समलैंगिकता से देशसेवा (हास्य/व्यंग्य)
Posted by K M Mishra on जुलाई 4, 2009
=>मां का लड़ला बिगड़ गया ।
साधो, अब हम मंज़िले-मक़सूद पर जल्दी ही पहुंच जायेंगे। बस दो-चार कदम का फासला बाकी है, उसे तय करने में चंद दिन बाकी रह गये हैं । हलब्बी जनादेश हासिल कर सरकार ने सौ दिन के विकास का प्रोग्राम बनाया है । इस एजेंडे पर अमल करते ही अरहर की दाल तो 80 रू0 किलो हो गई और रजामंदी से बनाये गये समलैंगिक रिश्तों को अदालत ने हरी झंडी दे दी ।
अब कौन मुल्क हमसे आंखे मिलाकर कह सकता है कि हम डेवलप्ड कंट्री नहीं हैं । पश्चिम की ओर थोबड़ा करके हम उस जानिब की खिड़की खोलते हैं तो ताजी हवा, चमकदार रोशनी और पुर सुकून पर्यावरण मिलता है । पश्चिम की खिड़की नहीं खुले तो दम घोंटू माहौल में तबीयत घबराने लगती है और पिछड़ेपन की कालिख धोने के लिए कोई माकूल साबुन नहीं मिलता है ।
सो, पश्चिम के विकसित मुल्कों ने समलैंगिक रिश्तों को कानूनी जामा पहले ही पहना दिया था । हम कुछ कदम पिछड़ गये थे, अब अदालत के आदेश से समलैंगिकता का गलाफाड़ समर्थन करने वाली संस्थाएं उछल कूद मचा रही हैं । मानवाधिकार समर्थकों का कलेजा बल्लियों उछल रहा है । केन्द्रीय केबिनेट के मंत्री भी मुस्कुरा रहे हैं । उन्होंने भानुमति के पिटारे से निकाल कर एक चूहा उछाल दिया । मीडिया को बैठे बिठाये बढ़िया मुद्दा हाथ लग गया । वे कई दिनों तक इस अदालती आदेश के गन्ने को जोर-शोर से पीसेंगे और इसकी खोई से एक-एक बूंद निचोड़े बिना चैन से नहीं बैठेंगे ।
साधो, सवाल यह है कि अदालत के इस फैसले में नया क्या है । रजामंदी से बनाये गये किसी भी रिश्ते पर पुलिस की दखल का दायरा बहुत सिकुड़ा होता है । अदालत ने बड़ी दूर तक सोच कर ये फैसला दिया है । देश की बढ़ती हुयी आबादी को रोकने के लिए अब समलैंगिकता को कानूनी जामा पहना देना चाहिए । सरकार को संसद में बिल लाकर दस साल के लिए समलैंगिकता को सभी नागरिकों के लिए बाध्यकारी बना देना चाहिए, इससे देश की बढती हुयी जनसंख्या पर रोक लगेगी, नागरिकों को देशसेवा का एक मौका मिलेगा और देश दस साल के भीतर विकसित देशों की कतार में खड़ा हो जायेगा ।
रजामंदी से बनाये गये समलैंगिक रिश्तों का इतिहास आधुनिक युग की देन तो नहीं है । आदिम जमाने से आदमजाद यह हरकत करता आया है । धर्मों ने इसे नैतिकता के दायरे से बाहर कर दिया लेकिन पोप, पण्डित, मुल्ला, मौलवी और रब्बीयों की पाबंदी में ज्यादा दम नहीं था । वे खुद भी सेक्स के इस रंगोबू का मजा लेने से नहीं चूकते थे । धर्म का समलैंगिकता के खिलाफ फतवा भी कायम रहेगा और समलैंगिकता भी वजूद में रहेगी । दोनो के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता । हमें हर कीमत पर विकसित राष्ट्रों की बराबरी करना है । समलैंगिकता को कानूनी छूट देकर हमने इसी दिशा में एक ठोस कदम उठाया है । अब धर्म धुरंधरों के धमाकेदार बयानों से आसमान नहीं फट पड़ेगा ।
साधो, हमारी जवानी के दिनों में अंताक्षरी की प्रतियोगिता में शामिल होने वाले मुकाबला इस कविता से शुरू करते थे–समय बिताने के लिए करना है कुछ काम, शुरू करो अंताक्षरी लेकर हरि का नाम । अब समय बिताने के लिए राजनैतिक, विधिक, सामाजिक दायरे में कुछ तो करना ही पड़ेगा । पेट्रोल और डीजल के दाम बढ़ गये । मंहगाई सुरसा के मुंह से प्रेरणा ले रही है । मंदी की मार ने कमर तोड़ दी है । बेरोजगारी माउंट एवरेस्ट पर झंडा लहरा रही है । भारी जनादेश हासिल करने वाली सरकार इन बीमारियों का कोई कारगर इलाज नहीं तलाश सकती । उसे वोटरों का ध्यान किसी ऐसे मुद्दे की ओर आकर्षित करना है जिससे देशवासी कुछ दिनों के लिए तो भूख और बेरोजगारी को भुला कर इस बहस में उलझ जायें । समलैंगिकता से बढ़िया कारगर मुद्दा कुछ और हो नहीं सकता । विकसित दुनिया सेक्स के पीछे दीवानी है । वियेग्रा का इजाद हो चुका है । 80 वर्ष की उम्र वालों को भी जापानी और मद्रासी तेल 16 बरस की उम्र का जायका दिलाने का दावा करते हैं । समलैंगिकता की बहस से सेक्स की एक और तंग गली अब नेशनल हाइवे बन जायेगी ।
साधो, अब तो मान लो कि हम विकसित राष्ट्रों से एक कदम भी पीछे नहीं है । न मानो तो माला और सुमिरनी फेरो । हमारे बाप का क्या जाता है ।
- नरेश मिश्र
देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त
























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा . 

indian citizen said
उचित लिखा है, वाकई में विकसित हो गये हैं!
ज्ञान दत्त पाण्डेय said
कमाल है! क्या कण्डीशनिंग है! पहला ही वाक्य हमने पढ़ा:
साधो, अब हम मंजिल से जल्दी की कूद जायेंगे।
यह अवसादमूलक विचार क्यों आया साधो!
ज्ञान दत्त पाण्डेय said
कमाल है! क्या कण्डीशनिंग है! पहला ही वाक्य हमने पढ़ा:
साधो, अब हम मंजिल से जल्दी ही कूद जायेंगे।
यह अवसादमूलक विचार क्यों आया साधो!
paritosh mishra said
bhai saab aap to chun chun k goli maar rahe ho. vakayee you are mind blowing. lage raho munna bhai .
ajayjha said
बाह मिसर जी..लगता है मारने से पहले..पूरा रात बाल्टी में भीगा कर फुला दिए थे..एक दम करारा रहा …मजा आ गया..
Tisa Cosgray said
Going on the road to refer to not shiny Darey Tonight. Its gonna befall stunning. nearby on stage and Andy. afterward next saturday amiss come to pass bearing in mind Paul front line Dyk. remarkable nights ahead
Dietyi said
Very okay. agree with most people
Pat Larose said
I’m still learning from you, as I’m trying to achieve my goals. I absolutely liked reading all that is posted on your site.Keep the stories coming. I liked it!
Online Casino said
Ich darf zu Mama auf den Arm,
Fast PayDAy Loans said
I’ll gear this review to 2 kinds of people: current Zune owners who are considering an upgrade, and the ones trying to decide between a Zune and an iPod. (Accountant los angeles players worth taking into consideration out there, just like the Sony Walkman X, but Lets hope thus giving you adequate info to generate an informed decision in the Zune vs players aside from ipod line likewise.)
payday loans online + said
Hey! Wanted to leave a comment. I really liked this article. Continue the awesome effort.
Kary Mohr said
Nice points – not so obvious at first sight. Keep up the great work.
payday loan online said
Kudos for posting this kind of useful weblog. Your website isn’t only informative but in addition very artistic too. There are often very number of those who can write not simple articles that creatively. Continue the excellent writing !!
Thelma Chabez said
this is great! I think reading this, I loved every word. Seriously, keep posting the good information, bloggers like myself need it.
Alessandra said
This is such a wonderful resource that you are providing and you give it away for free. I love seeing web sites that understand the value of providing a quality resource for free. It?s the old what goes around comes around routine. Yours trully, Alessandra.