ये मुंह और अरहर की दाल /बजट स्पेशल (व्यंग्य/कार्टून)
Posted by K M Mishra on जुलाई 9, 2009

=>अब तो कूकर और फ्राइंग पैन की जरूरत ही नहीं महसूस होती । सरकार ने हमें दाल खरीदने के झंझट से बरी जो कर दिया है ।
यह कह कर हम दिल को समझा रहे हैं, वो अब चल चुके हैं, वो अब आ रहे हैं । जिस केन्द्रीय बजट की तरफ सारा मुल्क टकटकी लगाये देख रहा था वह आखिर आ ही गया । बजट क्या था, साहब, एक धमाका था । साइलेंसर लगी पिस्तौल के फायर में आवाज नहीं होती । कहते हैं खुदा की लाठी बेआवाज होती है । चोट भी करती है और सुनाई नहीं देती । इस बजट को बहुत मुख्तसर में बयान करें तो सिर्फ इतना सकते हैं कि प्रणव दा ने शहरी मध्यवर्ग की खाल खींच कर एक खंजड़ी और ढोल तैयार करने का मंसूबा बनाया है । खंजड़ी तो राजकुमार बजायेंगे और ढोल अल्पसंख्यक समुदाय के सपुर्द कर दी जायेगी ।
अवधी में एक मार्मिक लोकगीत गया जाता है – छापक पेड़वा छिउलिया कि पतवन गहबर हो । तेहि तर ठाढ़ी हिरनिया हिरन को बिसूरइ हो । शिकारी ने हिरन को मार कर उसके खाल की खंजड़ी बनाई और अयोध्या के महल में राजा दशरथ के हाथ बेच आया । दशरथ ने राम को खंजड़ी दे दी । राम आंगन में नाचते हुए खंजड़ी बजा रहे हैं । हिरनी आंख में आंसू भर कर माता कौशल्या से कहती है कि यह खंजड़ी मुझे दे दो । मैं इसकी आवाज सुनती हूं तो मुझे अपने हिरन की याद आती है । माता कौशल्या मना कर देती हैं । मेरा प्यारा राम इस खंजड़ी को बजा कर खुश होता हैं इसे मैं किसी को नहीं दे सकती ।
जनाब, इस प्रसंग का बालक राम कौन है, कहने की जरूरत नहीं । दिल्ली में युवराज भी मौजूद हैं और माता कौशल्या भी । खंजड़ी बजेगी शहरी मध्यवर्ग की घरनियां बिसूरेंगी । उनके प्रियतम हिरणों की खाल खींची जायेगी । अल्पसंख्यक समुदाय खुशी से ढोल बजायेगा । हजारों करोड़ की खैरात पाकर कौन कांग्रेस को वोट नहीं देगा । ममता दीदी ने मदरसे के तालिबे-इल्मों के लिए रेल किराये में रियायत की घोषणा पहले से ही कर दी थी । संस्कृत पाठशालाओं के विद्यार्थी उन्हें याद नहीं आये । पाठशाला छाप पण्डित और शहरी मध्यवर्ग कांग्रेस को वोट नहीं देता । रायबरेली और अमेठी अपवाद हैं । वहां के वोटर भेड़चाल से वोट करते हैं । पड़ोसी परसने वाला हो और अंधेरी रात हो तो खानेवाले की बांछे खिल जाती हैं । अंधा बांटे रेवड़ी, फिर-फिर अपने को दे ।
गरज ये कि इस बजट में किसानों के खेतों में हून – सोने का सिक्का बरसा दिया और शहरों में सूखा पड़ गया । कांग्रेस के बजट और मानसून का क्या भरोसा । कहीं लबालब, कहीं सूखा ।
3 रू0 किलो गेंहू और चावल की बजट में चकाचक चर्चा है । 80 रू0 किलो अरहर की दाल का कोई जिक्र नहीं है । यकीन मानिये प्याज के बेतहाशा बढे दाम ने एक बार चार विधान सभा चुनाव में भाजपा को चारो खाने चित कर दिया था । अब 80 रू0 किलो दाल खा कर भी इस मुल्क के वोटर कांग्रेस पर मेहरबान हैं । अपने मुल्क का मतदाता भोला भण्डारी, अवढर दानी हैं, किस पार्टी पर कब वोटों की वर्षा कर दे कहा नहीं जा सकता ।
साहब, यह ही हाल रहा तो आने वाले दो दशक के अन्दर जवान पीढी बूढों से दाल का इतिहास सुनेगी । दाल म्यूजियम का हिस्सा होगी । बुजुर्ग बच्चों को बतायेंगे कि उनके पुरखे दाल खाते थे । दाल प्रोटीन का मुख्य साधन थी । मसूर की दाल भी होती थी । मुहावरा कहा जाता था – यह मुंह और मसूर की दाल । कांग्रेस ने इस मुहावरे का अर्थ सही तरीके से समझा । उसे लगा कि देशवासियों का मुंह दाल खाने के काबिल नहीं है । उसने शाकाहारियों की थाली से दाल खारिज कर दी । दाल खारिज होने पर शाकाहारी कांग्रेस पर मेहरबानियों का वोट बरसाते रहे । अब दाल में काला जैसे मुहावरे चलन से खारिज हो जायेंगे । दाल ही नहीं रहेगी तो कुछ भी काला नहीं होगा । सूरदास की काली कामरी, चढै न दूजो रंग ।
जनाब, दाल के गायब हो जाने से प्रणव दा का कुछ नहीं बिगड़ेगा । ममता दीदी की सेहत पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा । दोनो बंगाली मोशाय ठहरे । माछेर झोल से प्रोटीन प्राप्त करते रहेंगे । बाकी सारे धर्मनिरपेक्ष सण्डे हो या मण्डे रोज खाओ अण्डे का नारा बुलंद कर रहे हैं । उनका भी बाल बांका नहीं होगा । मूसीबत का पहाड़ तो सिर्फ उन शाकाहारियों पर टूटने वाला है जो मांस से परहेज करते हैं और कांग्रेस को वोट नहीं देते । सरदार मनमोहन सिंह, प्रणव दा और मोंटेक सिंह आहलूवालिया ने बहुत सोच समझ कर निशाना लगाया है । अगले चुनाव तक भाजपा म्यूजियम की शोभा बढाने लगेगी ।
टी.वी. के दाम घट गये, कपड़े मंहगे हो गये हैं । आप कपड़े उतार कर टी.वी. से अपना तन ढक सकते हैं । चाहें तो निर्वस्त्र भी रह सकते हैं । प्रणव दा ने ठीक ही सोचा है । बच्चा कपड़े पहन कर मां के पेट से जन्म नहीं लेता । कम से कम कपड़े पहनिये या मत पहनिये तो उसका भी एक सांस्कृतिक, सामाजिक आधुनिक संदेश जाता है । संस्कृत में एक कहावत है जिसका अर्थ है – नंगे साधुओं के बीच धोबी की कोई जरूरत नहीं । समलैंगिकता को बढ़ावा देना, नग्नता की और उठाया गया पहला और ठोस कदम है । आगे-आगे देखिये होता है क्या । अभी तो कांग्रेस के इश्क की इब्तदा है ।
-नरेश मिश्र
देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त
























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा . 

puneet kumar said
AAYE DAAL-E-MOHABBAT TERE DAAM PE RONA AAYA……
NARESH JI SAADHU VAD
ADBHUT HAI AAPKI LEKHNI
EK EK SHABD JAISE MANO MERE MAN KA LIKH DIYA
CONGRESS SE ISHQ NE DESH KO AAJ IS HAALAT ME PAHUNCHA DIYA HAI
AB DEKHNA HAI KAHAN LE JAAYEGA.
YE HASYA NAHI AAM AADMI KI VEDNA HAI RUDAN HAI
BAHUT BADHIA
समीर लाल said
आगे-आगे देखिये होता है क्या -सटीक!
Shiv Kumar Mishra said
सटीक!
मंहगाई ने न जाने कितने मुहावरे बदलवा दिए.