सुदर्शन

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फिक्सिंग का मौसम (हास्य-व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on मार्च 28, 2009

                                                                                                               – नरेश मिश्र

साधो, सुना तमने! मैच फिक्सिंग के महारथी अजहरूद्दीन क्रिकेट का मैदान छोड़कर सियासत की घुड़दौड़ में शामिल हो गये हैं । अपने लोकतंत्र में सियासत ही ऐसा सर सब्ज और बड़ा मैदान है, जिसमें हर तरह के जानवर स्वछंद हो कर चर सकते हैं । यहाँ गाय, भैंस, भेड़, बकरी, गधे, घोड़े और खच्चर तक आसानी से खप जाते हैं । अपराध की दुनिया में कुख्यात हो चुके किसिम-किसिम के अपराधियों को प्रायश्चित करने के लिए राजनीति के तीर्थ में डुबकी लगानी पड़ सकती है । अपने महान लोकतंत्र के महान कानून के अनुसार जब तक कोई अपराधी अदालत से दोष सिध्द करार नहीं दिया जाता, तब तक वह चुनाव के मैदान में बेखटके चौकड़ी भर सकता है और इस मैदान की घास मनमाने तौर पर चर सकता है । निचली अदालत से सजा मिलने पर भी अपराधी के लिए हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा तो खुला ही रहता है । वह जमानत भी पा सकता है और चुनाव लड़ने की परमीशन भी । अपने संजू भइया उर्फ मुन्ना भाई सुप्रीम कोर्ट से परमीशन मिलने की उम्मीद पर आज कल लखनऊ लोकसभा क्षेत्र में चौकड़ी भर रहे हैं । अभी नहीं तो कभी नहीं । मान्यवर अटल जी की आत्मा मुन्ना भाई की उम्मीद्वारी सुनकर आकण्ठ तृप्त हो गई होगी ।

बहर कैफ चुनाव के मौसम में हर सियासी पार्टी फिक्सिंग करती है । कांग्रेस ने अजहरूद्दीन को फिक्स किया तो समाजवादी पार्टी ने संजू भइया को, दोनों में कोई खास फर्क नहीं है । अजहरूद्दीन को मुल्क की क्रिकेट टीम की कप्तानी के दौरान एहसास हुआ कि देश की शान बढाने के लिए लगातार जीत हासिल करने का कोई मतलब नहीं है । जीत के बजाय हार जाने से ज्यादा मुनाफा कमाया जा सकता है । जीतने पर सिर्फ फीस की बंधी रकम मिलती है। हारने पर दो नंबर की चकाचक कमाई होती है । इस कमाई पर कोई इनकम टैक्स भी नहीं भरना पड़ता है । अब बी.सी.सी.आई. ने उनके बोलने पर आजीवन प्रतिबंध लगा दिया है । तो कांग्रेस को उनकी महारत का ख्याल आया । आदमी काम का है, क्रिकेट मैच फिक्स कर सका है । तो चुनाव में कामयाबी भी हासिल कर सकता है । सियासत में ऐसे ही ज़हीन लोगों की शिद्दत से जरूरत पड़ती है ।

मुन्ना भाई बेहद नाबालिग दिमाग सुपर हीरो ठहरे । बेचारे नहीं जानते थे कि मुंबई के डॉन दाउद इब्राहिम के गैंग ने कोई अपराध किया है । आत्म रक्षा का शौक चर्राया तो ए.के.56 राइफल अपने घर में रख ली । मुंबई में धमाके हुए तो घबरा कर विदेश से फोन कर दिया कि घर में रखी राइफल तोड़कर बाहर फैंक दो । लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी । क्राइम ब्रांच के लाग बेहद बेदिल होते हैं । उन्हें संजू भाई की एक्टिंग से कुछ लेना देना नहीं था । अब अदालत ने उन्हें सजा सुना दी है तो वे राजनीति के घाट पर प्रवित्र डुबकी लगाने चले आये ।

फिलहाल कांग्रेस और समाजवादी पार्टी का फिक्सिंग अभियान जारी है । अजहरूद्दीन और संजू बाबा तो फिक्स हो गये । अब बिहारी बाबू शत्रुघ्न सिन्हा की बारी है । अमर सिंह ने सियासत की चूहेदानी में चारा लगा दिया है । बिहारी बाबू अगर चारे पर रीझ गये तो चूहेदानी में खट की आवाज होगी । समाजवादी जयकारा लगायेंगे । बिहारी बाबू टोपी का रंग बदल सकते हैं । सियासत में टोपी का रंग बदलते देर नहीं लगती है । सियासी प्राणियों के दिल का रंग कभी नहीं बदलता, वह सदैव काला रहता है । सरदार की काली कामर चढै न दूजौ रंग । अभी कांग्रेस की फिक्सिंग क्षमता का इम्तिहान चल रहा है । सियासत के मयखाने में हाथी पर सवार भुनगा नजर आता है ।

=> मैच तो बहुत फिक्स किये थे । इंशाल्ला ! अब देश फिक्स करने की बारी है ।

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गया वो घर जिसमें बस गये साले (हास्य, व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on मार्च 27, 2009

- नरेश मिश्र

 

साधो, सियासत के कबूतर खाने में बड़ी गहमा गहमी है । लालू यादव के साले साधु यादव ने बहनोई को खुदा हाफिज कह कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया । अब लालू यादव भुन्नाकर साले को कोस रहे हैं । कोसने के सिवा कुछ कर भी नहीं सकते । ऋषी-मुनि होते तो साधु को शाप देते । उन्हें मलाल सिर्फ यही है कि घर में बसा साला भी साला बगावत कर बैठा ।

 

लालू यादव को वो गवईं कहावत भी याद नहीं रही जिसमें कहा गया है – गई वो दीवार जिसमें बन गये आले, गया वो घर जिसमें बस गये साले । साधु यादव सिर्फ नाम के ही साधु हैं । नाम में क्या रखा है । साधुओं को भी कुटी में रहना पसंद नहीं है । सारे साधु वन में चले जायें तो मठ-मंदिरों में राग, भोग और पंगत का प्रबंध कौन करे । करोड़ों में एक ही साधु ऐसा होता है जो गुफा से बाहर निकलना नहीं चाहता, बाकी साधु तो संसारियों के पड़ोस में ही बसना चाहते हैं ।

 

लालू यादव को सोचना चाहिए कि उनके साले को सियासत की ब्राउन शुगर उन्होंने ही चखाई थी । अब सियासी नशे की आदत पड़ गई है तो वो उसे कैसे छोड़ सकते हैं । सियासी आदमखोर जब सियासत के मानव रक्त का स्वाद चख लेता है तो तमाम जंगली जानवर उसके मेनू से गायब हो जाते हैं ।

 

लालूजी खानदानी सियासत पर जोर देने का नतीजा अच्छा नहीं होता है । साले- सालियों, बेटे-बेटियों, चचा, भतीजों, चमचों, चपरासियों और ड्राइवरों को मिलाकर एक सियासी पार्टी आसानी से बनाई जा सकती है। कुछ कसर रह जाये तो चरण चाटने वाले कोरम पूरा कर देते हैं । मजहब और जात का चुग्गा फेंककर वोटरों को आसानी से लुभाया जा सकता है । लेकिन ऐसे आसान नुस्खों से लोकतंत्र का कुछ भी भला नहीं होता है ।

 

लालूजी बिहार के मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ते वक्त आपने अपनी धर्मपत्नी राबड़ी देवी को ही वारिस बनाया था । साधु यादव कम से कम राबड़ी देवी की बनिस्पत ज्यादा काबिल तो थे ही । अब उन्होंने हाथ का हाथ थाम लिया है तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ने वाला । यूं समझो कि थाली का घी थाली में ही फैल गया । चुनाव के बाद सोनिया जी को लालू की जरूरत जरूर पड़ेगी । गठबंधन सरकार की गणित का तकाजा है कि पुराने साथियों को सिर्फ उस हद तक नाराज किया जाये जिससे लोकसभा का हिसाब किताब दुरूस्त रहे ।

 

साधो, अगली सरकार की चाभी किसके पास है, इस मुद्दे पर मीडिया में अभी से बहस चल निकली है । मुलायम सिंह का दावा है कि उनकी मदद के बिना नवजात शिशु सरकार को आक्सीजन मिल ही नहीं सकती है । उसे जिलाये रखने के लिए समाजवादी इनक्यूवेटर की जरूरत पड़ेगी । मायावती दावे के साथ कहती हैं कि या तो उनकी सरकार बनेगी या उनकी मदद से सरकार बनेगी । पासवान चतुर खिलाड़ी हैं, वे कोई दावा नहीं करते लेकिन जानते हैं कि उनके सदस्यों की संख्या दहाई भी पार गई तो सरकार में उनकी हैसियत कम नहीं होगी । शरद पवार ने फिलहाल रणनीतिक मौन धारण कर लिया है, लेकिन यह मानना मूर्खता होगी कि वे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नहीं हैं ।

 

यूपीए गठबंधन के सभी दल अपने खलीसे में कटार और बघनखा सहेज कर दिलकश मुस्कान बिखेर रहे हैं। वे गले मिलेंगे तो किसकी पीठ में खंजर चुभेगा और किस की आंत बघनखे से बाहर निकल आयेगी, इसके बारे में पहले से कुछ कहना मुश्किल है । हमारे लोकतंत्र के चुनावी महासमर में अब धर्म योध्दाओं की नहीं चलती । यहाँ तो शकुनियों का बोलबाला है । जो छल कपट के पांसे फैंकर इस जुए में जीत जाये,     वही हस्तिनापुर की गद्दी पर बैठेगा ।

 

 

- गई वो दीवार जिसमें बन गये आले, गया वो घर जिसमें बस गये साले ।

 

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गरीबी का मारा अमीर रिक्शेवाला (हास्य-व्यंग्य,कार्टून)

Posted by K M Mishra on मार्च 26, 2009

=> बीस रूपये से एक पैसा कम नहीं लूंगा । दस रूपये में आप रिक्शा चलाइये, मैं रिक्शे पर बैठता हॅंू ।

जनता एक्सप्रेस ने अपने वादा निभाया था । भोलाराम और तमाम दूसरे यात्रियों को उसने इलाहाबाद पहुँचा कर ही दम लिया । ये और बात है कि ट्रेन अपने निर्धारित समय से मात्र चार घंटे ही लेट थी । एहसान ही था भारतीय रेल का सभी यात्रियों पर क्योंकि कल यही ट्रेन पौने आठ घंटे लेट आई थी । समय का क्या है, इफरात में पड़ा रहता है । कम से कम भारत में तो समय की कोई कीमत नहीं होती है । घर तो पहँच ना ही है । चाहे आज पहुँचे, चाहे कल । तत्काल की सुविधा सिर्फ टिकट खरीदने तक ही सीमित है । एक्सप्रेस सरचार्ज किस-किस ट्रेन पर लगाया गया है इसकी जानकारी सिर्फ रेल विभाग के सुपर कम्प्यूटर को ही दी गई है । इंजन चालक से लेकर तमाम दूसरे कर्मचारीगण इस प्रकार की किसी भी जानकारी से अनभिज्ञ हैं । हाँ, यात्रियों की जेब में मुद्रा संकुचन की स्थिति जरूर पैदा हो जाती है । अब देखिये अर्थ और मुद्रा से सम्बन्धित दिक्कतों के लिए हमें वित्त मंत्रालय के सामने जाकर ऑंसू बहाने चाहिए । ये क्या कम है कि किसी रेल दुर्घटना में अगर आपके दोनों हाथ या पांव कट जायें तो रेल मंत्री आपको पचास हजार का चेक सप्रेम पकड़ा देते हैं । अब अगर वो चेक बाउंस कर जाता है तब इसमें रेल विभाग की क्या गलती । अब आप रिजर्व बैंक और वित्त मंत्रालय के सामने जाकर अपने कटे हुए हाथ-पांव फैलाकर भीख मांगने का गौरव अर्जित कर सकते हैं । भीख मांगना राष्ट्रीय कर्म है । विश्व बैंक और आई. एम. एफ. के सामने जैसे हमारी सरकार कटोरा लिया खड़ी रहती है । कटोरा हमारा राष्ट्रीय बर्तन है ।

देर तो हो ही चुकी थी, घर पहँचने की कोई जल्दी भी नहीं थी इसलिए भोलाराम ने टैम्पों की जगह रिक्शे को तरजीह दी । कंजूस भोलारामजी हर जगह मोलभाव करने से बाज नहीं आते । बड़ी चिक-चिक के बाद आखिर एक हट्टा-कट्टा जवान रिक्शेवाला बीस रूपये पर राजी हुआ । गरीब आदमी से उसके घर का, खेत-खलिहान का हाल चाल पूछिये तो वो जल्दी ही पिघल जाता है । घर जाकर कर थोड़ा सा गुड़ और एक लोटा पानी पिला दीजिए तो कभी-कभी पांच रूपये की बचत भी हो जाती है । समय काटने के लिए और उसकी गरीबी पर हमदर्दी जताने के लिए भोलाराम ने उससे बात करनी शुरू की ।

क्यॅंू  भाई क्या नाम है तुम्हारा?

सीताराम नाम है बाबूजी ।उसने थोड़ी देर बाद जवाब दिया ।

तो सीतारामजी कहाँ के रहने वाले हो ?”

साहब रीवाँ जिले के सौहागी पहाड़ पर छोटा सा गाँव है हमारा ।

यार बोल-चाल से तो तुम कुछ पढे लिखे मालूम देते हो !

हाँ बाबूजी, दर्शनशास्त्र से एम. ए किया है मैंने रीवा युनिवर्सिटी से ।

जान कर भोलाराम को आश्चर्य हुआ और थोड़ा दुख भी हुआ कि एम.ए. पास युवक रिक्शा चला रहा है । भोलाराम ने सीताराम का इंटरव्यू जारी रखा ।

यार तब तुम कहीं कोई नौकरी क्यूं नहीं कर लेते हो, बेवजह रिक्शा चला रहे हो ।भोलाराम ने उसको फ्री फंड का काम चलाऊ सुझाव दिया ।

साहब जी इसी नौकरी के चक्कर में ही तो रिक्शा खींच रहे हैं ।उसने मुस्कुरा कर जवाब दिया ।

एका एक भोलाराम की हैरानी बढ गई । वो कैसे, क्या किसी मंत्री संत्री को घूस देने के लिए पैसा का जुगाड़ कर रहे हो ?”

नहीं बाबूजी बात आपने उल्टी कही है । रेवेन्यू डिपार्टमेंट में क्लर्क की नौकरी के लिए दादा-परदादा की जमीन बेच कर तीन लाख रूपये एक छुटभैया नेता जी को थमाये थे । क्लर्की तो मिली नहीं खेत भी हाथ से निकल गया ।सीताराम की बातों में दर्द छलछला आया था । भोलाराम को भी उसकी कहानी सुन कर दु:ख हुआ ।

बात बदलने के लिए भोलाराम ने आगामी अप्रैल में होने वाले लोकसभा चुनाव का जिक्र छेड़ दिया । तो भाई सीताराम इस बार वोट किस पार्टी को देने जा रहे हो ।

क्या बाबूजी अपने भी किन हरामियों की याद दिला दी । सब साले एक जैसे हैं । किसी एक को भी वोट देना अपने वोट के साथ बलात्कार करने जैसा है ।सीताराम का मुँह कडुवा हो गया था, उसने सड़क पर खखार कर बलगम थूक दिया ।

क्यूँ भई, आज देश इतना तरक्की कर चुका है, चाँद पर जा रहा है, न्यूक्लियर रियेक्टर लगा रहा है, गरीबी पहले से कितनी कम हुई है, गाँव-गाँव कितना विकास हुआ है । देश ने साठ साल में इत्ती तरक्की की है और तुम हो कि नेताओं को कोई श्रेय ही देना नहीं चाहते हो ।भोलाराम ने दलील दी ।

क्या साहब आप भी पढे लिखे हो कर सरकार के चरके में आ गये । सरकारी आंकड़े नेताओं की ही तरह फर्जी होते हैं । थोड़ी सी अक्ल लगायेंगे तो वास्तविकता सामने आजायेगी ।

भोलाराम इस पढे-लिखे रिक्श वाले की बौध्दिक बाते सुन कर हैरान हो रहा था । तुम सरकारी आंकड़ों को फर्जी कैसे कह सकते हो ?” भोलाराम ने प्रतिवाद किया ।

क्या साहब, आप जैसे पढे लिखे लोगों को पढाना सरकार के बांये हाथ का खेल होता है । क्या आपने कभी संयुक्त राष्ट्र संघ के मानव विकास सूचकांक को देखा है । हर साल प्रकाशित होता है । उस सूचकांक में भारत देश का नम्बर 128 वाँ है । मतलब इस दुनिया में 127 देशों में गरीबी हमारे देश से कम है ।

भोलाराम आश्चर्यचकित हो गये । लेकिन सीताराम ने आंकड़े देना जारी रखा ।

सर जी सरकार कहती है कि भारत में 25 फीसदी लोग ही गरीब हैं लेकिन यू. एन. ओ. के अनुसार भारत में 84 करोड़ लोग ऐसे हैं जो कि हर रोज 20 रूपये भी नहीं कमा पाते हैं । यही आंकड़ा हमारे अर्थशास्त्री डा0 मनमोहन सिंह जी के वर्तमान आर्थिक सलाहकर प्रो अर्जुन सेन गुप्ता की 2006 की रिपोर्ट में भी प्रकाशित हुआ है । सरकार भी इसे सच मानती है ।

फिर 25 फीसदी का आंकड़ा कहां से आया है ? भोलाराम ने जिज्ञासा प्रकट की ।

सरजी सन 1971-72 से सरकार ने कैलोरी आधारित गरीबी का नया पैमाना शुरू किया है जनता को धोखे में रखने के लिए । सरकार का कहना है कि गाँव में हर रोज अगर आपको 2400 कैलोरी और शहर में हर रोज अगर आपको 2900 कैलोरी का भोजन मिल रहा है तब आप गरीबी की रेखा से ऊपर हैं । यानि की गाँव में रहना वाला व्यक्ति अगर प्रतिदिन 12 रूपये कमा रहा है और शहर में रहने वाला व्यक्ति अगर प्रतिदिन 18 रूपये कमा रहा है तब वह गरीब नहीं है । गरीबी का यह सरकरी पैमाना कैलोरी पर आधारित है, प्रति व्यक्ति आय पर नहीं ।

लेकिन नेता तो कहते हैं कि गरीबी का कारण जनसंख्या वृध्दि है ।भोलाराम ने सीताराम से और आंकड़े निकलवाने चाहे ।

क्या सॉब आप पढे लिखे लोगों को सरकारें भी खूब उल्लू बनाती हैं । आपको नहीं मालूम है तो चलिए मैं ही आप का ज्ञानवर्धन किये देता हँ । जब देश 15 अगस्त सन 1947 में आजाद हुआ था तब हमारी आबादी थी 32 करोड़, जिसमें गरीब थे मात्र 2 करोड़ लोग । ये भारत सरकार का आंकड़ा हैं जिसे सरदार पटेल के करीबी हिम्मत भाई पटेल ने बड़ी मेहनत से तैयार किया था । आज सन 2009 में भारत की आबादी है 120 करोड़ और गरीब हैं 84 करोड़, ये मनमोहन सिंह के आर्थिक सलाहकार प्रो0 अर्जुन सेन गुप्ता की 2006 में प्रकाशित हुई रिपोर्ट कहती है । यानि की सन 47 से आबादी बढी है चार गुना लेकिन गरीबी बढी है 20 गुना । कुछ समझे आप । यानि की गरीबी का जनसंख्या वृध्दि से कोई लेना देना नहीं है । इसी तरह से सन 47 में पूर्णरूप से बेरोजगारों की संख्या थी 2 करोड़ आज है 20 करोड़ यानि की 10 गुना बेरोजगारी भी बढ गई है ।

फिर इतनी विशाल गरीबी के क्या कारण हैं ?” भोलाराम ने जानना चाहा ।

इस गरीबी का सीधा कारण है नेता और भ्रष्टाचार । हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व. राजीव गांधी कहते थे कि अगर किसी योजना के तहत एक रूपये दिल्ली से भेजा जाता है तो आम आदमी को सिर्फ दस पैसे ही मिलते हैं । इस गरीबी को मिटाने के लिए कई पंचवर्षीय योजनाएं चलाई गईं, इससे नेताओं की गरीबी तो मिट गई लेकिन जनता और गरीब होती चली गई । इस गरीबी का सबसे बड़ा श्रेय तो उसी हाथ को जाता है जिसने 50 साल देश पर शासन किया और अब कहती है कि उसने देश की गरीबी तकरीबन मिटा दी है । साहब अगर स्विस बैंक में जमा भारतीय पैसों का हिसाब लगाया जाये तो 80 प्रतिशत पैसा इसी पंजे का जमा किया हुआ निकलेगा । देश का बंटवारा इनके कार्यकाल में हुआ, दो तिहाई जम्मू कश्मीर इन्होंने ने ही गंवाया, अरूणाचल प्रदेश की 90 हजार वर्ग किलो मीटर जमीन चीन ने इनकी कायरता के कारण छीन ली, पिछले पांच सालों में देश में जितनी आंतकवादी घटनाएं घटी उतनी तो इराक और अफ्गानिस्तान में भी नहीं घटीं । फर्जी आंकड़ेबाजी तो इतनी है कि 6 महीने में मंहगाई दर 12.5 प्रतिशत से 0.25 प्रतिशत पर पहँच गई जबकि मंहगाई उतनी ही है । क्या चीज सस्ती हुई है इसकी कोई खबर नहीं है । इन्होंने देश को मात्र पांच साल के अंदर कृषी निर्यातक से कृषी आयतक देश बन दिया । कितना कुछ इन्होंने देश को बर्बाद करने में किया लेकिन फिर भी बेर्शमों की तरह फिर सरकार बनाने का ख्वाब देख रहे हैं । क्या करिएगा, इस खूनी पंजे का धंधा ही यही है ।

इतना लंबा भाषण सुनने के बाद भोलाराम से रहा नहीं गया मित्रों और एका एक उनका मुँह खुला और आग सी निकली :

अबे साले! पहले ये बता कि तू भाजपाई है या सपाई है या कामरेडी है । बड़ा आया है भाषण देने वाला । यहीं पर रिक्शा रोक । मैं यहाँ से पैदल चला जाऊंगा । एक पैसा नहीं मिलेगा तुमको । साले! रिक्शावाला बनकर गांघी जी की पार्टी के खिलाफ कनवेसिंग करता है । चल भाग यहाँ से । देश की तरक्की से जलने वाले संघी हो तुम लोग ।

भोलाराम की ये बातें सुन कर रिक्शावाला खड़े खड़े मुस्कुराने लगा । बोला साहब आप का मुहल्ला आ गया है, घर भी आपका अगल-बगल ही होगा । पैसा नहीं देना है तो मत दीजिए, आपके 20 रूपयों से मेरी गरीबी में कोई अन्तर नहीं पड़ने वाला है, लेकिन अगर आप लोग ऐसी ही सरकारें चुनते रहे तब वो दिन दूर नहीं जब आप भी गरीबी की रेखा के नीचे पहँच जायेंगे ।इतना कह कर सीताराम वापस अपना रिक्शा लेकर चला गया ।

भोलाराम जी ने अपना ब्रीफकेस उठाया और खुशी खुशी अपने घर की ओर चल दिये, खुश होते भी क्यों न आखिर उनके 20 रूपये जो बच गये थे ।

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हनीमून खत्म, तलाक शुरू (हास्य-व्यंग्य)

Posted by K M Mishra on मार्च 22, 2009

     -बड़ा आया है तलाक देने वाला । अम्मां का दूध पिया है तो बाहर निकल, जमीन में गाड़ न दिया तो मेरा नाम भी फिजा मुहम्मद नहीं ।                       

                                                                

                        

साधो, आने वाला आम चुनाव एक नजरिये से बेहद दिलचस्प है । इस चुनाव के नतीजे में कोई मजबूत सरकार बने ने बने लेकिन मनोरंजन का मसाला चटख रहेगा । हमारे लीडरान वोटरों का दिल बहलाते रहेंगे । दिल बहलाने के लिए पोस्टर, लेक्चर, नाच-गाने की जरूरत नहीं है । सियासी लीडरान का डांस देखकर तबीयत बाग-बाग हो जाती है ।

 

हरियाणा के उपमुख्यमंत्री, भजन लाल के वली अहद लख्ते ज़िगर जनाब चन्द्रमोहन ने अपनी ब्याहता को छोड़कर माशूका अनुराधा बाली के साथ इश्क का चक्कर चलाया । यह चक्कर किसी भी इंसान को घनचक्कर बना देता है । चन्द्रमोहन अनुराधा बाली के साथ गुमशुदा हुए तो उनकी तलाश में हरियाणा सरकार के पसीने छूट गये । वे महीनों बाद प्रकट हुए तो उनका बदला रूप देखकर पब्लिक दंग रह गई । वे चन्द्रमोहन से चांद मुहम्मद हो गये थे । अनुराधा बाली फिजा मोहम्मद की शक्ल में सारी फिजा को महकाने लगीं ।

 

चांद मोहम्मद को मुख्यमंत्री हुडा ने मंत्रिमण्डल से चलता किया । अनुराधा बाली उर्फ फिजा भी अपने ओहदे से हाथ धो बैठीं । दोनों का हनीमून चलता रहा । बूढे भजनलाल घायल पंछी की तरह तड़पते रहे, फिर पता चला कि चांद मोहम्मद ने अपनी फिजा को तीन बार तलाक कह कर इस फसानये इश्क का दी एण्ड कर दिया ।

 

आम चुनाव से पहले सियासी कबूतरखाने की गुटर गूं में चांद और फिजा जैसा माहौल नजर आता है । बिहार में यूपीए गठबंधन के घटक दलों ने कांग्रेस के साथ वही सलूक किया जो गये जमाने में बड़े जमींदार लोग अपनी परजा के साथ करते थे । कांग्रेस खुद को राजा समझती है । राजा को पता नहीं चला और मुसहर ने जंगल का बंटवारा कर लिया । कांग्रेस को कुल तीन सीट और लालू यादव, रामविलास पासवान को बाकी सीटें, कांग्रेस के दिग्गजों का खून खौल उठा । वक्त जो न कराये सो थोड़ा । दबी बिल्ली चूहे से कान कटाती है । चूहे कान काट रहे हैं, लेकिन बिल्ली खामोश बैठी है । वह दर्द से म्याऊं-म्याऊ भी नहीं कर सकती । अब कांग्रेस हाई कमान लालू, पासवान को लाख धमकायें कि वह बीस सीट पर अपने उम्मीदवार खड़े करेगीं, लेकिन लाचार कांग्रेस जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं । वह जानती है कि बिहार में लालू, पासवान के आगे उसकी चमकाइयाँ, धमकाइयाँ का कोई असर होने वाला नहीं है । जमानत जब्त कराने के लिए कांग्रेस मन चाही सीटों पर उम्मीदवार खड़ा कर सकती है । लेकिन बिहार में अगर चलेगी तो वह लालू की रेल ही होगी ।

 

भुन्नाई कांग्रेस ने झारखंड में फौरन पलटवार किया । उसने जे.एम.एम. के साथ सीटों का बंटवारा कर सिर्फ दो सीट लालू की ओर उछाल दी । लालू भन्ना गये हैं । कांग्रेस ने उन्हीं के सिक्के में उनको भुगतान कर दिया । महाराष्ट्र में कांग्रेस और एन. सी. पी. के बीच सीट बंटवारे को लेकर रस्सा कसी चल रही है । कंाग्रेस ने धमकी दी है कि वह अपने बलबूते महाराष्ट्र की सभी सीटों पर चुनाव लड़ सकती है । लेकिन मराठा छत्रप शरद पवार कांग्रेस की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं । वे कांग्रेस की ही पैदाईश हैं । बड़ेरी तले का भूत सात पुश्तों का हाल जानता है । शरद पवार प्रधानमंत्री पद के स्वघोषित दावेदार हैं । उन्होंने कांग्रेस का यह फार्मूला खारिज कर दिया कि चुनाव के बाद प्रधानमंत्री की कुर्सी का फैसला होगा । ऐसा माहौल देख कर हमें पुराना फिल्मी गीत याद आ रहा है – हमीं से मुहब्बत, हमीं से लड़ाई, अरे मार डाला दुहाई, दुहाई ।

 

फिलहाल चुनाव के मैदान में हनीमून का परीयड खत्म हो गया । अब तीन तलाक का मौसम चल रहा है । आगाज़ ऐसा है तब अंजाम खुदा जाने ।

                                                                  - नरेश मिश्र

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हस्तिनापुर में होली (हास्य-व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on मार्च 12, 2009

– हैप्पी होली अंकल-आंटी

और गुरू द्रोण की क्लास खत्म होते ही सभी राजकुमारों के हाथों में उनकी फाउंटेन पेन चमकने लगी । कुछ ही देर मे सभी की सफेद युनीफार्मों पर नीले रंग की चित्रकारी झलकने लगी थी । ”अरे क्या कर रहे हो । कुन्ती माँ डांटेगी । सारी की सारी युनीफार्म गन्दी करके रख दी ।” युधिष्ठर ने अनमने ढंग से बकवास की । ”जानते हो ऐरियल कितना मंहगा हो गया है । राज धोबिन धनिया भी हर कपड़े की धुलवाई होली पर बढा रही है । कहती है – बोनस भी चाहिए ।” कौरवों के छियालिसवें नम्बर के धृतराष्ट पुत्र ने भी धृष्टता का परिचय देते हुए अपनी अगली सीट पर बैठे हुए रसोईये के शत्रु, अन्न के दुश्मन, भारी भरकम भीम की टेरालीन की बुशर्ट पर अपनी पेन से स्याही की मात्र तीस-चालीस बूंदे प्रेम पूर्वक अंकित कर दी । अपने भाईयों में खाने पीने के मामले में सबसे उदार गदाधारी भीम ने भी फिर अत्यधिक उदारता का परिचय दिया और अपनी केमिल इंक की पूरी की पूरी बोतल ही नम्बर छियालिस पर उड़ेल कर धर दी । नम्बर छियालिस गदाधारी भीम की इस उदारता के समक्ष नतमस्तक हो गये क्योंकि इस कारवाई के दौरान श्री भीम को धोबीपाट नामक क्रिया को भी सम्पन्न करना पड़ा था ।

”ये कम्बख्त होली फिर से आगई । अबकी बार तो बिल्कुल नहीं खेलूँगा । पिछले साल छ: कटोरी बेसन और तीन टिक्की लाइफबॉय घिस डाली थी तब कहीं जाकर रंग हल्का हुआ था । सारा शरीर नहाने में इतना घिस गया था कि हेल्थ बनाने में दिपावली आ गई थी । एक तो मैं वैसे ही मासिक स्नान करने वाला आदमी हँ, इस गंदे महीने में तो दो बार नहान हो जाता है ।” अर्जुन होली से खिन्न हैं क्योंकि होली उसकी आइडियोलोजी से भिन्न है । पिछले साल तो उसका अश्वत्थामा से इसी बात पर झगड़ा हो गया था । बेचारे अश्वत्थामा का रंच मात्र भी दोष नहीं था । वह कतई बेकसूर था । बस उसने अर्जुन के मुँह पर पाव-आध पाव ग्रीस लगा दी थी । इसी बात पर दोनो नौजवानों ने भविष्य में होने वाले महाभारत युध्द की रिहर्सल भी कर ली थी ।

अपने बाबा भीष्म तो होली खेलना कब की छोड़ चुके हैं । रंग से वह नहीं डरते । डरते तो वो मामा शकुनी के रंगीन पानी भरे गुब्बारों से हैं । जिस साल दु:शासन पैदा हुआ था, उसी साल मामा शकुनी ने उन्हें अपने रंग भरे गुब्बारे के निशाने पर लिया था । गुब्बारा तो नहीं फूटा पर पितामह का बाँया बल्ब फूटते-फूटते बचा । वो तो उन्होंने विदुर की बनाई रामबाण औषधि का एक महीने तक लेप लगाया तब जाकर कहीं उनकी बांई ऑंख की रोशनी बची थी । बड़ी ऐतिहासिक होली थी मित्रों वो । क्यूंकि अगर पितामह भीष्म की एक हेडलाईट फ्यूज हो जाती तो महाभारत का अखिल भारतीय टूर्नामेंट कुछ जल्दी ही डिसाइड हो जाता और वेद व्यास की एक बोतल इंक भी बचती और बी. आर. चोपड़ा को महाभारत सीरियल के कुछ ऐपिसोड कम बनाने पड़ते । खैर । जैसी विधि की करनी । अब जिस युध्द को श्री कृष्ण जैसे कूटनीतिक, आर्म्स डीलर फाइनेन्स कर रहे हों, ऊ साला बिना हुए थोडे ही मानेगा । जैसी हरि इच्छा ।

मित्रों, व्सास जी ने गलत खबर उडाई थी कि धृतराष्ट जन्मांध थे । धृतराष्ट की दोनों ऑंखे बचपन में एकदम फस्स क्लास थीं । हुआ यों कि बचपन में एक होली पर धृतराष्ट, पांडू और विदुर तीनों बालकगण् आपस में पिचकारी लेकर होली-होली खेल रहे थे । इसी बीच खेल-खेल में विदुर की पिचकारी से बचने के चक्कर में पांडू ने कलाबाजी खाई तो उनकी पिचकारी की नोंक धृतराष्ट की ऑंख में घुस गई । अब काने धृतराष्ट हस्तिनापुर के राजा बनते तो बड़ी जगहंसाई होती, इसलिए बालक पांडू ने उनकी दूसरी ऑंख में भी पिचकारी की नोंक घूसेड़ कर उन्हें काना राजा के नाम से बदनाम होने से बचा लिया था । इस बात की पुष्टि बहुत बाद में विदुर ने कृपाचार्य से एक अनौपाचारिक मुलाकात में की थी मगर इस बात को ज्यादा तूल नहीं दिया गया था और बात बहुत पहले ही दबा दी गई थी । गदाधारी

भीम ने इस बार दुर्योधन को देख लेने की धमकी दे रखी थी । हुआ ये था कि मकर संक्रान्ति पर दुर्योधन ने भीम की लम्बी पतंग पर हत्था मार दिया था । इसी बात पर दोनो पहलवानों में पहले तो वाक युध्द हुआ । उसके बाद दोनों ने अपनी-अपनी पेन्ट उतार कर लंगोटे भी कस लिए थे पर क्लासटीचर द्रोणाचार्य उधर से निकल पड़े तो युध्दविराम हो गया था । मगर मन में खटास तो आ ही चुकी थी, जो बाद में महाभारत युध्द में जाकर खत्म हुई ।

उधर ब्रज में श्री कृष्ण गोपियों के साथ अबकी नये तरीके से होली खेलने का मन बना रहे थे, लेकिन राधा रानी को उनकी हर प्लानिंग की खबर पहले से ही लग चुकी थी इस लिए वो उनको नंदगांव के बाहर अपने सहेलियों संग घेरने का प्रोग्राम बना चुकी थीं । श्री कृष्ण को पिछले साल ही हस्तिनापुर में बाबा भीष्म से वार्निंग मिल चुकी थी कि ”होली होली की तरह खेलो और थोड़ा बुजुर्गों का भी लिहाज किया करो ।” हुआ ये था कि पिछली होली श्री कृष्ण ने हस्तिनापुर में मनाई थी और श्री कृष्ण का साथ पाकर सारे कौरवों-पाण्डवों ने वो ऊधम मचाया कि हस्तिनापुर वालों की नाक, कान, ऑंख, गले सबमे दम-दमा-दम करके रख दिया था । और तो और उस साल पहली बार लोगों ने हस्तिनापुर के राजदरबार में रंग चलते देखा था । इस सब के पीछे दिमाग किसका था । वही अपने माखन चोर का । नरक करके रख दिया था । जिधर देखो उघर रंग ही रंग । यहाँ तक की खाने पीने के सामानों तक में रंग घोल कर रख दिया । हस्तिनापुर की बालाओं का तो रंग पंद्रहियों नहीं छूटा था । और छूटे भी तो कैसे, सबसे पक्का रंग तो कन्हा ही ले कर आया था । वो होली लौण्डों को खूब याद रही । सबने श्री कृष्ण से अगली होली पर फिर आने की सिफारिश की थी मगर बुआ कुंती ने श्री कृष्ण के हाथ जोड़ कर कहा ”मोहन! ये ब्रज की होली तुम ब्रज में ही खेला करो, हस्तिनापुर वालों को अगली बार से बख्श देना ।” लेकिन इस बार श्री कृष्ण की होली भी कुछ फीकी पड़ने वाली थी ।
ऐन होली के चार दिन बाद ही कृष्ण के बोर्ड के पेपर शुरू हो रहे थे और बड़े भाई बलराम ने भी श्री कृष्ण को होली पर कम और पढाई पर ज्यादा ध्यान देने की नसीहत दी थी ।

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लंकाई क्रिकेट टीम पर हमला (कार्टून)

Posted by K M Mishra on मार्च 4, 2009

                                                                                                

                      —- लिल्लाह ! आखिर कब तक बचोगे हमारे खूनी शिकंजे से ।

                            

 

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