Posted by K M Mishra on मई 3, 2011
लेखक: श्री नरेश मिश्र
साधो, कांग्रेस की बलिहारी । पहले जिस गर्भ को बड़े जतन से पाला, पोसा, पुष्टाहार दिया उसे दो दिन में गिरा दिया । याद करो वे दिन जब संसद में पी. ए. सी. और उसके अध्यक्ष डा0 मुरली मनोहर जोशी की तारीफ में कांग्रेसी कसीदे काढ़ते थे । प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी पी.ए.सी. के सामने हाजिरी लगाने को दस्तबस्ता सिर झुकाए पेश होने को तैयार थे । कहते थे – जब पीएसी काम कर रही है तो जेपीसी की क्या जरूरत है ।
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यही पी.ए.सी. जब अपनी रिपोर्ट स्पीकर के सामने पेश करने को तैयार हुयी तो कांग्रेसी गिरगिटों ने अपना रंग फौरन बदल दिया । उन्हें पी.ए.सी. रिपोर्ट का एक एक लज भाजपा का मेनिफेस्टो लगने लगा । वे राशन पानी लेकर डा0 जोशी और पी.ए.सी. के विरोधियों से जुड़े और अन्य सदस्यों पर हमला करने के लिये लामबंद हो गये ।
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कांग्रेस को पीएसी में कोयी मशरफ नजर नहीं आया । हर कांग्रेसी लोकतंत्रवादी से भीड़तंत्रवादी बन गया । वे हल्लागुल्ला मचा कर, कड़ुवी फटकार लगा कर इस कमेटी के विरोधी सांसदों पर पिल पड़े । मुल्क कांग्रेस का यह बदला चेहरा देख कर सन्न रह गया । रात गयी बात गयी । भांवर पड़ जाने के बाद मौर को तालाब में सिरा दिया जाता है । कवि अब्दुल रहीम खानखाना ने ठीक ही कहा है -
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काज पड़े कछु और है, काज सरे कछु और,
रहिमन भांवर के पड़े, नदी सिरावत मौर ।
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अब साधो, कांग्रेस के इस सामूहिक श्रृगाल रोदन का मतलब समझने में ज्यादा दिक्कत नहीं होनी चाहिये । संसद के बजट सत्र की वैतरणी आसानी से पार हो गयी । पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव भी कांग्रेस की मर्जी के मुताबिक सम्पन्न हो गये । कांग्रेस को वोट देकर देशवासी विपन्न हो जायेंगे यह बात भी अलहदा है । प्रीपोल सर्वे में कहा गया है की कांग्रेस के लिये मौसम माफिक रहेगा । वोटों की बारिश जोरदार होगी । अन्ना हजारे ने जंतर-मंतर पर अनशन कर कांग्रेसियों की गाड़ी के आगे काठ अटका दिया था । अब उन्हें भी जनलोकपाल विधेयक का सब्जबाग दिखा कर मना लिया गया है ।
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कांग्रेस के लिये इससे अच्छा सियासी मौका हो ही नहीं सकता है । वह जे.पी.सी. को भी पी.ए.सी. की मानिंद किनारे करने की जुगत भिड़ा रही है । उसने पीएसी की भ्रूण हत्या का जो निर्मम प्रयास किया है वह नुस्खा आगे भी काम आयेगा । इससे पहले संसद में वोट के बदले नोट लहराने के मसले पर जिस जे.पी.सी. का गठन किया गया था उसे भी चलता करने का काम कांग्रेस ने ही किया है । कांग्रेस को लोकतंत्र के नाम पर लोकतंत्र को जिबह करने का अच्छा खासा तर्जबा है । वह संकट के भंवर में फंसती है तो उसे लोकतंत्र की परंपरायें याद आती है । उसकी नैया भंवर से निकल जाती है तो फिर कहॉं लोकतंत्र, कहॉं कांग्रेस ।
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साधो, जो डा0 मुरली मनोहर जोशी कांग्रेस की नजर में चंद दिन पहले तक संसदीय परंपराओं के आदर्श थे, वही खलनायक बन गये । कहा जाने लगा कि जब विरोधी दलों की मांग पर जे.पी.सी. का गठन कर दिया गया है तो पी.ए.सी. की क्या जरूरत है । पी.ए.सी अपनी हद को पार कर रही हैं । उसे अपनी औकात में रहना चाहिये । जोशी जी पी.ए.सी. की कार्यवाही को मीडिया के सामने लीक करते हैं ।
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यह मसला तब उठाया गया जब पी.ए.सी. ने प्रधानमंत्री के आला अफसरों को तलब किया । कहॉं तो प्रधानमंत्री खुद पी.ए.सी. के सामने पेश होने की पेशकश कर रहे थे, कहॉं पीएमओ दतर के अधिकारियों को तलब किये जाने पर कांग्रेस फिरंट हो गयी । हम उस दिन की कल्पना करके सिहर उठते हैं जब पी.ए.सी. ने खुद प्रधानमंत्री को तलब किया होता । हमें लगता है कि कांग्रेसी और नक्सलवादी एक ही सिक्के के दो पहलू हैं । किसी भी कांग्रेसी को नक्सली बनते देर नहीं लगती ।
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पी.ए.सी. में कांग्रेस और द्रमुक सदस्यों को मिला कर भी बहुमत नहीं बनता था । बहुमत के लिये दो सदस्यों की जरूरत थी । कांग्रेसी मैनेजरों ने 1 सपा और 1 बसपा सदस्य को साध लिया । उसका बहुमत बन गया । अब उसके पक्ष में 11 सदस्य और विरोध में सिर्फ 10 सदस्य थे ।
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गौरतलब है कि जो सपाई और बसपाई संसद के बाहर गलाफाड़ कर कोंग्रेस का विरोध करते हैं, वे भ्रष्टाचार को ढकने के लिये बड़ी बेशर्मी से कांग्रेस के साथ हो जाते हैं । इस मिसाल से साबित होता है कि हमारे देश में भ्रष्टाचारियों का संगठन सबसे ज्यादा मजबूत है । भ्रष्टाचारी जरूरत पड़ने पर एक दूसरे को खुले आम समर्थन देते हैं, जो की अन्ना हजारे के विरोध में तमाम राजनैतिक दलों की चिल्ल पों से पता चलता है, जिसमें कांग्रेस के ही उच्चस्तर के तमाम नेता शामिल है । अब यह सचाई किसी से छिपी नहीं है कि मायावती और मुलायम दोनों आमदनी के ज्ञात स्त्रोतों से ज्यादा पैसा इकट्ठा करने का आरोप झेल रहे हैं । इन आरोपों की जांच का काम केन्द्र सरकार कर रही है । यानी भूत की जान तोते में और तोते का गला कांग्रेस के पंजे में ।
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पीएसी की रिपोर्ट का जन्म होने से पहले ही कांग्रेसी डॉक्टरों ने उसका जबरन गर्भपात कर दिया । उन्होंने सैफुद्दीन सोज की अध्यक्षता में बहुमत वाली पी.ए.सी. का गठन कर दिया । जल्दबाजी में उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि संसदीय कमेटी का अध्यक्ष सिर्फ लोकसभा का सदस्य हो सकता है, राज्यसभा का सांसद किसी संसदीय कमेटी का अध्यक्ष नहीं बन सकता है । गलती समझ में आते ही कांग्रेस नये सिरे से पीएसी गठन की तैयारी करने लगी ।
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साधो, जिसके दिमाग की ऊपरी मंजिल खाली है सिर्फ वे ही कांग्रेसी की इन गिरगिटी चालबाजियों को नहीं समझ पायेंगे । अगर कैग की रिपोर्ट नहीं आती और इस मामले का संज्ञान सुप्रीम कोर्ट डा0 सुब्रमण्यम स्वामी की पीआईएल पर न लेता तो ए. राजा आज दूर संचार मंत्री की कुर्सी पर विराजमान होते । तुर्रा यह की हर कांग्रेसी छाती ठोंक कर कह भ्रष्टाचार से लड़ने का भरोसा देशवासियों को दे रहा है । अब देखना है कि इस मुल्क में कांग्रेस का वजूद बना रहता है या लोकतंत्र का । इतना तो अंधे को भी दिखायी देता है कि देश में कांग्रेस और लोकतंत्र दोनो साथ साथ नहीं चल सकते ।
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