सुदर्शन

(हास्य व्यंग्य पर आधारित ब्लॉग) अब सुदर्शन www.kmmishra.tk पर भी उपलब्ध है .

मेले में चलते फिरते नजर आयें – 2 (दशहरा स्पेशल) (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on सितम्बर 25, 2009


दर्शक । जैसे कि आमतौर पर होते हैं । मध्यमवर्गीय औरतें, बच्चे, लड़कियां और उनको घूरते मध्यम वर्गीय युवकगण । हाई हील की सैंडिलें पहनी नाटी लड़कियां, गाढ़े रंग की सस्ती लिपिस्टिक की पर्तें, स्नो पावडर से पुते चहरे, चटकीली, भड़कीली रंग की साड़ियां, लंहगे-चुनरियां । कसी जींस, गाढ़े रंग की शर्ट, चहरे तुरंत बनी शेव से दमकते हुये, एक चौथाई मुँह कच्ची की महक का अन्तर्राष्ट्रीयकरण करते हुये । लंबे बालों पर उंगली फिराते और किसी नयनाभिराम अप्सरा के पर्यटक स्थलों का नजरों से दौरा करते हुये, उस पर अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सदउपयोग करके कुछ नितांत मार्मिक टिप्पणियां शोभित करते हुये, मेले में चलते फिरते नजर आ रहे हैं । अधिक्तर श्रध्दालू चौकी देखने नहीं बल्कि महिलायें देखने, परखने व नारियाँ पुरूष भक्तों पर अपने मेकअप का असर और पावडर, लिपिस्टिक की सार्थकता परखने आयी हैं ।

तीन बेटियों का बाप खंभे के पीछे और तीनों आत्मजाओं के रक्षार्थ उनके आगे खड़ा है । भीड़ भरपूर है और शोहदों की उपस्थिति देश की जनसंख्या के अनुरूप है । तीनों दिव्य कन्यायें बाप की पीठ पीछे, भुनी हुयी मँगफली को सम्मानित करते हुये उन्हें टूंग रहीं हैं और हसरत भरी निगाह मुझ पर गड़ायें हैं । पर मैं उस जनक के रौद्र रूप के वशीभूत कायरता पूर्ण भाव से वहां से भारी कदमों से आगे बढ़ गया । मेला अभी खत्म नहीं हुआ है ।

चाट की दुकान पर दो सांवले दंपत्ति बैठे फुल्कियाँ भकोस रहे थे । महिला चटकीली साड़ी में और लिपिस्टिक का इस दर्शन के साथ कि जितनी है आज लगा ली जाये, लपेटे बैठी है और तीव्र वेग से फुल्कियाँ ग्रहण कर रही है । फुल्की का पानी होठों से लिपिस्टिक का प्लास्टर उखाड़ता हुआ नीचे की ओर बह रहा है । पतिश्री चाट वाले से बहस कर रहे हैं । ”आठ फुल्की अभी नहीं हुई हैं, सात ही खिलाई हैं । एक और दो ।” और फिर दोनो पक्षों द्वारा गणना में हुई गलती का विश्लेषण किया गया और गणना की पध्दत्तियों को सार्वजनिक रूप से दुत्कारा गया ।

दुकाने बहुत सारी थीं । खोंमचे थे, मूँगफली, चुरमुरा । चाट व पपड़ी के ठेले । गुब्बारे वाले, खिलौने वाले । सभी दुकानदार यह मानते हुये कि अस्सी प्रतिशत लोग चोर होते हैं अत: पूरी सतर्कता के साथ व्यवसाय में संलग्न थे । पोस्टर सड़क के किनारे लगे थे । एक तरफ ममता कुलकर्णी, रानी मुखर्जी, काजोल मुस्कुरा कर परीक्षा ले रही थीं तो दूसरी तरफ सलमान शर्ट फाड़े खड़े थे । आमीर सलमान की नंगई पर मुस्कुरा रहे थे । अक्षय नयीं जींस की फिटिंग दिखा रहे थे । जमीन पर शिवजी पावर्ती और गणेश जी के साथ छोटा परिवार सुखी परिवार का नारा बुलंद कर रहे थे । बजरंगबली पर्वत उठाये पोज दे खड़े थे । राम, कृष्ण भी स्थान बनाये हुये थे । उन्हीं के बगल में कुछ पोस्टर विदेशी माताओं के भी थे । वहाँ ठंडी ज्यादा पड़ती है इसलिये वे धूप सेंक रही थीं । धूप सेंकने के परिधान कुछ खास नहीं होते हैं । नाम मात्र के वस्त्र, जो कि उनके लिये तो बहुत कम थे पर उन पोस्टरों के दर्शनार्थियों को उन वस्त्रों की उपस्थिति अखर रही थी । ग्राहकों की जैसी जिस पर श्रध्दा थी वह उसी भाव से पोस्टर खरीद रहा था । सभी के भक्त भक्तिभाव से दर्शनों का लाभ उठा रहे थे ।

गुब्बारे पर मूंग की दाल से निशाना लगाया जा रहा था । सारे निशानची निशाना साध रहे थे। कारगिल के लिये बंदूक हाथ में उठानी चाहिये ऐसे गिरे विचारे मन में चाहे न आये पर श्रीदेवी के नाक, कान, होंठों पर जरूर फायर करेंगे । ले बेवफा । ठाँ । ठाँ । ठाँ । हम मर गये थे, जो उस बोनी कपूर के साथ सेट हो ली । पीली शर्ट वाले ने पांच रूपये की दाल सुष्मिता सेन के सीने में उतार कर अपने कलेजे की आग ठंडी कर ली । कम्बख्त बहुत दिलबर दिलबर करती फिरती है । नहीं सुधरी तो अगले दशहरे पर फिर बीस गोली सप्रेम अर्पण कर देगें । इसको कहते हैं दूसरे के सीने पर मूंग दलना ।

मेरी जेब में पड़ा इकलौता पचास का नोट मेला देखने के लिये मचल रहा था । जिव्हा चटकारे लेना चाह रही थी और पेट कब्ज की याद में चेतावनी प्रसारित कर रहा था । पर जीत अंत में पचास के नोट की हुई । अभी डकार लगाओ सवेरे झेला जायेगा मौकाये वारदात पर । आखिर लवण भास्कर चूर्ण किस मर्ज की दवा है ।

अब मुझे चिंता हुई झूले के पास ढ़ाई घंटे पहले युवतियों के साथ हुये मार्मिक छेड़-छाड़ की जिसकी सूचना गगनभेदी स्वर में अमृत लाउडस्पीकर वाला दे रहा था और पुलीस वालों से अपील कर रहा था, वर्दी की दुहाई दे रहा था और आश्चर्य प्रकट कर रहा था कि पुलीस वालों के रहते यह पवित्रकर्म दूसरे कैसे कर रहे हैं । घड़ी में समय देखा तो डेढ़ बज रहा था । घर की याद सताने लगी पर जाते-जाते घटनास्थल का दौरा भी जरूरी था ।

झूले के पास महिलाओं, बच्चीयों, बच्चीनुमा युवतियों की भीड़ थी । उनके शुभचिंतक उनकी रक्षार्थ खड़े थे और बहुत से प्रेमीजन दो कांस्टेबलों को खड़ा देख हाथ खुजलाते खड़े थे । कोई भी इतनी खास नहीं थी पर फिर भी लोमहर्षक काण्ड सहर्ष हो चुका था ।

महिलाओं की नई पीढ़ी झूले पर चढ़ने के लिये युध्द लड़ रही थी । किसी तरीके से संघर्ष कर के चार युवतियाँ झूले पर बैठीं तो अगले बीस सेकेण्ड उनकी दंतपंक्तियाँ चमकी फिर अचानक ये ख्याल आया कि पब्लिक उनके मुखारविंद को निहार रही है अत: इक्कीसवें सेकेण्ड में ही वे इतनी सीरियस हो गईं कि लगा नवाज शरीफ के तख्ता पलट से होने वाली चिंताओं की जिम्मेदारी गृह मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय और विदेश मंत्रालय की तरफ से इनको सौंप दी गई है । दस मिनट उन सबका निरीक्षण करने के बाद में घर चल दिया । पेट में इडली सांभर कुश्ती लड़ रहे थे और निद्रादेवी की आराधना का समय हो गया था ।

(सितंबर 1999 में इलाहाबाद से प्रकाशित)

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4 Responses to “मेले में चलते फिरते नजर आयें – 2 (दशहरा स्पेशल) (व्यंग्य/कार्टून)”

  1. बहुत ही सटीक व सजीव वर्णन किया है आपने मेले का.
    पढ़ के लगा की हम भी मेले में घूम आये.

  2. Pankaj said

    बहुत ही बढिया व्यंग पढ़ने को मिला दशहरे की शुभकामनाये

  3. गिरिजेश राव said

    व्यंग्य लिखना सीखने के लिए आप की चेलवाई करनी पड़ेगी।
    …या शायद यह प्रतिभा जन्मजात होती है। ..प्रणाम स्वीकारें गुरुदेव।
    ब्लॉगवाणी में आप के ब्लॉग और शिरीष मौर्य के ब्लॉग के साइड में लगे सूचक चित्र एक ही क्यों हैं? कोई कनेक्शन है क्या? या शॉर्ट सर्किट ।

  4. बहुत दिन बाद दशहरे का मेला फिर देख लिया

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