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जोखू सिंह उपध्याय का प्रेम पत्र (व्यंग्य, कार्टून)

Posted by K M Mishra on मई 16, 2010

=>आज मैं ऊपर । आसमां नीचे ।

सुश्री सुषमा रानी झिंझोटिया जी,

पालागी, आशा है कि आप सपरिवार राजी खुशी होंगी । हम भी सपरिवार स्वास्थ्य लाभ कर रहे हैं । आगे समाचार यह है कि कल मैं आपकी गली से साढ़े सात बार गुजरा । आठवां चक्कर इस लिये नहीं हो पाया क्योंकि आपके आदरणीय भाई साहब की नजर मुझ पर पड़ गयी थी और उन्होंने आपके प्रिय टॉमी को मेरे पीछे छोड़ दिया था । प्रिय टामी जी मुझको मेरे घर तक छोड़ कर ही वापस लौटे। भगवान का कोटि कोटि धन्यवाद कि प्रिय टामी जी मेरी नयी जींस का स्वाद नही ले पाये अन्यथा जो जींस मैंने 325 रू. की सेल में खरीदी थी, तुमको दिखाने के लिये, उसमें से प्रिय टामी जी (साला हरामी का पिल्ला) अपना हिस्सा नहीं निकाल पाये ।

पत्र की शुरूआत में मैंने तुम्हारा अभिवादन ‘पालागी’ करके किया उसका अर्थ तुम जरूर जानना चाहोगी । पहली बात मैं हर पराई स्त्री को माँ बहन के रूप में देखता हूं । अगर वह बहन सिर्फ अपने भाई की ही बहन बनना चाहती है और मेरे लिये कोई गुंजाईश है तो भी पालागी क्योंकि मैं हर स्त्री में दुर्गा जी की छाया देखता हूं । आजकल की लड़कियाँ कब दुर्गा का रूप धारण करले इसलिये पहले से ही उनके समाने नतमस्तक रहना चाहिये । सो यह एक तरह से मेरा ग्यारहवां विनम्र प्रणय निवेदन है । हालांकि तुम तक ये पहला ही पहुंच रहा है । बाकी के 10 तुम्हारे चिरंजीवी बड़े भाई साहब के हत्थे चढ़ चुके हैं । उनका मुझसे जो विशेष मोह है या ये कहिये जो प्रगाढ़ प्रेम है वो इन्ही दस प्रेम प्रत्रों की बदौलत परवान चढ़ा है ।

सुषमा जी, आप कहेंगी कि मैं कौन हूँ और आप को कैसे जानता हूं । इतनी दूर से प्रेम का प्रस्ताव क्यों रख रहा हूं । सामने क्यों नहीं आता हूं । साफ बात है आप खाते पीते घर से हैं । आपके आदरणीय पिताजी और चिरंजीवी भाई साहब दोनों ही भरपूर खाये पिये हैं, इतने खाये पियें हैं कि अगर आटे की चक्की पर रखे हुये तराजू के एक पलड़े पर तुम्हारे आदरणीय पिताजी बैठ जायें और दूसरे पलड़े पर मैं बैंठूं तो तुम्हारे पिताजी वाला पलड़ा जमीन पर अंगद के पांव के समान जमा रहेगा और मेरा पलड़ा पांच फिट ऊपर उठ चुका होगा । मेरे जैसे जब तक पांच आदमी मेरे साथ न बैठें तब तक तुम्हारे पिताजी का पलड़ा जमीन से एक इंच नहीं हिलेगा । मुझे तो घोर आश्चर्य होता है कि सूमो फाइटर्स के घर में तुम जैसी शिल्पा शेट्टी कैसे पैदा हो गयी । कुछ नहीं भगवान ही मेरे प्रेम का इम्तिहान ले रहा है, वरना तुम्हारा क्या है, जन्म जन्मांतर का रिश्ता निभाने के लिये तुम मेरे पड़ोसी गेंदा लाल जी के यहाँ भी पैदा हो सकती थी, जिनकी बीबी अपनी छोटी बिटिया के लिये मुझे पसंद करती हैं ।

हाँ बात ही बात में मैं तुम्हें यह तो बताना ही भूल गया कि मैंने तुमको पहली बार कहाँ और कैसे देखा था । तुम्हारे पिताजी मुहल्ले के टॉप के हलवाई हैं । एक दिन शाम के समय मैं मार्केट में आंखो की रोशनी तेज करने, नयनों को सुख देने के लिये और प्रसिध्द हलवाई छुन्नू लाल का समोसा खाने के लिये निकला । उस दिन मार्केट में कोई खास पीस नहीं थी इसलिये मूड उखड़ा उखड़ा सा था । मूड ठीक करने के लिये तुम्हारे पिताजी की दुकान पर समोसा खाने चला गया । चार पीस समोसा खरीद कर जैसे ही पहला टुकड़ा मुंह मैं डाला, तुम्हारे आदरणीय पिताजी को भरपूर दिल से याद किया । उस दिन तुम्हारे आदरणीय बाप समोसे में नमक भूल गये थे, आलू पांच दिन पुरानी वाली यूज किये थे और चटनी धनिया के बजाये मिर्चे की बांट रहे थे । सारा खून, जितना भी सौ दो सौ ग्राम शरीर में था, खोपड़ी पर चढ़ गया । गरियाने के लिये जैसे ही सिर ऊपर किया तो देखा तुम ही समोसा बांट रही थी । तुम जिस तरह से मुस्कुरा मुस्कुरा कर समोसा बांट रही थी, वो तुम्हारी नेटवर्क मार्केटिंग वाली मुस्कान, चटनी देते वक्त तुम्हारी खिलखिलाहट और तभी तुम्हारा मुस्कुरा कर मेरी तरफ देखना कि मैं अपना चार रूपये का हेवी नुक्सान जैसे भूल ही गया, तुम्हारी मुस्कान ने मेरे चार रूपये के नुकसान का हर्जाना चुका दिया था । तुम्हारी वह एक चितवन मेरे दिल में परमानेन्ट उतर गयी, जैसे- करेजवा में लागा तीर के माफिक और मैं परमानेन्ट हार्ट का मरीज हो गया ।

फिलहाल पिछले दो महीने से पुरानी जींस पर साफ धुली शर्ट, ऊपर से तीन बटन खोल कर, गले में लाल बड़ा रूमाल, आखों पर काला चश्मा लगा कर और चहरे पर 50 ग्राम पावडर लपेट कर मैं हर दिन तुम्हारे घर के आगे चार चक्कर इस लिये मारता रहा कि कभी न कभी तो तुम्हारी नजर मुझ पर पड़ेगी ही । तुम्हारी नजर मुझ पर पड़ी या नही पड़ी पर प्रिय टामी जी की नजर मुझ पर पड़ चुकी है । वो मेरे डियोडरेन्ट की खुश्बू अच्छी तरह से पहचानने लगे हैं और मेरे गली घुसते ही कुकुर अलाप शुरू कर देते हैं । तुम्हारे चिरंजीवी भाई साहब प्रिय टामी जी का संकेत समझ कर छह बार तो टामी जी को मेरे पीछे भी छोड़ चुके हैं । और प्रिय टामी जी मेरी तीन पेन्टों का सत्यानाश भी कर चुके हैं । कल तो मेरी हरी नयी जींस बाल बाल बची उस कुकुर आफ दि इयर से । साला कुत्ते की औलाद बिस्कुट भी नहीं खाता है ।

=>साले कुत्ते की औलाद ! छोड़ दे मेरी नई जींस । तेरे नाप की दूसरी खरीद दूंगा ।

खत काफी लंबा हो गया है । खत में अपने दो महीने के प्रेम का इतिहास और दर्द नहीं बताया जा सकता । फिर इतना लिखने पर ये इकबाले जुर्म भी होगा अगर ये पत्र तुम्हारे भाई साहब या आदरणीय पिताजी के हथ्थे चढ़ गया । प्रिय टामी जी जब कल शाम मेरे पीछे लपके थे, उस वक्त तुम अपनी छत पर खड़ी भुट्टा खा रही थी । तुम्हारी नजर मुझ पर तो पड़ी ही होगी । तुमने मुझको पहचान भी लिया होगा । फिर यह खत भी मैं जान हथेली पर रख तुम तक पहुंचाउंगा तो पहचान पक्की हो ही जायेगी । सौगंध है तुमको तुम्हारे आदरणीय बाप की चलती मिठाई और समोसे के दुकान की, इस प्रत्र के बारे में किसी से कुछ मत बताना । मैं जान से हाथ नहीं धोना चाहता हूं । और अगर तुम मुझमें जरा भी इन्टरेस्ट रखती हो तो आज शाम मैं तुम्हारी दुकान पर समोसे खाने जरूर से आउंगा । मैं तीन समोसों का आर्डर भेजूंगा । तुम अगर चार समोसे दोगी तो मैं समझ जाउंगा कि तुमको मेरा प्रणय निवेदन स्वीकार है और अगर तुम दो समोसे दोगी तो मैं समझ जाउंगा कि तुम ने मेरे पवित्र प्रेम को ठुकुरा दिया है । मैं दिल पर पत्थर रख कर कहीं और ट्राई करूंगा । अच्छा पालागी । मेरे इस प्रणय निवेदन पर दिल से विचार करना वरना मेरा दिल टूट जायेगा ।

तुम्हारा भावी प्रियतम
जोखू सिंह उपध्याय

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15 Responses to “जोखू सिंह उपध्याय का प्रेम पत्र (व्यंग्य, कार्टून)”

  1. ePandit said

    जाखू जी से सहानुभूति है। उम्मीद है उनका प्रणय निवेदन स्वीकार होगा।

  2. भाई वाह क्या सादगी है क्या दर्द है जोखू के अफ़्साने मे
    अतह इसे व्यग्य की सन्ग्या न दे…
    मेरी सम्वेद्नाए जोखू जी के साथ है….

  3. आपके व्यंग्य पढ़कर आनंद आ जाता है। इसलिए आपके बारे में जानने की उत्सुकता है। परिचय देगें तो अच्छा लगेगा।

  4. कितने दिये? दो कि चार?

  5. जरूर दो ही दिए होंगे। नहीं तो जोखू सिंह बेरोजगार नहीं हो जाएंगे…! इनका रोजगार वही- हर हफ़्ते गली बदलकर लाइन मारना… :)

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