद भी होना जरूरी है और प्रसाद के लिए धन का होना, इसलिए उनको लेकर बगल के एस.बी.आई. के ए.टी.एम. बूथ तक चला गया । उस ए.टी.एम. बूथ में मेला लगा हुआ था । तमाम लोग पैसा निकालने के लिए लाइन में बूथ के अन्दर खड़े थे, मानो वहां मुफ्त के नोट बंट रहे हों । हर पीछे वाला अपने से आगेवाले को मुफ्त तकनीकी सलाह दे रहा था । ये दृश्य इलाहाबादियों के लिये आमबात है लेकिन दिल्ली से आये चन्द्रनिधि जी से रहा नहीं गया और उन्होंने अपनी नेक सलाह फ्री ऑफ कॉस्ट ब्राडकॉस्ट कर दी कि एक बार में एक ही व्यक्ति को बूथ में इंटर करना चाहिए । बूथ के अंदर भीड़ लगाना नियमों के खिलाफ है । उनका ये सुभाषित सुनकर कुछ मुस्कुराये, कुछ खिसिआये, कुछ ने दूसरी तरफ मुंह कर लिया और सबसे आगे वाले को उनके पीछे वाले सज्जन तकनीकी मार्गदर्शन देते रहे ।
मैंने चन्द्रनिधि को समझाया । भाई ये दिल्ली नहीं है । दिलवाले देखने हों तो यहां इलाहाबाद में देखो और वह भी इस ए.टी.एम. बूथ में । तुम बाहर जाकर इलाहाबादी संस्कार बिसर गये हो । हम लोग हमेशा एक दूसरे की मदद को तत्तपर रहते हैं । अगर बाजू वाली भाभीजी आधी रात को भी आवाज़ दें, हम मदद के लिए तुरंत दीवार फांद जाते हैं । तुम कहीं जा रहे हो । रास्ता भटक गये । किसी राहगीर से या पास खड़े किसी आदमी से पूछ कर देखो । उसको रास्ता न भी मालूम होगा तब भी वो बंदा मदद करने को इतना तत्पर होगा कि रास्ता बताये बिना मानेगा नहीं और उसके बाद आप भटके हुये रॉकेट की तरह किसी बंगाल की खाड़ी की शोभा बढायेंगे । जब तक हम दिन में दो -चार लोगों की मदद नहीं कर देते पेट में मरोड़ उठती रहती है, रात ठीक से नींद नहीं आती और सुबह पेट भी ठीक से साफ नहीं होता । इलाहाबादियों के लिए सेवा परमो धर्म: है । आप रेलवे स्टेशन पर उतरते हैं । पहली बार इलाहाबाद आये हैं । जार्ज टाउन जाना है । एक भुवनमोहनी मुस्कान लिये रिक्शावाला आपका मन मोह लेता है । अब वो आधे शहर का चक्कर लगाते हुये अलोपीदेवी के मंदिर होते हुये, आन्नद भवन के सामने से गुजर कर उसका ऐतिहासिक महत्व बताते हुए तकरीबन एक घंटे बाद जार्ज टाउन पहुंचेगा । आप पहली बार इलाहाबाद आये हैं । ऐसा परोपकारी, यात्रीसेवी रिक्शावाला पाकर गदगद हुये जा रहे हैं । जाहिर है इस सेवा का यथोचित भुगतान तो करेंगे ही । तमाम तरह की सेवायें हैं । जो हम लोग समय समय पर करते रहते हैं । हाइकोर्ट आये मुवक्किलों की, संगम आय स्नानार्थियों की, एजी ऑफिस में पेंशन छुड़ाने आये रिटायर्ड व्यक्तियों की, इलाहाबाद की कोचिंगों में पढने आये विद्यार्थियों की । तमाम प्रकार की सेवायें हैं । अब सब आपको बताने लगें तो आप दांतों तले उंगलियां चबाने लगोगे । अब देखिये आपकी नरम-नरम उंगलियां बची रहें इस लिए मैं ज्यादा नहीं बता रहा हूं । ये भी तो एक प्रकार की सेवा हुयी न । निस्वार्थ सेवा । कुछ मांगा आपसे । कुछ नहीं । ये भी नहीं कहा की भले मानुस एक टिप्पणी ही कर देना । नहीं कहते हम लोग । ऐसे ही हैं । निस्वार्थ सेवी ।
चन्द्रनिधि भाई मेरी बात ठीक से समझ चुके थे । उनके पुराने संस्कार जागृत हो गये । उन्होंने सबसे आगे खड़े व्यक्ति को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी । वह व्यक्ति ठीक से अपना ए.टी.एम. कार्ड इंटर नहीं कर पा रहा था । चन्द्रनिधि ने उसको पूरा प्रोसेस एक के बाद एक समझाया । यहां तक कि उस भलेमानुस को उसका पासवर्ड तक बताया । ”भाईसाहब आप पहले 0752 डाल रहे थे, फिर भूल कर आप 0754 डालने लगे । इसीलिए मशीन रिजेक्ट कर दे रही थी । अब देखिए, ले लिया न । कितना निकालना है ।” उस व्यक्ति ने जवाब दिया ”नहीं मुझे तो सिर्फ बैलेंस चेक करना था ।” चन्द्रनिधि जी चकित होकर उस व्यक्ति का श्रीमुख ताकने लगे । सिर्फ बैलेंस चेक करने के लिए ये श्रीमान जी पिछले दस मिनट से मशीन के साथ मगजमारी कर रहे थे । मित्रवर खिसिआये हुये मुझे ताक रहे थे और मैं उनको देख कर मुस्कुरा रहा था । वही इलाहाबादी मुस्कान ।
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Posted by K M Mishra on जुलाई 17, 2009
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Posted by K M Mishra on जुलाई 4, 2009
=>मां का लड़ला बिगड़ गया ।
साधो, अब हम मंज़िले-मक़सूद पर जल्दी ही पहुंच जायेंगे। बस दो-चार कदम का फासला बाकी है, उसे तय करने में चंद दिन बाकी रह गये हैं । हलब्बी जनादेश हासिल कर सरकार ने सौ दिन के विकास का प्रोग्राम बनाया है । इस एजेंडे पर अमल करते ही अरहर की दाल तो 80 रू0 किलो हो गई और रजामंदी से बनाये गये समलैंगिक रिश्तों को अदालत ने हरी झंडी दे दी ।
अब कौन मुल्क हमसे आंखे मिलाकर कह सकता है कि हम डेवलप्ड कंट्री नहीं हैं । पश्चिम की ओर थोबड़ा करके हम उस जानिब की खिड़की खोलते हैं तो ताजी हवा, चमकदार रोशनी और पुर सुकून पर्यावरण मिलता है । पश्चिम की खिड़की नहीं खुले तो दम घोंटू माहौल में तबीयत घबराने लगती है और पिछड़ेपन की कालिख धोने के लिए कोई माकूल साबुन नहीं मिलता है ।
सो, पश्चिम के विकसित मुल्कों ने समलैंगिक रिश्तों को कानूनी जामा पहले ही पहना दिया था । हम कुछ कदम पिछड़ गये थे, अब अदालत के आदेश से समलैंगिकता का गलाफाड़ समर्थन करने वाली संस्थाएं उछल कूद मचा रही हैं । मानवाधिकार समर्थकों का कलेजा बल्लियों उछल रहा है । केन्द्रीय केबिनेट के मंत्री भी मुस्कुरा रहे हैं । उन्होंने भानुमति के पिटारे से निकाल कर एक चूहा उछाल दिया । मीडिया को बैठे बिठाये बढ़िया मुद्दा हाथ लग गया । वे कई दिनों तक इस अदालती आदेश के गन्ने को जोर-शोर से पीसेंगे और इसकी खोई से एक-एक बूंद निचोड़े बिना चैन से नहीं बैठेंगे ।
साधो, सवाल यह है कि अदालत के इस फैसले में नया क्या है । रजामंदी से बनाये गये किसी भी रिश्ते पर पुलिस की दखल का दायरा बहुत सिकुड़ा होता है । अदालत ने बड़ी दूर तक सोच कर ये फैसला दिया है । देश की बढ़ती हुयी आबादी को रोकने के लिए अब समलैंगिकता को कानूनी जामा पहना देना चाहिए । सरकार को संसद में बिल लाकर दस साल के लिए समलैंगिकता को सभी नागरिकों के लिए बाध्यकारी बना देना चाहिए, इससे देश की बढती हुयी जनसंख्या पर रोक लगेगी, नागरिकों को देशसेवा का एक मौका मिलेगा और देश दस साल के भीतर विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायेगा ।
रजामंदी से बनाये गये समलैंगिक रिश्तों का इतिहास आधुनिक युग की देन तो नहीं है । आदिम जमाने से आदमजाद यह हरकत करता आया है । धर्मों ने इसे नैतिकता के दायरे से बाहर कर दिया लेकिन पोप, पण्डित, मुल्ला, मौलवी और रब्बीयों की पाबंदी में ज्यादा दम नहीं था । वे खुद भी सेक्स के इस रंगोबू का मजा लेने से नहीं चूकते थे । धर्म का समलैंगिकता के खिलाफ फतवा भी कायम रहेगा और समलैंगिकता भी वजूद में रहेगी । दोनो के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता । हमें हर कीमत पर विकसित राष्ट्रों की बराबरी करना है । समलैंगिकता को कानूनी छूट देकर हमने इसी दिशा में एक ठोस कदम उठाया है । अब धर्म धुरंधरों के धमाकेदार बयानों से आसमान नहीं फट पड़ेगा ।
साधो, हमारी जवानी के दिनों में अंताक्षरी की प्रतियोगिता में शामिल होने वाले मुकाबला इस कविता से शुरू करते थे–समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम । अब समय बिताने के लिए राजनैतिक, विधिक, सामाजिक दायरे में कुछ तो करना ही पड़ेगा । पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ गये । मंहगाई सुरसा के मुंह से प्रेरणा ले रही है । मंदी की मार ने कमर तोड़ दी है । बेरोजगारी माउंट एवरेस्ट पर झंडा लहरा रही है । भारी जनादेश हासिल करने वाली सरकार इन बीमारियों का कोई कारगर इलाज नहीं तलाश सकती । उसे वोटरों का ध्यान किसी ऐसे मुद्दे की ओर आकर्षित करना है जिससे देशवासी कुछ दिनों के लिए तो भूख और बेरोजगारी को भुला कर इस बहस में उलझ जायें । समलैंगिकता से बढ़िया कारगर मुद्दा कुछ और हो नहीं सकता । विकसित दुनिया सेक्स के पीछे दीवानी है । वियेग्रा का इजाद हो चुका है । 80 वर्ष की उम्र वालों को भी जापानी और मद्रासी तेल 16 बरस की उम्र का जायका दिलाने का दावा करते हैं । समलैंगिकता की बहस से सेक्स की एक और तंग गली अब नेशनल हाइवे बन जायेगी ।
साधो, अब तो मान लो कि हम विकसित राष्ट्रों से एक कदम भी पीछे नहीं है । न मानो तो माला और सुमिरनी फेरो । हमारे बाप का क्या जाता है ।
- नरेश मिश्र
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