मनमोहन-ओबामा का घरेलु मामला । (व्यंग्य/कार्टून)
Posted by K M Mishra on October 26, 2009
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा हमारे चिरंजीवी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जी की मेजबानी की तैयारियों में जी जान से लगे हुये हैं । महात्मा गांधी के साथ डिनर की ख्वाहिश ने ही उनको शांति के नोबेल से विभूषित करवा दिया तो सशरीर मनमोहन सिंह के साथ लंच-डिनर करने पर उनको न जाने कौन सी महान उपलब्धि हो जाये । कुछ भी सरप्राइज़ हो सकता है । फिलहाल उनको मनमोहन सिंह जी का बेसब्री से इंतजार है । उनका हृदय इतना पुलकित हुआ जा रहा है कि भावावेश में उनकी जबान फिसली जा रही है । कल ही मारे खुशी के उनके मुंह से निकल गया कि वे मनमोहन सिंह जी को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं । उनके इस डायलाग से इस्लामाबाद में कुछ 4.5 तीव्रता का भुकंप महसूस किया गया लेकिन फिर सब नार्मल हो गया । पाकिस्तान जिसके रिश्ते अमेरिका से नितांत घरेलु टाइप रहे हैं वो अच्छी तरह से जानता है कि बड़े लोगों को जब गरीब गुरबा से कोई छोटा मोटा काम निकलवाना होता है तो वो सिर्फ जबानी खर्च से काम लेते है और अपना उल्लू सीधा कर लेते हैं । जैसे रिक्शेवाले को 5-10 रूपये कम देने हों तो रास्ते भर उसके गांव और खेती बाड़ी का हाल चाल लेते रहो और घर पहुंच कर एक ढेला गुड़ एक लोटे पानी के साथ टिका दो । हो गया फायदे का सौदा । ओबामा को भी न्यूक्लियर डील के बाद अब सीटीबीटी और एनपीटी के उल्लू दिखाई पड़ रहे हैं जिन्हें वह हमें टिकाना चाहता है । शांति का नोबेल साला कहीं भारत को भारी न पड़ जाये ।
न्यूक्लियर डील में बहुत सी कमीनी हरकत हमारे साथ की गयीं या ये कहिये कि पिछली मनमोहन सरकार ने पता नहीं किस लालच में इन शर्तों को स्वीकार किया था । हमको इस्तेमाल हुये यूरेनियम के पुनर्संस्करण का अधिकार इस डील में नहीं दिया गया है । मनमोहन सिंह को अपनी इस वाशिंगटन यात्रा में यह उपहार मिलने की बड़ी उम्मीद है लेकिन ओबामा सिर्फ जबानी जमाखर्च से ही काम चलाना चाहते हैं और गरीब आदमी को कुछ देने के बजाये वो उसकी अंटी में से ही कुछ काम की चीज़ निकाल लेना चाहते हैं । जैसे धंधे के नये क्षेत्र । भारत सरकार अपनी रक्षा जरूरतों के लिये आने वाले कुछ साल में 100 अरब डालर की खरीदारी करने जा रही है । मंदी से जूझते अमेरिका को फिलहाल मनमोहन सिंह परिवार के आदमी ही लगेंगे । अपने भारत में अगर किसी फरियादी को टालना होता है तो उससे यही कहा जाता है ‘अरे आप क्यूं परेशान हो रहे हैं । आप तो घर के आदमी हैं’’ । घर का आदमी यानी की घर की मुर्गी दाल बराबर । देखिये मनमोहन सिंह जी को क्या हासिल होता है इस यात्रा से । वे ओबामा से कुछ हासिल कर पाते हैं या ओबामा मनमोहन को मू़ड़ते हैं, ये तो वक्त ही बतायेगा ।



^=आई लव चिकन पुलाव एण्ड लेग पीसेज़
देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा .
ज्ञानदत्त पाण्डेय said
जैसे रिक्शेवाले को 5-10 रूपये कम देने हों तो रास्ते भर उसके गांव और खेती बाड़ी का हाल चाल लेते रहो और घर पहुंच कर एक ढेला गुड़ एक लोटे पानी के साथ टिका दो । हो गया फायदे का सौदा ।
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इस सूक्ष्म दृष्टि पर तो मुग्ध हुये बिना कैसे रहा जाये!
Puneet Kumar Malaviya said
वे मनमोहन सिंह जी को अपने परिवार का हिस्सा मानते हैं । उनके इस डायलाग से इस्लामाबाद में कुछ 4.5 तीव्रता का भुकंप महसूस किया गया ….
Ye kamaal ki pankti hai
Hamesha ki tarah bahut Zordaar
गिरिजेश राव said
चचा से सहमत ! इसे भी जोड़ लें:
शांति का नोबेल साला कहीं भारत को भारी न पड़ जाये । – इतनी दूरदृष्टि और इतनी चिंता? बाप रे!
अपने भारत में अगर किसी फरियादी को टालना होता है तो उससे यही कहा जाता है ‘अरे आप क्यूं परेशान हो रहे हैं । आप तो घर के आदमी हैं’’ । घर का आदमी यानी की घर की मुर्गी दाल बराबर । – एकदम मौलिक
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बहुत बकाया हो गया है। तसल्ली से पुरानी पोस्टें पढ़ेंगे।