आसन/प्राणायाम
स्थिरसुखमासनम् । (योग. 2/46)
हठयोग मे 84 प्रकार के आसन बताये गये हैं । ध्यानात्मक आसनों के अतिरिक्त हठयोग में दूसरे ऐसे आसन वर्णित हैं जिनका सम्बन्ध शारीरिक व मानसिक आरोग्य से है । इन आसनों को करने से शरीर के प्रत्येक अंग-प्रत्यंग को पूरी क्रियाशीलता मिलती है एवं वे सक्रिय, स्वस्थ और लचीले बन जाते हैं ।
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‘तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गति र्विच्छेदः प्राणायामः’ (योगदर्शन 2/49)
आसन के सिद्ध हो जाने पर श्वास-प्रश्वास की गति को यथाशक्ति नियन्त्रित करना प्राणायाम कहलाता है । योगदर्शन के अनुसार प्राणायाम चार प्रकार हैं:- 1. बाह्यवृति, 2. आभ्यन्तरवृति, 3. स्तम्भवृति, 4. बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी.
‘नास्ति मुद्रासमं किंचित् सिद्धिदं क्षितिमंडले’
शास्त्रों में मुद्रा का महत्व बताते हुए कहा गया है कि इस पृथ्वी पर मुद्रा के समान सफलता देने वाला अन्य कोई कर्म नहीं है । योग साधना में अष्टांगों के अलावा मुद्राओं का भी विशेष महत्व है । मुद्राएं आसनों का विकसित रूप हैं । आसनों में इन्द्रीयों की प्रधानता और प्राणों की गौणता होती है, जबकि मुद्राओं में इन्द्रियों की गौणता और प्राणों की प्रधानता होती है ।
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देश प्रेम के दो शब्दों के सामंजस्य में वशीकरण मंत्र है, जादू का सम्मिश्रण हैं । यह वह कसौटी है जिस पर देश भक्तों की परख होती है । - मैथिलीशरण गुप्त























श्री कृष्ण गोविन्दाय नमः स्वाहा .
वक्रतुंड महाकाय कोटि सूर्यसमप्रभ ।
निर्विध्नं कुरू मे देव सर्वकार्येशु सर्वदा ।।
या देवी सर्वभूतेषु विद्यारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।
ऊं नमः कमलवासिन्यै स्वाहा .