मेरी गली के जानवर
Posted by K M Mishra on फ़रवरी 19, 2009

सवेरे के साढे छ: बज रहे हैं
और मैं मुँह में टूथब्रश घुमाता लॉन में खड़ा हॅंू । सड़क पर बुङ्ढेजन, जनी अपने बच्चों को कोसते हुए मार्निंग वॉक से वापस आ रहे हैं । गली के नुक्कड़ पर कुछ श्वान (कुत्ते विद कुतियाज़) अपने ब्रेकफास्ट के इंतजाम में इधर-उधर मुँह मार रहे हैं । कुछ गायें अपने सांड दोस्तों के साथ गली के एक कोने में खड़ीं, बड़ी मात्रा में गोबर का उत्पादन कर देश को ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाने में अपना योगदान दे रहीं हैं । इसके अलावा सवेरे का अखबार तान कर दरवाजे पर मारने वाले हॉकर भी अपने दैनिक कार्य में लगे हुए हैं ।
तभी ऊपर की तीसरी मंजिल से एक सफेद पॉलीथीन में भरा घर का भरपूर कचरा सन्नाता हुआ सड़क पर लैंड होता है । सुबह का ब्रेकफास्ट । कुछ कुत्ते सपरिवार उसकी तरफ लपके । कुछ गायें भी लपकीं ।
सफेद कुत्ता : भौं! भौं! वउ । मैं पहला आया हँ । ये मेरा माल है ।
काला कुत्ता: गुर्रर्र, भौं! भौं! भौं! अबे परे हट, पन्नी पर तेरा नाम नहीं लिखा है । फुट यहाँ से ।
नारंगी कुतिया: भौं! भौं! लेडीज़ फर्स्ट । आप लोग कृपया जगह छोड़ दें ।
काला कुत्ता : गुर्रर्रर्र ! चल भाग यहाँ से, साली कुतिया कहीं की । वो तेरा टॉमी हटता होगा । अपन से मुॅह मत लगा कर ।
कुतिया : वउss! भौं! भौं! साले! महिलाओं से बात करने की तमीज़ नहीं हैं । बद्तमीज । उस दिन बासी, फफूंद लगी ब्रेड जो मैंने खिलाई थी, वो भूल गया ।
काला कुत्ता: भौं! भौं! उसी शाम तेरे कू ऊंट की घुटने की हड्डी खिलाकर हिसाब चुकता कर दिया था ।
कुतिया : चल हट, मेरा टॉमी इस वक्त यहाँ होता तो मुझ अकेली अबला कुतिया को तुम मुस्टंडों, अवारा कुत्तों के बीच कभी खाना लेने के लिए न जाने देता । गली के कुत्तों में एटीकेट्स कहाँ होते हैं ।
इसी बीच इस कुकुरहाव में सफेद कुत्ते ने मौका पाकर मुँह मारने की सोची ।
काला कुत्ता : भौं! भौं! गुर्रर्रर्र ! अबे ओये, हट पीछे । पन्नी तेरे की बाप की नहीं है । अगर मुँह लगाया तो मुझसे बुरा कोई न होगा ।
सफेद कुत्ता : भौं! भौं! क्यूं बे कालिये, पन्नी पर क्या तेरे बाप का नाम लिखा हुआ है, लेकिन बात तू सही कह गया, तुझसे बुरा तो गली में सही में कोई नहीं है ।
तब तक दो गायें जो कि अपनी ममता भरी, स्थायित्व वाली चाल से घटनास्थल पर पहुँच चुकी थी ।
सफेद देशी गाय: मोंsss ! माता का सम्मान करो । हटो सब । पहले भोजन हमको अपर्ण करो, फिर पीछे भोग लगाओ
इतने में एक सुअर अपनी पूरी भरी-पूरी फैमिली के साथ पहुँच चुका था । तपाक से बोला
सुअर : माता का फर्ज है कि पहले बच्चों को भोजन कराये फिर खुद खाये ।
चितकबरी फ्रीजियन : अमाँsss! अपना धर्म तो याद नहीं, चला है हमको धर्म,पुराण,शास्त्र पढाने । तुम गंदे सुअर । दूर रहो मुझसे । छूना नहीं मुझे । पता नहीं कहाँ कहाँ की नालियों में मुँह मार कर आ रहा है ।
सुअर समझ गया कि इन सवर्णों में उसकी दाल नहीं गलेगी । वो अपनी फैमिली के साथ गली के दूसरे किनारे निकल गया । इधर चितकबरी गाय कुत्तों को सींग दिखाकर पन्नी पर अपनी मोनोपोली की स्थापना में जुट गई । अब तक सभी तालिबानियों को पता चल चुका था कि पन्नी में सिर्फ सब्जीयों के छिलकों और सड़ी हुई ब्रेड के सिवाय कुछ नहीं है । अंत में कुकुर ब्रिगेड ने शाकाहार के प्रति अपनी अरूचि प्रकट की और गली के दूसरे छोर पर तैयार कूड़े के ढेर की तरफ सहर्ष बढ चले । अब तक मेरा अखबार वाला सवेरे का अखबार दे गया था । मैंने अखबार देखा । पहले ही पन्ने पर मोटे मोटे अक्षरों में खबर थी “चिड़ियाघर से दो दर्जन जंगली जानवर फरार” ।

- “भाई साहब ! रेलवे स्टेशन कौन सा रास्ताजाता है । जंगल जाने वाली ट्रेन पकड़नी है”।
देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त
























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा . 
