सुदर्शन

(हास्य व्यंग्य पर आधारित ब्लॉग) अब सुदर्शन www.kmmishra.tk पर भी उपलब्ध है .

जहां हरे-हरे नोट बंटते हैं (व्यंग्य/कार्टून)

Posted by K M Mishra on जुलाई 24, 2009

=>क्या बतायें दिन में चार बार ये मशीन हैंग कर जाती है । मैं तो यहां आने से पहले हथौड़ी और प्लास घर से ले कर चलता हूं । जहां मशीन फंसी दो हथौड़ी नीचे कस कर जमा दी और नोट प्लास लगाकर खींच लिये ।

कल बचपन के लंगोटिया मित्र (अब इस कहावत को बदल कर कच्छा मित्र या अंडरवियर फै्रण्ड कर देना चाहिए, क्योंकि लंगोट अब सिर्फ हनुमानजी के मंदिर में ही दिखती है, लोग जॉकी या फै्रन्ची से काम चला लेते हैं और बरसात के उमस भरे दिनों में तो दाद-खाज- खुजली के डर से कछ महापुरूष तो वो भी नहीं पहनते ।) चन्द्रनिधि जी दिल्ली से इलाहाबाद पधारे । पुराने मित्र के दर्शन से मन मुदित, प्रफुल्लित हुआ । मेहमान भगवान समान होता है, इसलिए भगवान को भोग लगाने के लिए कुछ प्रसाद भी होना जरूरी है और प्रसाद के लिए धन का होना, इसलिए उनको लेकर बगल के एस.बी.आई. के ए.टी.एम. बूथ तक चला गया । उस ए.टी.एम. बूथ में मेला लगा हुआ था । तमाम लोग पैसा निकालने के लिए लाइन में बूथ के अन्दर खड़े थे, मानो वहां मुफ्त के नोट बंट रहे हों । हर पीछे वाला अपने से आगेवाले को मुफ्त तकनीकी सलाह दे रहा था । ये दृश्य इलाहाबादियों के लिये आमबात है लेकिन दिल्ली से आये चन्द्रनिधि जी से रहा नहीं गया और उन्होंने अपनी नेक सलाह फ्री ऑफ कॉस्ट ब्राडकॉस्ट कर दी कि एक बार में एक ही व्यक्ति को बूथ में इंटर करना चाहिए । बूथ के अंदर भीड़ लगाना नियमों के खिलाफ है । उनका ये सुभाषित सुनकर कुछ मुस्कुराये, कुछ खिसिआये, कुछ ने दूसरी तरफ मुंह कर लिया और सबसे आगे वाले को उनके पीछे वाले सज्जन तकनीकी मार्गदर्शन देते रहे ।

मैंने चन्द्रनिधि को समझाया । भाई ये दिल्ली नहीं है । दिलवाले देखने हों तो यहां इलाहाबाद में देखो और वह भी इस ए.टी.एम. बूथ में । तुम बाहर जाकर इलाहाबादी संस्कार बिसर गये हो । हम लोग हमेशा एक दूसरे की मदद को तत्तपर रहते हैं । अगर बाजू वाली भाभीजी आधी रात को भी आवाज़ दें, हम मदद के लिए तुरंत दीवार फांद जाते हैं । तुम कहीं जा रहे हो । रास्ता भटक गये । किसी राहगीर से या पास खड़े किसी आदमी से पूछ कर देखो । उसको रास्ता न भी मालूम होगा तब भी वो बंदा मदद करने को इतना तत्पर होगा कि रास्ता बताये बिना मानेगा नहीं और उसके बाद आप भटके हुये रॉकेट की तरह किसी बंगाल की खाड़ी की शोभा बढायेंगे । जब तक हम दिन में दो -चार लोगों की मदद नहीं कर देते पेट में मरोड़ उठती रहती है, रात ठीक से नींद नहीं आती और सुबह पेट भी ठीक से साफ नहीं होता । इलाहाबादियों के लिए सेवा परमो धर्म: है । आप रेलवे स्टेशन पर उतरते हैं । पहली बार इलाहाबाद आये हैं । जार्ज टाउन जाना है । एक भुवनमोहनी मुस्कान लिये रिक्शावाला आपका मन मोह लेता है । अब वो आधे शहर का चक्कर लगाते हुये अलोपीदेवी के मंदिर होते हुये, आन्नद भवन के सामने से गुजर कर उसका ऐतिहासिक महत्व बताते हुए तकरीबन एक घंटे बाद जार्ज टाउन पहुंचेगा । आप पहली बार इलाहाबाद आये हैं । ऐसा परोपकारी, यात्रीसेवी रिक्शावाला पाकर गदगद हुये जा रहे हैं । जाहिर है इस सेवा का यथोचित भुगतान तो करेंगे ही । तमाम तरह की सेवायें हैं । जो हम लोग समय समय पर करते रहते हैं । हाइकोर्ट आये मुवक्किलों की, संगम आय स्नानार्थियों की, एजी ऑफिस में पेंशन छुड़ाने आये रिटायर्ड व्यक्तियों की, इलाहाबाद की कोचिंगों में पढने आये विद्यार्थियों की । तमाम प्रकार की सेवायें हैं । अब सब आपको बताने लगें तो आप दांतों तले उंगलियां चबाने लगोगे । अब देखिये आपकी नरम-नरम उंगलियां बची रहें इस लिए मैं ज्यादा नहीं बता रहा हूं । ये भी तो एक प्रकार की सेवा हुयी न । निस्वार्थ सेवा । कुछ मांगा आपसे । कुछ नहीं । ये भी नहीं कहा की भले मानुस एक टिप्पणी ही कर देना । नहीं कहते हम लोग । ऐसे ही हैं । निस्वार्थ सेवी ।

चन्द्रनिधि भाई मेरी बात ठीक से समझ चुके थे । उनके पुराने संस्कार जागृत हो गये । उन्होंने सबसे आगे खड़े व्यक्ति को अपनी सेवाएं देनी शुरू कर दी । वह व्यक्ति ठीक से अपना ए.टी.एम. कार्ड इंटर नहीं कर पा रहा था । चन्द्रनिधि ने उसको पूरा प्रोसेस एक के बाद एक समझाया । यहां तक कि उस भलेमानुस को उसका पासवर्ड तक बताया । ”भाईसाहब आप पहले 0752 डाल रहे थे, फिर भूल कर आप 0754 डालने लगे । इसीलिए मशीन रिजेक्ट कर दे रही थी । अब देखिए, ले लिया न । कितना निकालना है ।” उस व्यक्ति ने जवाब दिया ”नहीं मुझे तो सिर्फ बैलेंस चेक करना था ।” चन्द्रनिधि जी चकित होकर उस व्यक्ति का श्रीमुख ताकने लगे । सिर्फ बैलेंस चेक करने के लिए ये श्रीमान जी पिछले दस मिनट से मशीन के साथ मगजमारी कर रहे थे । मित्रवर खिसिआये हुये मुझे ताक रहे थे और मैं उनको देख कर मुस्कुरा रहा था । वही इलाहाबादी मुस्कान ।

About these ads

5 Responses to “जहां हरे-हरे नोट बंटते हैं (व्यंग्य/कार्टून)”

  1. हा ! हा !!
    आप ने प्रयाग प्रवास की याद ताजी कर दी। लखनऊ जब पहली बार आया था तो स्टेशन पर फटफटिया वाले सताने लगे कहाँ जाओगे, आलमबाग आदि आदि। कुछ देर के बाद मैंने ‘अलोपी बाग’ बताना शुरू कर दिया। उनकी शक्लें देखने लायक होती थीं ! इतने दिन से नखलौ में रहेन अउर अलोपीबाग कहाँ है नहीं मालूम? ;) पुरानी बात है। अब तो माया राज में नजारा ही अलग है।

  2. bhupesh (shekhar) said

    bhai, mishra ji, dill ko choone wala yangya likha hai. mere blog par shubhkamnaye bheji, iske liye dhanyavad. kaha-suna par asheerwad banaye rakhiyega.

  3. Excellent! Your post has quite a few viewers. How did you get so many viewers to view your article I’m jealous! I’m still studying all about article writing on the web. I’m going to look around on your site to get a better idea how to achieve success. Thank you!

  4. A truly informative post – A big Thank You I trust you do not mind me blogging about this piece of writing on my blog I will also link back to this post Thank you

  5. This company is Dope. They have creativity that is so lacking in skateboarding today. Being good at skateboarding is not as important as having fun on a skateboard. Watch when Palace drops in the US some big companies are going to feel the pain of what these guys are capable of.

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out / Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out / Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out / Change )

Connecting to %s

 
Follow

Get every new post delivered to your Inbox.

Join 57 other followers

%d bloggers like this: