मित्रों जरा मेरी पीठ थपथपा दो, ये मेरी सौवीं पोस्ट है । (व्यंग्य/कार्टून)
Posted by K M Mishra on जुलाई 8, 2009

पिछले साल अगस्त में बिना किसी रूपरेखा के, प्लानिंग के, जिज्ञासावश वर्डप्रेस और ब्लागस्पाट दोनो पर ब्लाग पंजीकृत कर दिया था । यूनिकोड फोन्ट की कोई जानकारी नहीं थी । ब्लागस्पाट पर फोनेटिक कन्वर्टर की सहूलियत मौजूद है लेकिन मेरी जिद थी कि जब मेरी हिन्दी टाईपिंग स्पीड 30 से ज्यादा है तब फोनेटिक पर काम क्यूं करूं । वर्डप्रेस पर एक सुविधा मौजूद थी पी.डी.एफ. फाइल अटैच करने की जो ब्लागस्पाट पर अभी भी नहीं है । यूनिकोड की जानकारी न होने के कारण मैंने वर्डप्रेस पर अपने पच्चीसों व्यंग्य लेख पी.डी.एफ. फाइल में कन्वर्ट करके डाल दिये । ब्लागिंग शुरू हो गई लेकिन भीड़ बहुत कम थी । 55 हिट्स उन दिनों का मेरा हाईयेस्ट रिकार्ड था । किसी भी ब्लाग एग्रीगेटर ने मुझे उन दिनों घास नहीं डाली क्योंकि प्रथम दृष्टया मेरा ब्लाग हिन्दी में था ही नहीं । मेरे सारे व्यंग्य लेख पी.डी.एफ. फाइल में थे । ब्लाग पर जो भी हिट्स आ रही थी वो मित्रों की वजह से थी जिन्हें मैंने ब्लाग का एड्रेस मेल किया था । कोई भलामानुस मेरी जानकारी में नहीं था जो मुझे यूनिकोड फोन्ट के बारे में बताता जबकि मेरे कई मित्र एम.एन.आई.टी. इलाहाबाद और ट्रिपल आईटी इलाहाबाद में काम करते हैं । वो भी मेरी कोई मदद न कर सके । मुझे कोई ऐसा गुरू नहीं मिल रहा था जिसने हरि को बूझा हो और मुझे भी हरिदर्शन करवा देता ।
2008 दिसंबर के आखिरी सप्ताह में बड़े भाई श्री पुनीत मालवीय ने ज्ञान दिया कि किसी ब्लागर से भेंटवार्ता करो । मैंने अपने क्षुद्र सामान्य ज्ञान की दुहाई दी कि मेरी जानकारी में ऐसा कोई नहीं है जो हिन्दी में ब्लागिंग करता हो । तब उन्होंने ‘सत्यार्थमित्र’ के ब्लागर श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी के बारे में जानकारी दी । एक शाम सिद्धार्थ जी से फोन पर समय मांग कर उनके घर जा धमका । सिद्धार्थ जी बड़े प्यार से मिले । चाय-नाश्ता करवाया, उसके बाद उन्होंने हिन्दी ब्लागिंग की ढेरों टिप्स दीं । ब्लागवाणी और चिट्ठाजगज का महत्व समझाया और साथ ही यूनिकोड कन्वर्टर के बारे में भी जानकारी दी ।
भगवान ने मेरे दिमाग में मात्र 32 एम.बी. की रैम फिट की है । ज्यादा जानकारियां एक बार में नहीं समा पाती हैं लेकिन मतलब की बातें समझ कर तुरंत घर पहुंचा । अनुनाद जी के ब्लाग से krutidev-10 का कन्वर्टर कापी किया और पहली पोस्ट ‘हैप्पी न्यू ईयर’ हिन्दी में डाली । खुशी का ठिकाना नहीं था । मेरा व्यंग्य बिना पी.डी.एफ. फाइल के और कोई दूसरा टिटिम्मा किये बिना साक्षात हिन्दी में दिखाई दे रहा था । दिल इडेन गार्डन और मन बाग-बाग हो गया । सिद्धार्थ जी को तुरंत फोन करके धन्यवाद प्रस्ताव भेजा । उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया । सिद्धार्थ जी ने मेरी 8 साल पुरानी फोन्ट की समस्या को एक झटके में सुलझा दिया । कंप्यूटर की दुनिया में कोई समस्या तब तक ही पहाड़ है जब तक कि कोई ज्ञानी-ध्यानी, जानकार पुरूष आपका मार्गदर्शन नहीं करता, उसके बाद तो सब कुछ हलवा हो जाता है । हिन्दी ब्लागिंग की दुनिया में श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी ने मेरा अन्नप्राषन कराया है । इसके लिए मैं सदा ही सिद्धार्थ जी का ऋणी रहूंगा और मैं अपनी ये सौवीं पोस्ट श्री सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी को समर्पित करता हूं ।
मैं पिछले 15 साल से कृष्ण मोहन मिश्र के नाम से हिन्दी में हास्य व्यंग्य लिख रहा हूं । इसके पहले मैं शरद जोशी और मनोहर श्याम जोशी के नाम से व्यंग्य लिखा करता था । इसमें मेरा कोई कुसूर नहीं है । पापी पेट के लिए आदमी सब कुछ करता है । हरिशंकर परसाई जी का कहा मैं कभी टाल नहीं सकता था । धीरे धीरे करके जब ये सब स्वर्ग में हो रहे कवि सम्मेलनों में मिलने वाले तगड़े चेक के लिए खिसक लिये तब एक दिन ज्ञान चतुर्वेदी ने मुझसे कहा “अरे मिश्रा ! अब अपने नाम से नहीं लिखोगे तो कब लिखोगे ।“ फिर मैं अपने ही नाम से लिखने लगा । पत्र-पत्रिकाओं में छपने और आकाशवाणी पर बजने के बाद सन 2000 में मेरे मन में एक महत्वकांक्षा ने जन्म लिया कि इंटरनेट पर हिन्दी हास्य व्यंग्य पर आधारित एक मासिक पत्रिका का प्रकाशन करूं । बचपन के लंगोटिया मित्र श्री चन्द्र निधि गुप्ता जो कि उन दिनों एक कंप्यूटर इंस्टीट्यूट चलाया करते थे, कि मदद से एक वेबसाइट ‘व्यंग्य.नेट’ का निर्माण किया गया । ‘व्यंग्य.नेट’ हिन्दी हास्य व्यंग्य पर आधारित इंटरनेट पर अपने तरह की पहली वेबसाइट थी जिसमें राष्ट्रीय, अन्तर्राष्ट्रीय खबरें, खेल, राजनीति, फिल्म आदि सभी विषयों पर व्यंग्य जाता था । लेकिन कुछ अंक निकलने के बाद फोन्ट की दिक्कत के कारण ‘व्यंग्य.नेट’ परवान न चढ़ सकी और बाद में उसे बंद करना पड़ा । ‘व्यंग्य.नेट’ पत्रिका के प्रकाशन में मुझको इलाहाबाद के वरिष्ठ पत्रकार, व्यंग्यकार श्री नरेश मिश्र जी का भी सहयोग प्राप्त था और ‘सुदर्शन’ की अब तक की यात्रा में भी हमको उनका आशीर्वाद मिल रहा है ।
जनवरी 2009 से यूनीकोड फोन्ट के प्रयोग के कारण ब्लागवाणी और चिट्ठाजगत ने ‘‘सुदर्शन” को अपने यहां पंजीकृत किया और उसके बाद से आप लोगों का प्यार और आशीर्वाद लगातार मिल रहा है । आप लोगों के इस प्यार और दुलार के लिए मैं आप सभी का तहे दिल से शुक्रगुजार हूं और आगे भी आपकी उम्मीदों पर खरा उतरने की कोशिश करता रहूंगा ।
आपका कृष्ण मोहन 
देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त
























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा . 

Shishu Prajapati said
प्रिय मित्र,
आप वाकई पीठ थपथपाने वाला काम कर रहे हैं इसलिए नहीं कि आप ब्लोगिग करके कुछ अच्छा लिख रहे हैं बल्कि इसलिए कि आप हिंदी में लिख रहे हैं और आप ऐसा करके इस अंग्रेजियत के दौर में हिंदी कि बचाने के लिए संघर्षरत हैं.
मेरी बधाई स्वीकार करें.
आपका शुभेक्शु
शिशु
बी एस पाबला said
लीजिए हम भी आपकी पीठ थपथपाने आ पहुँचे
शाबाश
राजीव तनेजा said
वीर तुम बढे चलो
धीर तुम बढे चलो
विवेक रस्तोगी said
लीजिये हम भी पीठ थपथपा देते हैं आखिर आप हिन्दी में जो लिख रहे हैं।
संजय बेंगाणी said
बधाई स्वीकारें.
अविनाश वाचस्पति said
पीठ तो थपथपा रहे हैं हम प्यार से
पर पकड़ क्यों रहा है आपने हाथों से दीवार को
प्यार का थपथपाना इतना मजबूत होता है
थपथप हो तो मानस भी मजबूत होता है।
यह नाम का चक्कर बहुत पसंद आया। मैंने सुना है कि आपने कुछ बरस अविनाश वाचस्पति के नाम से भी व्यंग्य लिखे है। वैसे मुझे कोई एतराज नहीं होगा अगर आप अब भी मेरे नाम का प्रयोग करना चाहें।
ALBELA KHATRI said
bahut bahut badhaai aapko aur abhinandan !
yonhi ek k bad dusra saikda lagaate rahen…..
shubh kaamnaayen !
Shiv Kumar Mishra said
बहुत-बहुत बधाई…आश्चर्य है कि आप का ब्लॉग इतने दिनों बाद दिखा…डबल सेंचुरी की तैयारी हमने अभी से कर ली है…
ज्ञानदत्त पाण्डेय said
बहुत बधाई कृष्ण मोहन!
बस एक लोचा है। सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी या सत्यार्थमित्र को लिंक नहीं किया। जो उन्हें न जानते हों, उन्हें नेट पर आपकी पोस्ट के माध्यम से उनतक पंहुचने का लिंक तो मिलना चाहिये।
समीर लाल said
बहुत बधाई..अब शतक पर शतक लगाते रहें.
Taarkeshwar Giri said
lo mishra ji hamne bhi aapki pith thap thapa hi diya magar mujhe bhi aapke sahayog ki jarurat hai, pl read my blog :www.taarkeshwargiri.blogspot.com
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी said
कृष्णमोहन जी, आपकी प्रतिभा, मेहनत और लगन का परिणाम है यह सफल ब्लॉग। मुझे इसका श्रेय फोकट में दे रहे हैं तो मुझे कोई एतराज नहीं। आपकी भेंट क्यों लौटाऊँ। मेरे गुरुदेव ज्ञान जी ने आपसे सत्यार्थमित्र का लिंक भी लगवा दिया। यानि मेरे पौ-बारह। काफी लोग मुझे जानने लगेंगे अब।
अरेरेरे… अपना लाभ गिनते-गिनते मैं आपको बधाई देना भी भूल गया…। तो लीजिए… टोकरा भरकर भेंज रहा हूँ। ढेर सारी बधाइयाँ। आप ऐसे ही निरन्तर प्रगति करते रहें। हम सबको हँसाते रहें और समाज की न्यूनताओं पर चोट करते रहें। हार्दिक शुभकामनाएं।
हिमांशु said
बहुत बधाई ।
दरभंगिया said
bujurgiyat mubarak!!
Puneet Kumar Malaviya said
Bhai Krishna Mohan
badi dher sari badhai
100 nahi 1000 tak jaayein aapki post
blog jagat (Hidi Ka) aap aur Siddharth ji dono ka rini hai
चन्द्र मोहन मिश्र said
अरे, ई त अपने कृष्ण मोहन हैनि हो! कहो, आजकालि तू इन्टरनेट पर लिख थए?
अरे यार, ऊ शरद जोशी के नाम से जौन चेकवा भेजि देहे रहा ऊ प्रकाशक, का भ ओकर फेरि? तोहरे अकाऊन्टवा में आइ कि नाही पइसवा?…केतना बार कहा तोहके कि दुसरे के नाम से मति लिख~. लेकिन हमार बात त काहे मनब~….चल~ कवनऊ बात नाही बा..अब जमि ग हय त जमा रह~..
औउर बहुत मज़ा आइ यार ई सुनि क~ कि सौ पोस्ट लिखी लेह्य यार तू त.
आइसन बा कि खूब लिखे हय भाइ ..और लिख~ कलम-तोड़ लिख~ ..पीठ थपथपावई बिना हमलोग हई न..एक थपकी त अबही लई ल्य..
Eric Harmon said
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